Spirit of a Fighter380 / 1295

Spirit of a Fighter – Chapter 380

7 min read November 5, 2026

"माँ को खोया," रणवीर सिंह ने कहा। उनके होंठ काँप रहे थे, बड़ी मूँछों के नीचे। "उसे भी यही हुआ था। बुखार, फिर कमज़ोरी, फिर… फिर वो चली गई। उस वक़्त मैंने सोचा कि कुदरत का सितम है। भैरव ने खुद आकर मेरा हाथ पकड़ा था, मुझे ढाढ़स बँधाया था। मैंने उसका हाथ पकड़कर रोया था।"

मेरे पेट में एक ठंडी गाँठ बन गई।

"और फिर मेरे पैर गए," उन्होंने कहा। "उसी साल। धीरे-धीरे। पहले झुनझुनी, फिर सून्न। भैरव ने डॉक्टर बुलाए, दवा दी, सेवा की। मैंने उसे भाई कहा। और उसी ने मुझे कुर्सी पर बैठा दिया।"

उन्होंने मीरा के सिर पर हाथ फेरा।

"मैं तुझे खोना नहीं चाहता था," उन्होंने दोहराया। "यही सच है।"

मीरा ने अपना चेहरा उठाया। उसकी आँखें लाल थीं और नाक बह रही थी, और वो उनके घुटनों पर हाथ रखकर बैठी थी।

"पापा, मुझे बताइए," उसने कहा, और उसकी आवाज़ में अब रोना नहीं था — सिर्फ़ एक ठंडा, साफ़ फ़ैसला था। "मेरे पास सबूत है। मटके का पानी, लैब की रिपोर्ट, लुट्टन की गवाही। पर मुझे वो चाहिए जो सिर्फ़ आप दे सकते हैं। सच।"

रणवीर सिंह ने उसकी आँखों में देखा।

"आज भैरव ने माँ को ज़हर दिया," मैंने कहा। मेरी आवाज़ कमरे में अजीब लगी — जैसे किसी और की हो। "मेरी माँ को। और वो कह गया कि कल सुबह मुकाबला है।"

रणवीर सिंह ने मेरी तरफ़ देखा। बहुत देर तक।

फिर उन्होंने कुछ किया जो मैंने कभी नहीं सोचा था।

उन्होंने अपना एक हाथ व्हीलचेयर के हैंडल से हटाया, और अपनी जेब में डाला। और वहाँ से एक चाबी निकाली — छोटी, पुरानी, जंग लगी। उसे अपनी हथेली में रखा और मीरा की तरफ़ बढ़ा दिया।

"ये मेरे कमरे की अलमारी की चाबी है," उन्होंने कहा। "उसमें एक लोहे का डिब्बा है। उस डिब्बे में वो सब है जो मैंने बीस साल में इकट्ठा किया — हर दवा की शीशी, हर पर्ची, हर वो काग़ज़ जिस पर मैंने लिखा कि मुझे शक है। मैंने कभी किसी को नहीं दिखाया। पुलिस के डर से, तेरे डर से, अपने डर से।"

मीरा ने चाबी ली। उसके हाथ काँप रहे थे।

"अब सुन," रणवीर सिंह ने कहा। उन्होंने मीरा का चेहरा दोनों हाथों से उठाया। "एक बात है जो मैंने आज तक किसी को नहीं बताई। भैरव का असली नाम भैरव सिंह नहीं है।"

मेरी साँस रुक गई।

"वो…" रणवीर सिंह ने कहा, और उनकी आवाज़ एक अनजाने दर्द से भर गई। "वो मेरे एक पुराने साथी का बेटा है। मोहन। मोहन सिंह। उसका बाप मेरे साथ अखाड़े में मिट्टी गूंधता था, मेरे साथ कुश्ती लड़ता था। हम दोनों एक ही दिन अखाड़े में उतरे थे।"

उन्होंने रुककर साँस ली।

"और उस दिन मैंने उसे हराया था।"

कमरे में टूटी घड़ी टिक-टिक करती रही।

"उसके बाद वो अखाड़ा छोड़कर चला गया," रणवीर सिंह ने कहा। "और मुझे बाद में पता चला कि वो गाँव लौटकर बीमार पड़ा और मर गया। मैं उसकी शादी में नहीं गया, उसके बेटे के जन्म पर नहीं गया। मैं… मैं उस वक़्त बड़ा पहलवान बनने में लगा था।"

उन्होंने मीरा की तरफ़ देखा।

"और एक दिन, बीस साल पहले, एक नौजवान मेरे अखाड़े के दरवाज़े पर आया। हाथ जोड़े, आँखें नीची। बोला — 'सर, मैं मोहन का बेटा हूँ। मुझे काम चाहिए।' मैंने उसे गले लगाया। मैंने उसे अपना बेटा कहा। मैंने उसे अपनी दवा का ज़िम्मा दिया, अपने पैसों का हिसाब दिया, अपना भरोसा दिया।"

मीरा ने धीरे से कहा, "और उसने आपको कुर्सी पर बैठा दिया।"

रणवीर सिंह ने सिर हिलाया। धीरे। एक बार।

"बीस साल में एक बार भी मैंने उस पर शक नहीं जताया। क्योंकि हर बार जब मैं उसकी आँखों में देखता था, मुझे अपना किया हुआ याद आता था। मैंने उसके बाप को हराया था, और मैंने उसे कभी नहीं जाकर माफ़ी नहीं माँगी।"

उनकी आवाज़ टूट गई।

"मैं सोचता था — ये मेरी सज़ा है।"

मीरा ने अपना सिर उनके सीने पर रख दिया। और इस बार रणवीर सिंह ने अपने दोनों हाथ उठाए और उसे अपने बड़े शरीर में भर लिया — जैसे कोई किला अपने दरवाज़े खोल दे।

मैं दरवाज़े के पास खड़ा था, और मेरे गले में कुछ अटका हुआ था।

फिर रणवीर सिंह ने मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखें भरी हुई थीं, पर आवाज़ में फिर से वो पुरानी गरज लौट आई थी — वो गरज जो मिट्टी में दबी थी, अब ऊपर आ रही थी।

"वीर सिंह।"

"सर।"

"कल सुबह तू उसके सामने खड़ा होगा।"

"हाँ, सर।"

"तो सुन। वो तुझे ज़हर देगा, तुझे डराएगा, तेरी माँ का नाम लेगा, तेरे बाप का नाम लेगा। वो तुझे तोड़ने की हर कोशिश करेगा। पर एक चीज़ है जो वो नहीं कर सकता।"

"क्या, सर?"

"वो तेरी मिट्टी नहीं छीन सकता। वो तेरी माँ की दुआ नहीं छीन सकता। और वो तेरे उस पल को नहीं छीन सकता जब तू उसे पछाड़ेगा।"

उन्होंने मेरी तरफ़ उँगली उठाई।

"पर एक बात याद रख। वो जब गिरेगा, तो तू उस पर हँसने मत जाना। तू उसके बाप का बेटा है — नहीं, तू अपने बाप का बेटा है। तेरे बाप ने मुझे बचाया था एक बार, अखाड़े में। मैं गिर रहा था और उसने मेरी कलाई पकड़ ली थी, और उस वक़्त भी वो हार रहा था। मैंने उसे कभी नहीं भूला।"

मैंने सिर हिलाया। मेरे हाथ काँप रहे थे, पर मेरी आवाज़ ठीक थी।

"सर, एक बात पूछ सकता हूँ?"

"पूछ।"

"वो अलमारी… भैरव की अलमारी। उसमें जो पीला काग़ज़ है, जिस पर मेरे पापा की लिखाई है। वो क्या है?"

रणवीर सिंह ने मीरा की तरफ़ देखा, फिर मेरी तरफ़।

"वो रघुवीर की लिखाई है," उन्होंने कहा। "मैंने वो काग़ज़ एक बार देखा था, बहुत साल पहले। रघुवीर ने उसे भैरव के हाथ में दिया था — ज़हर बनाने की पर्ची। और उसके नीचे उसने एक लाइन लिखी थी। मुझे वो लाइन आज भी याद है।"

उन्होंने धीरे से कहा, जैसे किसी कब्र पर फूल रख रहे हों —

"अगर मैं न रहूँ, तो मेरा बेटा इस ज़हर को पानी में नहीं, मिट्टी में डालेगा।"

मेरे रोंगटे खड़े हो गए।

"ये… ये मेरे पापा ने लिखा था?"

"हाँ।" रणवीर सिंह ने मेरी तरफ़ देखा। "रघुवीर जानता था कि भैरव उसका इस्तेमाल करेगा। शायद उसने इसीलिए वो पर्ची अपने पास रखी थी। ताकि एक दिन कोई उसे पढ़े और समझे।"

मैं चुप हो गया।

मीरा उठी। उसने अपनी आँखें पोंछीं, और फिर उसने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखें अब लाल थीं, पर साफ़।

"वीर, सुबह होने में चार घंटे हैं," उसने कहा। "हमें नींद नहीं चाहिए। हमें तैयारी चाहिए।"

"तैयारी?"

"मेरे पास लैब रिपोर्ट है, मटके का पानी है, लुट्टन की गवाही है, श्यामू काका का पन्ना है, और अब पापा का डिब्बा भी। पर एक चीज़ की कमी है।"

"क्या?"

"गवाह। जो सबके सामने बोले। अखाड़े के बाहर, पंचायत के सामने।"

मैंने सोचा। फिर मुझे याद आया।

"सुक्खी बुआ," मैंने कहा।

मीरा ने सिर हिलाया। "हाँ। वो पूरे गाँव को बुला सकती है।"

"मैं अभी जाता हूँ।"

"मैं साथ चलूँगी।"

"नहीं।" मैंने उसका हाथ पकड़ा। "तू पापा के पास रुक। ये उनकी रात है। मैं सुक्खी बुआ को लेकर आता हूँ, और रास्ते में कालू काका को भी बता दूँगा। तू डिब्बा खोल, काग़ज़ निकाल, सब कुछ तैयार रख। सुबह हमें सिर्फ़ बोलना होगा।"

वो कुछ देर मेरी आँखों में देखती रही। फिर उसने धीरे से कहा, "तू अकेला नहीं जाएगा।"

"मैं अकेला नहीं जाऊँगा। टिंकू को ले जाऊँगा।"

उसके होंठों पर थोड़ी-सी मुस्कान आई। "टिंकू को ले जा। पर वो रास्ते में खीर की बात करेगा।"

"तो करने दे। मुझे उसकी खीर की आदत है।"

मैं पलटा। दरवाज़े तक पहुँचा। फिर रुका और पलटकर देखा — रणवीर सिंह ने अपना हाथ उठाया था।

"वीर।"

"सर?"

"कल तेरे पापा की धोती पहनकर आना।"

"पहनूँगा, सर।"

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