Spirit of a Fighter – Chapter 379
माँ की हथेली मेरे सिर पर थी और उसकी गर्माहट धीरे-धीरे कम हो रही थी। मीरा ने पुड़िया पानी में घोली और माँ के होंठों से लगाई। मैंने उनका सिर थोड़ा ऊपर किया, ताकि घूँट अंदर जाए।
"एक और," मीरा ने कहा। "धीरे। जल्दी मत करो।"
माँ ने घूँट लिया। फिर उनकी छाती में एक झटका आया और वो खाँसने लगीं। वो खाँसी मेरे कानों में ऐसी लगी जैसे सूखी ज़मीन पर पहली बारिश पड़ी हो।
कालू काका ने लालटेन ऊपर उठाई। उनका चेहरा पीला पड़ गया था, पर आँखें चमक रही थीं।
"बच गई," उन्होंने धीरे से कहा। "मिट्टी ने सुनी।"
माँ ने आँखें खोलीं। पहले मेरी तरफ़ देखा, फिर मीरा की तरफ़। फिर वो कुछ बोलीं, पर आवाज़ इतनी धीमी थी कि सिर्फ़ होंठ हिले।
"क्या कहा, माँ?" मैंने कान पास ले जाकर पूछा।
"मैंने… कहा था ना," उन्होंने साँस भरकर कहा। "भूखे पेट की दुआ… सीधी ऊपर जाती है।"
और फिर वो मुस्कुराईं। उस हालत में भी मुस्कुराईं। मेरी आँखों से पानी बह निकला और मैंने उनका हाथ अपने मुँह पर रख लिया, ताकि कोई मेरी आवाज़ न सुने।
मीरा ने मटके का पानी बोतल में भर लिया था। वो बोतल हिलाकर सूँघ रही थी, फिर उसने अपनी कॉपी में कुछ लिखा और उसे बंद करके बैग में रख दिया।
"ये पानी मैं अपने साथ ले जाऊँगी," उसने कहा। "कल सुबह जब सब इकट्ठे होंगे, यही मेरा सबूत होगा।"
"कल सुबह," मैंने दोहराया। मेरी आवाज़ सूखी थी।
माँ अब ठीक से साँस ले रही थीं। उन्होंने मेरा हाथ पकड़ा और उँगलियाँ कसकर दबाईं।
"वीर।"
"हाँ, माँ।"
"तू चिट्ठी का काग़ज़… पढ़ लेना। अभी।"
मैं कुछ देर उन्हें देखता रहा। उनकी आँखों में वो बात थी जो कभी बुझती नहीं। मैं उठा, कमरे के कोने से वो काग़ज़ उठाया जो कालू काका लेकर आए थे — जो चिट्ठी मीरा ने रणवीर सिंह के बक्से से निकाली थी, और जिसे वीर ने पंचायत में पढ़ने से मना कर दिया था।
मैंने उसे लालटेन के पास खोला। स्याही पुरानी थी, कुछ जगह धुँधली पड़ गई थी, पर पढ़ी जा सकती थी।
मैंने पढ़ना शुरू किया। धीरे-धीरे।
पहली बार मैंने पूरी चिट्ठी पढ़ी — सिर्फ़ वो हिस्सा नहीं जो पंचायत में दिखाया था। मुंशीजी की लिखाई में, आख़िरी पन्ने पर, नीचे की तरफ़, एक लाइन थी जो मैंने पहले नहीं देखी थी। शायद इसलिए कि वो मोड़ पर लिखी थी, और स्याही सूखकर हल्की हो गई थी।
वो लाइन थी — "मीरा को मत बताना। उसके पापा की दवा में जो आता है, वो मैं जाँच नहीं पाया। पर मुझे शक है। बेटी को बाप के खिलाफ़ मत कर देना।"
मेरे हाथ ठंडे पड़ गए।
मैंने पलटकर मीरा की तरफ़ देखा। वो माँ के पास बैठी थी, उनकी नाड़ी देख रही थी, और उसका चेहरा लालटेन की रोशनी में एक तरफ़ उजला था और दूसरी तरफ़ अंधेरा। मुझे लगा कि मेरी आवाज़ जाने कैसी निकलेगी।
"मीरा।"
"हम्म?"
"ये चिट्ठी ले।"
उसने मेरी तरफ़ देखा। मेरे हाथ में काग़ज़ और मेरे चेहरे पर जो था, उसे पढ़कर वो चुप हो गई। उसने काग़ज़ लिया, लालटेन के पास लाया, और पढ़ने लगी।
मैंने उसका चेहरा देखा। पहले उसकी आँखें सिकुड़ीं, फिर बड़ी हुईं। फिर उसने काग़ज़ नीचे किया और बिना कुछ बोले उठकर खड़ी हो गई।
"मीरा—"
"मैं जानती हूँ," उसने कहा। उसकी आवाज़ ऐसी थी जैसे किसी ने उसके गले में रस्सी कस दी हो। "मैं जानती थी। बस… बस मैं खुद को झूठ बोल रही थी।"
वो कमरे के बाहर चली गई।
मैं माँ के पास बैठा रहा, पर मेरी आँखें दरवाज़े पर थीं। कालू काका ने मेरे कंधे पर हाथ रखा।
"जा," उन्होंने कहा। "मैं माँ के पास हूँ।"
मैं दौड़ा।
बाहर आँगन सुनसान था। आग बुझ चुकी थी, और जली लकड़ी की गंध हवा में बसी थी। मीरा अखाड़े की तरफ़ जा रही थी — तेज़ कदम, सीधी पीठ। मुझे लगा कि अगर वो रुक गई तो गिर पड़ेगी।
"मीरा, रुक!"
वो नहीं रुकी।
"मीरा!" मैंने उसकी कलाई पकड़ी।
वो पलटी। उसकी आँखों में पानी था, पर रो नहीं रही थी। गुस्सा था — अपने आप पर, अपने पापा पर, शायद मुझ पर भी।
"तू जानता था?" उसने पूछा। "तू जानता था और मुझे नहीं बताया?"
"मैंने अभी पढ़ा। अभी, इसी वक़्त।"
वो मेरी आँखों में देखने लगी। बहुत देर तक। मैंने अपनी नज़र नहीं हटाई।
"पापा से पूछना है," उसने कहा। "अभी।"
"इतनी रात?"
"अगर मैं सुबह तक ये सवाल सीने में लेकर सो गई, तो मैं फट जाऊँगी, वीर।"
मैंने कुछ नहीं कहा। मैंने सिर्फ़ उसका हाथ थामा और साथ चल पड़ा।
रणवीर सिंह का घर अखाड़े के पीछे था — बड़ा आँगन, पुराने खंभे, और बरामदे में एक झूला जो हवा में हल्का-हल्का हिल रहा था। दरवाज़ा खुला था। अंदर से पीली रोशनी आ रही थी।
अंदर जाकर मैंने देखा — रणवीर सिंह जाग रहे थे। व्हीलचेयर पर बैठे, बड़ी खिड़की के पास, बाहर अंधेरे की तरफ़ देख रहे थे। उनका बड़ा शरीर इस वक़्त और भी बड़ा लग रहा था, और उनकी मूँछें चुप थीं।
उन्होंने पलटकर देखा। हमें देखकर उनके चेहरे पर कुछ पल के लिए घबराहट आई — मीरा का चेहरा देखकर। फिर वो घबराहट छिपाने की कोशिश की, पर शरीर ने साथ नहीं दिया।
"इतनी रात?" उन्होंने कहा। आवाज़ धीमी, जैसे हवा कम पड़ रही हो।
मीरा उनके सामने जाकर खड़ी हो गई। हाथ में काग़ज़ था — जगदीश की चिट्ठी। उसने काग़ज़ उनकी तरफ़ बढ़ाया।
"पापा। आपकी दवा भैरव भेजता है ना?"
कमरे में एकदम से सन्नाटा छा गया।
रणवीर सिंह का चेहरा पल भर में बदल गया। उनकी उँगलियाँ व्हीलचेयर के हैंडल पर कस गईं — मैंने देखा। उनकी पकड़ में ज़ोर आया, नसें उभर आईं। और उनके होंठ खुले, पर आवाज़ नहीं निकली।
कमरे में सिर्फ़ टूटी घड़ी की टिक-टिक सुनाई दे रही थी — वो घड़ी जो कभी ठीक नहीं हुई, पर फिर भी चलती थी, जैसे ज़िद पकड़कर।
मैं दरवाज़े के पास खड़ा रहा। मेरी जगह वहाँ नहीं थी, पर मैं जा भी नहीं सकता था।
रणवीर सिंह ने नीचे देखा। अपने पैरों की तरफ़, जो सून्न थे। बहुत देर तक।
"बीस साल," उन्होंने धीरे से कहा। "बीस साल से मैं यही सोच रहा हूँ।"
मीरा की साँस रुक गई।
"पर सबूत नहीं था," उन्होंने कहा। "मैंने दो बार जाँच करवाई। दोनों बार मेरा आदमी ही बदल गया। फिर मैंने सोचा — अगर मैं और खोदूँगा, तो ये मेरी बेटी तक पहुँच जाएगा। और तब मैं चुप हो गया।"
"आपको शक था?" मीरा की आवाज़ काँप रही थी। "आपको शक था और आपने मुझे नहीं बताया?"
"मैंने तुझे बचाना चाहा।"
"बचाना चाहा या छुपाना चाहा?"
रणवीर सिंह ने आँखें बंद कर लीं।
फिर मीरा गिरी।
वो घुटनों के बल उनके पैरों के पास गिरी, और उसने अपना सिर उनके घुटनों पर रख दिया, और रोई। ऐसे रोई जैसे बहुत दिनों का जमा हुआ पानी एक साथ फूट पड़ा हो। उसके कंधे हिल रहे थे और उसकी उँगलियाँ उनके घुटनों की चादर में धँसी हुई थीं।
रणवीर सिंह अपने हाथों से व्हीलचेयर के हैंडल नहीं छोड़ सके — जैसे उन्हें छोड़ने पर वो गिर जाएँगे। उन्होंने देखा कि मैं दरवाज़े पर खड़ा हूँ, और उनकी आँखों में कुछ था जो मुझे समझ नहीं आया — शर्म, या फिर बहुत पुराना दर्द।
फिर उन्होंने धीरे से अपना एक हाथ उठाया और मीरा के सिर पर रखा।
"बेटी," उन्होंने कहा। और उनकी आवाज़ में वो गरज नहीं थी जो मैंने पहली बार सुनी थी जब वो अखाड़े में बोले थे। बस एक थकी हुई, टूटी हुई आवाज़ थी। "मैं तुझे खोना नहीं चाहता था।"
मीरा का रोना तेज़ हो गया।
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