Spirit of a Fighter – Chapter 366
"आज रात सबको बुलाना है। लुट्टन, श्यामू काका, कालू काका, मीरा।"
टिंकू रुक गया। उसने चम्मच कड़ाही के किनारे रखा।
"सबको? यहाँ? उस शेड में?"
"हाँ।"
"भाई, वो शेड छोटा है। और वहाँ रोज़ चूहे आते हैं। डर का माहौल बन जाएगा।"
"डर तो बाहर भी है," मैंने कहा। "अंदर कम से कम चूहे असली होंगे।"
टिंकू ने एक पल मेरी तरफ़ देखा, फिर ज़ोर से हँसा। उसकी हँसी में मेरी उम्मीद से ज़्यादा जान थी।
"ठीक है," वो बोला। "मैं चाय बनाऊँगा। और सुन —" उसने उँगली उठाई, "— मैं सिर्फ़ चाय नहीं बनाऊँगा, मैं गवाही भी दूँगा। मेरे रजिस्टर में हर मौत से पहले भैरव के आदमी की मिठाई है। मेरी मिठाई। उसने मेरी मिठाई का इस्तेमाल किया।"
उसकी आवाज़ का मज़ाक गिर गया था। वहाँ कुछ और निकल आया था — गुस्सा, जो धीरे-धीरे चूल्हे में जलती लकड़ी जैसा दिख रहा था।
"तो लिखवा लेंगे," मैंने कहा।
"लिखवा लेंगे।" उसने चम्मच उठाया और खीर में डाल दिया। "पर पहले इसे पकने दे। किसी को भूखे पेट सच नहीं बोलना चाहिए। और वैसे भी —" उसने कड़ाही में देखा, "— अगर ये जल गई, तो गवाही के बाद सब मुझे ही मारेंगे।"
शाम ढल गई। मैं घर गया, माँ को सब बताया। वो चक्की के पास बैठी थी, आटा छान रही थी।
"आज रात?" उसने बिना ऊपर देखे पूछा।
"हाँ।"
"मीरा भी आएगी?"
"आएगी।"
माँ ने छलनी रख दी और मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में वो शांति थी जो मुझे हमेशा डराती थी — क्योंकि जब वो शांत होती थीं, तो अंदर कुछ बहुत बड़ा चल रहा होता था।
"गुड़िया को मत जगाना," उसने कहा। "वो सुबह स्कूल जाएगी।"
"माँ—"
"मैं जानती हूँ तू क्या कहेगा — कि ये वक़्त स्कूल का नहीं है।" उसने आटा थैली में भरना शुरू किया। "पर मैं चाहती हूँ कि इस घर में एक सुबह ऐसी हो जो हमेशा की तरह शुरू हो। वरना बड़ा होकर तेरी बहन को यही सिखाया जाएगा कि सुबह का होना भी शक की बात है।"
मैं कुछ नहीं बोला। उसकी बात में वो चीज़ थी जो मैं झेल नहीं सकता था।
रात को मैं शेड पहुँचा तो टिंकू पहले से वहाँ था। उसने एक पुरानी चारपाई बिछा दी थी और उस पर चार कटोरे रख दिए थे, जिनमें खीर थी। खीर गाढ़ी हो गई थी। गुड़ की गंध आ रही थी।
"देखा?" टिंकू ने कहा। "जब तक बैठा रहा, पक गई। सब्र का फल खीर के रूप में।"
मीरा पहले आई। उसके हाथ में काग़ज़ों की गड्डी थी और एक छोटी-सी दवा की डिब्बी।
"ये क्या है?" मैंने पूछा।
"स्याही और दवा।" उसने डिब्बी उठाई। "लुट्टन की हालत अभी ठीक नहीं है। अगर ज़हर फिर चढ़ा, तो ये काम आएगी।"
"तुम्हें लगता है वो फिर चढ़ेगा?"
मीरा ने मेरी तरफ़ देखा। "तुम्हें नहीं लगता?"
मैंने जवाब नहीं दिया। मुझे लगता था। मुझे यही लग रहा था कि भैरव अपना काम अधूरा नहीं छोड़ता।
कालू काका आए, लालटेन लेकर। उन्होंने लालटेन नीचे रखी और दीवार से टिककर बैठ गए, जैसे सारा दिन मिट्टी में खड़े रहकर आए हों।
"श्यामू आएगा," उन्होंने कहा। "मैंने उसे बोला — आज रात जो नहीं आया, वो कल भी नहीं होगा।"
लुट्टन सबसे आख़िर में आया। वो दरवाज़े पर खड़ा रहा, एक हाथ दीवार पर टिकाए। उसका चेहरा पीला था और आँखें धँसी हुई।
"कहीं और आते, तो मुझे यकीन न होता," उसने धीरे से कहा। "पर टिंकू की दुकान है। यहाँ आकर मर भी गया, तो कम से कम मीठी गंध में मरूँगा।"
"मरने की बात मत कर," टिंकू ने कहा और उसे कटोरा पकड़ा दिया। "खा। आज शक्कर कम है, पर बातें ज़्यादा हैं।"
लुट्टन ने कटोरा देखा और उसकी आँखें भर आईं। वो बैठ गया।
हम सब बैठ गए। शेड में लालटेन की रोशनी थी और उसके बाहर अंधेरा। एक पल को सिर्फ़ चम्मचों की आवाज़ आई।
फिर मैंने काग़ज़ निकाला।
"लुट्टन," मैंने कहा। "आज जो तू बोलेगा, वो इस काग़ज़ पर लिखा जाएगा। और उस पर तेरा अंगूठा लगेगा। सोच ले।"
लुट्टन ने चम्मच रख दिया। उसने अपने हाथ देखे। उनमें कंपकंपी थी।
"बीस साल," उसने कहा। उसकी आवाज़ फटी थी। "बीस साल मैंने भैरव के लिए झूठ बोला। किसी की मौत पर मैंने कहा — 'कुदरत का सितम था, कमज़ोर पड़ गया'। किसी के बेटे को मैंने झूठी तसल्ली दी।" उसने अपनी आँखें मलीं। "मेरी बेटी गोलू जब छोटी थी, तो मैंने उसे कहा था — 'बेटा, पापा पहलवानों की मदद करते हैं'। वो आज तक समझती है कि मैं किसी की मदद करता हूँ।"
टिंकू ने उसके कंधे पर हाथ रखा।
"आज पहली बार सही बात बोल," टिंकू ने कहा। "मदद अब शुरू होगी।"
लुट्टन ने सिर हिलाया। फिर उसने हाथ आगे बढ़ाया और स्याही लेने को कहा। मैंने उसे डिब्बी दी। उसने उँगली डुबोई और काग़ज़ पर रखी।
हाथ काँप रहा था। वो अंगूठा ज़मीन पर नहीं लगा रहा था — वो अपना सारा बीस साल एक जगह लगा रहा था।
"रुक तो," वो बोला। "एक बात बोल दूँ, फिर लगाऊँगा।"
"बोल।"
उसने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में पानी था।
"तेरे पापा रघुवीर ने एक दिन मुझे रोका था। रास्ते में। उसने मेरा कंधा पकड़ा और कहा — 'लुट्टन, तू अभी जवान है, ये ज़हर छोड़ दे'। मैंने उसे झिड़क दिया था। मैंने कहा था — 'मुझे कुछ नहीं होता'।" उसकी आवाज़ रुँध गई। "वो मुझे बचाना चाहता था, और मैंने उसे झिड़क दिया।"
मेरे अंदर कुछ खटका। मैंने अपनी मुट्ठी कस ली।
"अंदर आ जाएगा," मैंने कहा। "जो अंदर आ जाए, वो साफ़ हो जाता है।"
"अब?" उसने पूछा।
"अब लगा।"
उसने अंगूठा लगाया। काग़ज़ पर लाल निशान बना, धुँधला-सा। उसने अपनी उँगली देखी और मानो कुछ भारी चीज़ उसके सीने से उतर गई हो।
"बीस साल बाद," वो बोला। "आज पहली बार सच बोल रहा हूँ।"
तभी उसका चेहरा बदला।
उसने अपनी छाती पर हाथ रखा। उसकी आँखें फैल गईं, जैसे किसी ने अंदर से दरवाज़ा खटखटाया हो।
"लुट्टन?" मीरा उठी।
वो खाँसा। खाँसी सूखी थी, और उसके बाद उसके होंठों से एक पतली लकीर नीचे उतरी।
खून।
"बैठ जा," मीरा ने कहा और उसके पास घुटने टेक दिए। उसने काग़ज़ हटाया और उसका चेहरा थामा।
लुट्टन ज़मीन पर गिर पड़ा। उसके नाक से खून बह रहा था और उसकी साँस में वो कड़वाहट थी जो मैं पहचानता था। वही कड़वाहट। वही ज़हर।
मैंने उसकी कलाई पकड़ी। नाड़ी तेज़ चल रही थी, जैसे कोई चींटी जल्दी में हो।
"ये अभी नहीं होना चाहिए था," मीरा बोली। उसकी आवाज़ में पहली बार घबराहट आई थी। "मैंने उसका ज़हर कल निकाला था। बाहर आ गया था। ये अंदर से क्यों उबल रहा है?"
उसने डिब्बी खोली और उसकी सूंघी लेकर पुड़िया उसके मुँह में डाल दी। लुट्टन ने उसे निगलने की कोशिश की और फिर फिर खाँसा।
"वीर," टिंकू ने धीरे से कहा। "ये ज़हर गला नहीं है।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा।
"ये किसी ने अभी पिलाया है," टिंकू ने कहा। उसकी आवाज़ काँप रही थी। "क्योंकि मैंने इसे कटोरा दिया था, और इसमें सिर्फ़ खीर थी।"
शेड में सन्नाटा छा गया।
कालू काका ने लालटेन उठाई और दरवाज़े की तरफ़ घुमाई। दरवाज़ा खुला था। बाहर अंधेरा था, और अंधेरे में कुछ नहीं दिख रहा था।
"वो अंदर आया," कालू काका ने धीरे से कहा। "हमारे बीच। और हमें पता नहीं चला।"
मैंने लुट्टन का सिर अपनी गोद में रखा। उसके होंठ हिल रहे थे।
"मैंने… मैंने शेड के बाहर… एक आदमी को खड़ा देखा था," उसने फुसफुसाया। "मैंने सोचा… भैरव का आदमी होगा… मैंने आवाज़ नहीं दी… मैं डर गया…"
"क्यों नहीं बोला?" मैंने कहा।
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