Spirit of a Fighter354 / 1295

Spirit of a Fighter – Chapter 354

7 min read November 5, 2026

"तू जा," मीरा ने कहा। "मैं लुट्टन के पास हूँ। और हाँ —" उसने मेरी तरफ़ झुककर कहा, "ये चाबी मुझे दिखाना, जब लौटे। मुझे इसे अच्छे से देखना है।"

मैंने सिर हिलाया और श्यामू के पीछे चल पड़ा।

श्यामू की चाल धीमी थी। उसकी एक टाँग घसीटती थी और लाठी हर कदम पर ज़मीन टटोलती थी। हम गाँव के उस किनारे की तरफ़ बढ़े जहाँ पक्की सड़क खत्म हो जाती थी और खेत शुरू होते थे। दूर किसी खेत में पानी चल रहा था और उसकी कुलकुल आवाज़ सन्नाटे को काट रही थी।

"तू जानता है," श्यामू ने चलते-चलते कहा, "मैं इस गाँव का नहीं हूँ। पास के कसेरा गाँव से आया था। बीस साल पहले। उस वक़्त मेरी कमर इतनी पतली थी कि लोग कहते थे — अरे, ये लड़का तो हवा में उड़ जाएगा।"

वो रुका और मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में कुछ ऐसा था जो बूढ़े लोगों की आँखों में तभी आता है जब वो अपने खोए हुए जवानी को याद कर रहे हों।

"पर मेरी बाँहें," उसने कहा, "मेरी बाँहें ऐसी थीं कि अखाड़े का सबसे मोटा लट्ठ उठा लेती थीं। रणवीर सिंह ने खुद मुझे देखकर कहा था — श्यामू, तू तो पहलवानी के लिए बना है।"

"रणवीर सिंह ने?" मैंने पूछा।

"हाँ। वो तब अखाड़े के मालिक थे, भैरव सिर्फ़ उनका मुंशी हुआ करता था। छोटा-सा आदमी, सबका हिसाब रखता। धोती में घुसा रहता, किसी से ज़्यादा नहीं बोलता।" श्यामू ने थूककर कहा, "कौन जानता था कि वही हिसाब वाला आदमी एक दिन सबका हिसाब बिगाड़ देगा।"

हम एक छोटी-सी झोपड़ी के सामने पहुँचे। बाहर से देखकर वो किसी बंद पड़ी जगह जैसी लगी। दीवारों पर मिट्टी की परत उखड़ रही थी और दरवाज़े की कुंडी जंग खाई थी। पर अंदर से धुएँ की गंध आ रही थी — चूल्हे की, और उसमें मिली हुई थी सूखी लकड़ी की बू।

श्यामू ने दरवाज़ा धकेला और अंदर से एक आवाज़ आई — "काका, आप? मैंने सोचा आप रात भर नहीं लौटे।"

एक लड़का बाहर आया। उम्र कोई सोलह-सत्रह साल की होगी। दुबला, लंबा, आँखों में नींद और डर दोनों।

"ये मोहन है," श्यामू ने कहा। "मेरे भाई का बेटा। और अंदर उसकी बहन है, बिट्टो। दोनों मेरे पास रहते हैं। उनके माँ-बाप…" वो रुक गया। "उनके माँ-बाप गाँव छोड़कर चले गए थे, काम के लिए। अब मेरे पास ही हैं।"

मोहन ने मेरी तरफ़ देखा और श्यामू की तरफ़ ऐसे देखा जैसे पूछ रहा हो — ये कौन है?

"अंदर चल, मोहन," श्यामू ने कहा। "पानी रख दे। और बिट्टो को कह, पर्दा गिरा दे।"

अंदर का हिस्सा बाहर से बेहतर नहीं था, पर साफ़ था। एक चारपाई, एक छोटा चूल्हा, दीवार पर टंगी एक पुरानी तस्वीर — दो आदमियों की, जो एक-दूसरे के गले में हाथ डालकर खड़े थे। मैंने करीब जाकर देखा। एक आदमी श्यामू था — जवान, चौड़ी छाती, घनी दाढ़ी। और दूसरा…

मेरी साँस रुक गई।

"…रघुवीर," मैंने धीरे से कहा।

श्यामू ने मेरी नज़र के रास्ते देखा और सिर हिलाया। "हाँ। वो तेरा बाप था। और मेरा दोस्त। दोनों एक ही दिन अखाड़े में उतरे थे — उस दिन जो हुआ, वो आज तक मेरे सपने में आता है।"

मैं चारपाई पर बैठ गया। मेरे पैरों में अचानक वज़न आ गया।

"बैठ," श्यामू ने कहा। "कहानी लंबी है और तेरे पैर अभी थके हुए हैं। पंचायत में खड़ा होना है तुझे आज।"

मोहन ने पानी का गिलास रखकर बाहर चला गया। बिट्टो — एक छोटी लड़की, आठ-नौ साल की — दरवाज़े से झाँककर देख गई, फिर पर्दे के पीछे गायब हो गई।

श्यामू ने अपनी लाठी कोने में टिकाई और चारपाई के किनारे बैठ गया। फिर उसने अपनी दाहिनी बाँह की कमीज़ की आस्तीन ऊपर चढ़ाई।

मैंने देखा और मेरा पेट कड़ा हो गया।

उसकी बाँह पर, कंधे से कोहनी तक, चमड़ी सिकुड़ी हुई थी — ऐसे जैसे किसी पुराने कपड़े को जला दिया गया हो और वो सिकोड़कर एक जगह जम गया हो। मांस की जगह सिर्फ़ हड्डी और झुर्रीदार चमड़ी बची थी।

"देख," श्यामू ने कहा। "पहले ये ऐसी थी कि लोहा मोड़ देती थी।"

उसने अपनी बाँह उठाई, कोहनी मोड़ी, और उसे सामने किया। हाथ काँप रहा था।

"अब," उसने धीरे से कहा, "चाय का कप भी नहीं उठता।"

उसकी आवाज़ टूट गई। उसने हाथ नीचे किया और अपनी आस्तीन वापस चढ़ा दी, जैसे कोई घाव छुपा रहा हो।

मैं कुछ नहीं बोला। मेरे पास शब्द नहीं थे।

श्यामू ने एक गहरी साँस ली और बोलना शुरू किया।

"बीस साल पहले की बात है। उस वक़्त अखाड़े का हाल ऐसा था कि रोज़ शाम को मुकाबले होते थे। रणवीर सिंह मालिक थे, पर उनकी नज़र हर पहलवान पर थी। जो मेहनत करता, उसे वो खुद पानी पिलाते। और जो आलसी होता, उसे अखाड़े से बाहर का रास्ता दिखा देते।

"मैं नया था, पर मेरी बाँहें देखकर रणवीर सिंह ने मुझे सीधे बड़े मुकाबले में उतार दिया। तीसरे मुकाबले में मैंने अखाड़े के सबसे मोटे पहलवान को पछाड़ दिया। उस रात रणवीर सिंह ने मुझे अपने घर खाने पर बुलाया। मैंने सोचा — बस, अब तो ज़िंदगी बन गई।

"पर उसी हफ्ते रणवीर सिंह बीमार पड़ गए। पहले पैरों में झुनझुनी, फिर कमर में दर्द, फिर वो चलने-फिरने में कमज़ोर हो गए। और अखाड़े की कमान भैरव के हाथ में आ गई।"

श्यामू ने पानी का घूँट भरा।

"भैरव ने पहले महीने किसी को कुछ नहीं कहा। बस एक दिन मेरे पास आया और बोला — श्यामू, तू तो अखाड़े का शेर है। पर तेरी ताकत अभी आधी है। मेरे पास एक खास पानी है, जो सिर्फ़ चुनिंदा पहलवानों को देता हूँ। इसे पीकर तू दुगना हो जाएगा।

"मैंने पूछा — कैसा पानी? तो वो हँसा और बोला — बस पानी है, श्यामू। खेत का पानी जैसा। पर इसका राज़ यह है कि इसे तहखाने की मिट्टी में रखा जाता है।"

मेरी मुट्ठी अपने-आप भिंच गई।

"मैंने पिया," श्यामू ने कहा। "रोज़ एक गिलास। सुबह कसरत से पहले। और सच कहूँ तो — पहले तीन महीने में मुझे ऐसा लगा कि मैं आसमान छू रहा हूँ। जो पहलवान छह महीने में नहीं जीत सका, उसे मैंने एक झटके में गिरा दिया। लोग मेरी तारीफ़ करते। भैरव मेरे कंधे पर हाथ रखता और कहता — श्यामू, तू तो अखाड़े का सितारा है।"

वो रुका। उसकी आँखें दीवार पर टंगी उस पुरानी तस्वीर पर टिक गईं।

"फिर चौथे महीने में… मेरे हाथ काँपने लगे। मैंने सोचा, थकान होगी। पाँचवें महीने में लाठी उठाना मुश्किल हो गया। छठे महीने में मैं अखाड़े की सीढ़ी भी नहीं चढ़ पाता था। भैरव मेरे पास आया और बोला — श्यामू, तू बीमार है। आराम कर। मैंने कहा — भैरव, मुझे डॉक्टर के पास ले चल। वो हँसा और बोला — डॉक्टर क्या करेगा? ये तो कुदरत का सितम है।"

"कुदरत का सितम," मैंने दोहराया, और मेरी आवाज़ में कड़वाहट थी। "यही शब्द तो हरनाम ने सबके काग़ज़ों में लिखा है।"

"हाँ," श्यामू ने कहा। "और मेरे जीत के पैसे? जो मैंने छह महीने में जीते, वो सब भैरव ने अपने पास रख लिए। जब मैंने पूछा, तो बोला — तेरे इलाज में लग गए। मैंने कहा — कौन-सा इलाज? मैंने तो कोई दवा नहीं खाई। तो वो बोला — मैंने तेरे लिए दवा मँगवाई थी, तूने पी नहीं। अब दोष मेरा है?"

श्यामू ने अपनी छाती पर हाथ रखा।

"मैंने उस दिन अखाड़े में खड़े होकर सबके सामने कहा — भैरव, तूने मुझे ज़हर दिया है। मैंने कहा — मेरा शरीर तेरे पानी से टूटा है। और जानता है उसने क्या किया?"

मैंने सिर हिलाया।

"उसने मेरी तरफ़ देखा और मुस्कुराया। फिर धीरे से बोला — श्यामू, तू बीमार है। बीमार आदमी की बातें कोई नहीं सुनता। मैंने पूछा — क्यों नहीं सुनता? तो उसने मेरे कान के पास मुँह लाकर कहा — क्योंकि बीमार आदमी को लोग पागल समझते हैं। और पागल की बात कौन सुनता है?"

वेबसाइट पर अपनी पसंदीदा कहानियाँ मुफ्त पढ़ें और Story FM App पर उन्हीं कहानियों का शानदार Audio Experience लें।

यह कहानी Story FM app पर ऑडियो में भी सुनें — आगे के एपिसोड सबसे पहले वहीं आते हैं।

Audio mein suno

Apni raay likho