Spirit of a Fighter367 / 1295

Spirit of a Fighter – Chapter 367

6 min read November 5, 2026

"क्योंकि मैं अब भी डरता हूँ, वीर।" उसकी आँखों से पानी बह रहा था, खून के साथ। "बीस साल का डर एक रात में नहीं जाता।"

मीरा ने उसकी नाड़ी छोड़ी और मेरी तरफ़ देखा।

"ये ज़्यादा नहीं है," उसने कहा। "जितना सोच रहे हो, उससे कम है। पर अगर हम इसे अभी नहीं निकालेंगे, तो सुबह तक ये और बढ़ेगा।"

"तो निकालो," मैंने कहा।

"मुझे साफ़ जगह चाहिए। और रोशनी।" उसने शेड की छत की तरफ़ देखा। "यहाँ नहीं। यहाँ दीवारें भी गवाह हैं।"

"अखाड़े की रसोई," टिंकू ने कहा। "वहाँ पानी का नल है और भैरव की दवाइयों की अलमारी भी।"

"भैरव की अलमारी में क्यों जाएँ?" मैंने पूछा।

"क्योंकि वहाँ सबसे पहले पता चलेगा कि ये कौन-सा ज़हर है।" टिंकू की आवाज़ में अब डर नहीं, हिसाब था। "मैं बीस साल से उसकी रसोई में घुसता आया हूँ, भाई। मुझे उसकी हर शीशी का रंग याद है।"

हमने लुट्टन को उठाया। उसके पैर नहीं चल रहे थे। मैंने उसकी बाँह अपने कंधे पर ली और कालू काका ने दूसरी तरफ़ संभाली। हम शेड से बाहर निकले।

तभी मैंने रुककर पीछे देखा। शेड की दीवार पर कुछ लिखा था — कोयले से, मोटे अक्षरों में। मैंने उसे पढ़ा और मेरे अंदर की सारी हवा बाहर निकल गई।

"जो सच बोलेगा, वो खीर में मीठा नहीं, खून देखेगा।"

टिंकू ने भी देखा। उसका चेहरा सफ़ेद पड़ गया।

"मेरी खीर," उसने धीरे से कहा। "उसने मेरी खीर में हाथ डाला।"

"टिंकू—"

"नहीं, वीर।" उसने सिर हिलाया। "अब इस दुकान का नाम बदलना पड़ेगा। क्योंकि जिस दुकान की खीर में ज़हर आ सकता है, वो मिठाई की दुकान नहीं, जाल है।"

मैंने उसके कंधे को कसकर पकड़ा। "अभी लुट्टन को बचाना है। बाकी बाद में।"

हम भागे। रास्ते में लुट्टन का सिर मेरे कंधे से टकरा रहा था, और वो कुछ बड़बड़ा रहा था जो समझ नहीं आ रहा था।

अखाड़े का पिछला दरवाज़ा खुला था। कालू काका ने पहले ही अपनी चाबी से खोल लिया था, या शायद भैरव ने जानबूझकर खुला छोड़ दिया था। रसोई में पहुँचकर मैंने लुट्टन को फ़र्श पर लिटाया।

मीरा ने पानी मँगाया और अपनी डिब्बी खोली। उसने कुछ पत्तियाँ चबाईं, फिर उसका रस लुट्टन के मुँह में डाला।

"ये उल्टी लाएगी," उसने कहा। "अगर ज़हर पेट में है, तो निकल जाएगा।"

टिंकू अलमारी की तरफ़ गया। उसने दरवाज़ा खींचा — बंद था।

"ताला," उसने कहा।

"तोड़ो," मैंने कहा।

टिंकू ने रसोई की तरफ़ देखा, फिर एक भारी लोहे का तवा उठाया और अलमारी के ताले पर दे मारा। ताला टूटा नहीं, पर दरवाज़ा झुक गया। दूसरी बार मारा, और दरवाज़ा खुल गया।

अंदर शीशियाँ थीं। हरी, नीली, पीली। टिंकू ने एक-एक करके देखीं।

"ये वही है," उसने पीली शीशी उठाई। "भैरव इसे अपनी जेब में रखता है। कभी-कभी रसोई में छोड़ जाता है।"

"इसकी गंध?" मीरा ने पूछा।

मैंने शीशी खोली। गंध आई — वही कड़वी, वही जलती हुई। मेरी नाक ने झटका खाया और मेरी आँखों में पानी आ गया।

"यही है," मैंने कहा। "यही ज़हर लुट्टन की साँस में है।"

मीरा ने शीशी ली और उसमें से एक बूँद अपनी उँगली पर ली। उसने उसे सूँघा, फिर अपनी डिब्बी से कुछ चूर्ण निकाला और दोनों को मिला दिया।

"अगर ये ज़हर है," उसने कहा, "तो इसे बेअसर करने के लिए मुझे वो चाहिए जो इसे बनाने वाले ने इसमें मिलाया हो।"

"क्या?"

"हर ज़हर में एक चीज़ होती है जो उसे बनाती है। रघुवीर की पर्ची में लिखा था — पानी, सोंठ, काली मिर्च, और एक और चीज़।" उसने मेरी तरफ़ देखा। "वो चीज़ क्या है?"

मैंने सोचा। माँ की आवाज़ याद आई — "शीशी का रंग वही था जो पापा के हाथ में था।"

"माँ ने शीशी जलाई थी," मैंने कहा। "और उसमें से एक गंध आई थी — जैसे जलती हुई राल।"

मीरा की आँखें चमकीं। "नीम की राल।"

"क्या?"

"नीम की गोंद। ये ज़हर को शरीर से चिपकाती है। इसे कोई साधारण आदमी नहीं जानता।" उसने मेरी तरफ़ देखा। "जिसने ये बनाया, वो अखाड़े के पुराने नुस्खों का जानकार था।"

कालू काका ने धीरे से कहा, "रघुवीर।"

मैंने उनकी तरफ़ देखा।

"रघुवीर ने ये बनाया था," कालू काका ने कहा। "पहलवानों को मज़बूत करने के लिए। नाप-तौल से। पर भैरव ने उसकी मात्रा बढ़ा दी।"

लुट्टन ने ज़मीन पर कराहते हुए उल्टी की। मीरा ने उसे करवट दिलाई और उसकी पीठ सहलाई।

"अब बेहतर है," उसने कहा। "अब इसे साँस लेने दो।"

मैंने लुट्टन का चेहरा देखा। उसके होंठ नीले पड़ रहे थे, पर उसकी साँस अब रुक-रुककर आ रही थी, फटी हुई नहीं।

"टिंकू," मैंने कहा। "तू बाहर जाकर देख। अगर कोई है, तो बता। और अगर भैरव का आदमी है, तो उसे पकड़कर ले आ।"

टिंकू ने सिर हिलाया और बाहर निकल गया।

मैंने लुट्टन के पास बैठकर उसका हाथ पकड़ा।

"लुट्टन," मैंने कहा। "तूने सच बोला। और तेरे सच की कीमत तुझे चुकानी पड़ रही है। मुझे पता है।"

उसने आँखें खोलीं। उनमें पानी था।

"मैंने सोचा था… सच बोलकर हल्का हो जाऊँगा," उसने फुसफुसाया। "पर ये तो और भारी है।"

"भारी है," मैंने कहा। "पर अब ये अकेले नहीं उठाना पड़ेगा।"

वो हँसा — खून से भरे होंठों से। "तू अजीब है, वीर। तेरे पास मौका है मुझे कोसने का, और तू मेरा हाथ पकड़े बैठा है।"

"कोसने से भूख नहीं मिटती," मैंने कहा। "और तूने सच बोला है।"

तभी टिंकू दौड़कर अंदर आया। उसके हाथ में एक टूटी हुई शीशी थी, और उसकी आँखें फैली हुई थीं।

"बाहर कोई नहीं था," उसने कहा। "पर दीवार के पास ये पड़ी थी। और — और श्यामू काका का लालटेन वहाँ है।"

"इसका मतलब?"

"मतलब ये कि श्यामू काका यहाँ आए थे।" टिंकू ने शीशी मेरी तरफ़ बढ़ाई। "और वो गए नहीं हैं।"

मैं उठा। मीरा ने मेरी कलाई पकड़ी।

"मैं साथ चलूँगी।"

"नहीं, तुम यहाँ रहो। लुट्टन—"

"लुट्टन अब ख़तरे में नहीं है," उसने कहा। "उल्टी से ज़हर निकल गया। अब उसे सिर्फ़ आराम चाहिए।" उसने मेरी आँखों में देखा। "और वीर — अगर श्यामू काका को भी ज़हर दिया गया है, तो उनके पास वक़्त कम है।"

मैंने सिर हिलाया। हम बाहर निकले।

अखाड़े का आँगन चाँदनी में नहाया था। दीवार के पास श्यामू काका का लालटेन जल रहा था, और उसके पास ही — श्यामू काका।

वो दीवार से टिककर बैठे थे। उनका सिर झुका हुआ था। पर उनकी आँखें खुली थीं।

"श्यामू काका!" मैं दौड़ा।

उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। उनके होंठ हिले। "वीर… मैं… मैं तुम्हें बताने आया था… कि भैरव ने मुझे भी…"

उनके हाथ में एक काग़ज़ था। काँपता हुआ, मुड़ा हुआ।

मैंने वो काग़ज़ उनके हाथ से लिया। उस पर लिखा था — रघुवीर के अक्षरों में। मैंने पहचाना। वही अक्षर जो पीली पर्ची पर थे।

"मैंने… ये रघुवीर की डायरी से निकाला था," श्यामू काका ने धीरे से कहा। "जब भैरव ने तुम्हारे पापा की डायरी जलाई थी… तो मैंने एक पन्ना बचा लिया था।"

मैंने उसे खोला। उस पर सिर्फ़ एक लाइन थी, और उस लाइन ने मेरे अंदर कुछ ऐसा हिलाया जो बीस साल से सो रहा था।

"भैरव का पानी नहीं, भैरव का हाथ खतरनाक है। उसने मुझे नहीं, मेरे हाथों को बेच दिया।"

मैंने श्यामू काका की तरफ़ देखा। उनकी आँखें बंद हो रही थीं।

"काका, आँखें खुली रखो।"

"मैं… मैं थक गया हूँ, बेटा।" उनका सिर और झुक गया।

मीरा ने उनकी नाड़ी पकड़ी और फिर उनकी आँखों की पुतली देखी।

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