Spirit of a Fighter355 / 1295

Spirit of a Fighter – Chapter 355

7 min read November 5, 2026

श्यामू की आवाज़ फिर टूटी, पर इस बार उसने खुद को संभाला।

"उसी रात मैं अखाड़े से निकल गया। मेरे पास कहीं जाने की जगह नहीं थी। ये झोपड़ी मेरे भाई की थी, जो गाँव छोड़ चुका था। मैं यहाँ आ गया। मोहन और बिट्टो मेरे पास रहने लगे। और मैं ठीक होने लगा — धीरे-धीरे, सालों में। आज मैं चल तो सकता हूँ, पर बाँह वैसी नहीं हुई।

"और जानता है सबसे अजीब बात क्या है?" उसने मेरी तरफ़ देखा। "मेरे जाने के बाद भैरव ने मेरे बारे में कभी किसी से कुछ नहीं कहा। मानो मैं कभी अखाड़े में था ही नहीं। उसने मेरा नाम काग़ज़ों से ऐसे मिटा दिया जैसे कोई मिट्टी से पैर का निशान मिटा दे।"

मैंने गिलास उठाया और पानी पिया। मेरा गला सूख रहा था, पर पानी से कुछ ठीक नहीं हुआ।

"श्यामू काका," मैंने कहा। "एक बात पूछूँ?"

"पूछ।"

"तुमने आज तक किसी को क्यों नहीं बताया? पुलिस को, पंचायत को — किसी को?"

श्यामू कुछ देर चुप रहा। फिर उसने अपनी लाठी उठाई और उससे फर्श पर एक लकीर खींची।

"मैंने एक बार कहने की कोशिश की थी," उसने कहा। "तीन साल पहले। पंचायत के एक बैठक में। मैं उठा और बोला — सरपंच जी, मुझे कुछ कहना है। सरपंच ने मुझे देखा और मुस्कुराया। फिर बोला — बैठ जा, श्यामू। तू बीमार है।"

वो रुका।

"अगले दिन मेरी झोपड़ी के सामने दो आदमी खड़े थे। बोले — सरपंच जी ने कहा है कि तू अपने भतीजे-भतीजी को अकेला मत छोड़। कुछ हो गया तो सरपंच जी को ही दोष देंगे लोग।"

मेरे रोंगटे खड़े हो गए।

"इसलिए," श्यामू ने धीरे से कहा, "मैं चुप रहा। मैं अपना अपमान सह लेता, पर ये बच्चे… ये बच्चे मेरी जान हैं।"

उसकी आवाज़ भर्रा गई। उसने अपना चेहरा हाथों में छुपा लिया और कुछ देर ऐसे ही बैठा रहा।

मैंने उसकी तरफ़ देखा और मेरे अंदर कुछ पिघलने लगा। ये वो आदमी था जिसे भैरव ने इसलिए तोड़ा क्योंकि वो सच बोलना चाहता था। और आज तक वो इसलिए नहीं बोल पाया क्योंकि उसके सामने दो बच्चों की जान का सवाल था।

मैंने अपना हाथ बढ़ाया और उसके कंधे पर रखा। कुछ देर दोनों चुप बैठे रहे। बाहर से बिट्टो की आवाज़ आई — "काका, चाय बने?"

श्यामू ने चेहरा उठाया। उसकी आँखें लाल थीं, पर उसने मुस्कुराने की कोशिश की। "हाँ, बना दे। और मेहमान के लिए एक कटोरी और रख।"

फिर वो मेरी तरफ़ मुड़ा और उसकी आवाज़ बदल गई — अब वो टूटी हुई नहीं थी, बल्कि सख्त थी, पत्थर जैसी।

"अब तू बता," उसने कहा। "ये चाबी किसकी है?"

मैंने अपनी जेब से चाबी निकाली और उसे उसके सामने रख दिया।

"मुझे नहीं पता," मैंने कहा। "पर मैं जानना चाहता हूँ। सरपंच के कमरे में एक बंद दरवाज़ा है। श्यामू काका, तुमने कभी उस कमरे के बारे में सुना है? कभी वहाँ जाने की कोशिश की?"

श्यामू ने चाबी उठाई और उसे अच्छे से देखा। उसका चेहरा गंभीर हो गया।

"वो कमरा," उसने धीरे से कहा, "बीस साल पहले भैरव का कमरा हुआ करता था। अखाड़े के पीछे, उसी जगह जहाँ आज सरपंच का कमरा है। पर बीस साल पहले वहाँ एक दरवाज़ा था — लोहे का, भारी। भैरव उसे रात में खोलता और अंदर जाता। मैंने एक बार पूछा था — उस दरवाज़े के पीछे क्या है? तो वो हँसा और बोला — मेरा खज़ाना।"

श्यामू ने चाबी वापस मेरी हथेली पर रखी।

"पर सुन," उसने कहा। "वो दरवाज़ा आज भी वही है। मुझे पता है, क्योंकि दो महीने पहले मैं सरपंच के घर के पीछे से गुज़रा था — बिट्टो की दवा लेने शहर जाते वक़्त। और मैंने देखा — उस दरवाज़े की कुंडी पर वही निशान था। वही त्रिकोण, वही बिंदु।"

मेरे हाथों में वो चाबी भारी लगने लगी।

"तो ये चाबी उसी दरवाज़े की हो सकती है," मैंने कहा।

"हो सकती है," श्यामू ने कहा। "पर अगर है, तो सवाल ये है — ये चाबी तेरे हाथ कैसे पहुँची? और जो इसे तकिये के नीचे रख गया, वो क्या चाहता है?"

मैंने सिर हिलाया। यही सवाल मेरे दिमाग़ में घूम रहा था।

फिर मैंने उसकी आँखों में देखा। "श्यामू काका," मैंने कहा। "आज सुबह पंचायत के चबूतरे पर सबके सामने सच खुलेगा। मैं तुम्हें गवाही देने के लिए कह रहा हूँ। तुम गवाही दोगे?"

श्यामू रुक गया।

उसकी आँखें एकदम स्थिर हो गईं। उसने मेरी तरफ़ देखा, फिर दीवार पर टंगी उस तस्वीर की तरफ़ देखा — जहाँ रघुवीर उसके गले में हाथ डाले खड़ा था। फिर उसने दरवाज़े की तरफ़ देखा, जहाँ से बिट्टो चाय लेकर आ रही थी।

वो चुप रहा। इतनी देर चुप रहा कि मुझे लगा कि वो मना कर देगा।

फिर उसने धीरे से कहा, "हाँ।"

वो एक शब्द था, पर उसमें बीस साल का दर्द भरा था।

"पर," उसने उँगली उठाई, "एक शर्त है। पहले मेरे भतीजे-भतीजी को सुरक्षित रखना होगा। भैरव या सरपंच — कोई भी उन्हें उठा न ले। मैं गवाही दूँगा, चाहे मेरी जान चली जाए। पर ये बच्चे मेरी कमज़ोरी हैं, वीर। और मैं उन्हें दाँव पर नहीं लगा सकता।"

मैंने उसकी तरफ़ देखा और मेरे अंदर कुछ ठंडा हो गया। ये आदमी जिसे भैरव ने तोड़ दिया, वो अपनी जान की परवाह नहीं करता था, पर उन दो बच्चों के लिए हर चीज़ कुर्बान कर सकता था।

"मैं वादा करता हूँ," मैंने कहा। "पंचायत से पहले तुम्हारे भतीजे-भतीजी किसी ऐसी जगह होंगे जहाँ भैरव का आदमी पहुँच न सके।"

श्यामू ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में पानी था, पर उसने उसे पोंछा नहीं। "रघुवीर का बेटा है तू," उसने कहा। "मैंने तेरी आँखों में उसे देखा है। वो भी ऐसे ही वादा करता था — और निभाता था।"

मेरा गला भर आया। मैंने कुछ कहना चाहा, पर आवाज़ नहीं निकली। बिट्टो ने चाय रख दी और मैंने गर्म कटोरी दोनों हाथों में पकड़ ली। भाप मेरे चेहरे पर लगी और मेरी आँखों का पानी सूख गया।

श्यामू ने चाय का घूँट भरा और फिर कहा, "अब सुन, एक और बात। जो मैंने आज तक किसी को नहीं बताई।"

मैंने कटोरी नीचे रख दी।

"मैं जब अखाड़े में था," श्यामू ने कहा, "तो एक रात मैं भैरव के पीछे-पीछे उस कमरे तक गया। मैंने देखा — वो अंदर गया, और उसके साथ एक और आदमी था। मैंने दरवाज़े की दरार से झाँका। अंदर एक लोहे की अलमारी थी, जिसमें सैकड़ों काग़ज़ थे। और उस आदमी ने भैरव से कहा — 'भैरव, इस साल तीन और नाम जोड़ने हैं। तीनों की दवा तैयार है।'"

मेरी साँस रुक गई। "तीन और नाम? मतलब…"

"मतलब," श्यामू ने कहा, "वो आदमी भैरव से ऊपर था। भैरव सिर्फ़ हाथ था, वो दिमाग़। और जब वो आदमी बाहर निकला, तो मैंने उसे दूर से देखा।"

वो रुका। उसका हाथ काँप रहा था।

"कौन था?" मैंने पूछा, हालाँकि मुझे जवाब पता था।

"माधव सिंह," श्यामू ने धीरे से कहा। "आज का सरपंच। उस वक़्त भी वो पंचायत में था, बस मुखिया नहीं था।"

कमरे में सन्नाटा छा गया। इतना गहरा कि मुझे अपनी साँस की आवाज़ सुनाई दे रही थी।

फिर मैंने कटोरी उठाई और चाय खत्म कर दी। मेरे हाथ अब काँप नहीं रहे थे।

"श्यामू काका," मैंने कहा और खड़ा हो गया। "आज पंचायत में सिर्फ़ भैरव का सच नहीं खुलेगा। सरपंच का भी खुलेगा।"

श्यामू ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में डर था, पर उसके होंठों पर एक मुस्कान थी — पतली, काँपती, पर असली।

"जा," उसने कहा। "और सुन — अगर सरपंच तुझे रोके, तो उससे कहना कि श्यामू अभी ज़िंदा है। बस यही कह देना। वो समझ जाएगा।"

मैंने सिर हिलाया और दरवाज़े की तरफ़ बढ़ा।

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