Spirit of a Fighter – Chapter 337
मैंने बोतल निकाली। कपड़ा खोला।
काँच पर कुछ नहीं था। साफ़।
"अभी तो…"
"मैंने देखा," मैंने कहा। "काँच पर लिखा था — 'वो तेरा है।' पानी के अंदर से। तीन शब्द। तीनों मैंने अपनी आँखों से देखे।"
मीरा ने बोतल को छुआ नहीं। उसने पहले कपड़ा हटाया, फिर बोतल को रोशनी में घुमाया, फिर उसके ढक्कन पर नज़र डाली।
"ये मोम की मुहर है," उसने कहा। "और मुहर पर निशान।"
"कैसा निशान?"
"देख।" उसने बोतल मेरी तरफ़ की। "ये मुहर हाथ से नहीं लगाई गई। ये यंत्र से लगी है। और ये यंत्र अखाड़े का नहीं है।"
"तो किसका है?"
मीरा ने बोतल मेज़ पर रखी।
"शहर के एक पुराने वैद्य का," उसने कहा। "जो बीस साल पहले मर गया। पर उसका यंत्र आज भी काम करता है।"
"कैसे?"
"क्योंकि जो उसका इस्तेमाल करता है, वो मरा नहीं।"
मीरा ने अपना बैग उठाया। उसने पर्ची, काग़ज़, और कुछ शीशियाँ निकालीं।
"चल," उसने कहा। "ये मुहर अभी है — ताज़ा है। मतलब किसी ने आज ही ये बोतल सील की है। और अगर ये सील अभी खुली, तो अंदर का ज़हर भी ताज़ा होगा।"
"तो?"
"तो हम इसकी जाँच अभी करेंगे।" उसने घड़ी देखी। "आठ बजे हैं। चपरासी दस बजे तक रहता है। हमारे पास दो घंटे हैं।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा।
"तूने मुझे बुलाया नहीं था," मैंने कहा। "तो तू क्यों तैयार थी?"
मीरा ने मेरी तरफ़ देखा।
"क्योंकि भैरव आज बहुत खुश था," उसने कहा। "जब मैं अखाड़े के बाहर से गुज़री, तो वो अपने कमरे से बाहर आया और मुझे देखकर मुस्कुराया। भैरव मुझे कभी नहीं देखता। आज उसने देखा। और मुस्कुराया।"
मेरी रीढ़ में ठंडी हवा दौड़ गई।
"मैंने भी सोचा," मैंने कहा। "वो खुश क्यों था?"
"क्योंकि वो जानता है कि हम कुछ ऐसा पकड़ने वाले हैं जो उसके हाथ में है," मीरा ने कहा। "और वो चाहता है कि हम उसे पकड़ें।"
"क्यों?"
"क्योंकि जो हम पकड़ेंगे, वो उसे तोड़ेगा नहीं। वो हमें तोड़ेगा।"
मीरा ने अपना बैग उठाया और दरवाज़े की तरफ़ चली।
"फिर भी जाना है?" मैंने पूछा।
उसने पलटकर मेरी तरफ़ देखा।
"हाँ," उसने कहा। "क्योंकि अगर हम नहीं जाएँगे, तो वो अगली बार किसी और के घर जाएगा। और वहाँ शायद गुड़िया हो।"
वो रुकी। और फिर बोली, "या तेरी माँ हो।"
मैंने कुछ नहीं कहा। मैं उसके पीछे चल पड़ा।
लैब अंधेरे में थी। मीरा ने लाइट जलाई। सफ़ेद रोशनी से मेरी आँखें चौंधिया गईं।
लैब के अंदर एक लंबी मेज़ थी, काँच की प्लेटें, शीशियाँ, और एक कोने में छोटा-सा तराज़ू। मीरा ने अपना बैग मेज़ पर रखा और एक सफ़ेद कोट पहना।
"वहाँ बैठ," उसने कोने की तरफ़ इशारा किया।
मैं बेंच पर बैठ गया।
मीरा ने बोतल उठाई। उसने मोम की मुहर को चाकू से धीरे-धीरे खुरचा। मुहर टूटी।
और जैसे ही ढक्कन खुला, कमरे में एक गंध फैल गई।
मैं उठ खड़ा हुआ। मेरी नाक में वो गंध घुसी और मेरा सिर चकराया।
"इसे बंद कर," मैंने कहा। "इसे बंद कर, मीरा।"
मीरा ने मेरी तरफ़ देखा। उसका चेहरा सफ़ेद था।
"तू इसे सूंघ रहा है?"
"हाँ। और ये…" मैंने अपना मुँह ढका। "ये वही गंध है जो पापा के शरीर से आई थी। मरने से पहले।"
मीरा ने ढक्कन बंद नहीं किया। उसने बोतल को अपनी नाक के पास लाया और धीरे से सूंघा।
और वो पीछे हट गई। उसका हाथ मुँह पर चला गया।
"मांदर की जड़," उसने फुसफुसाया। "नागदौन। और…" उसने फिर सूंघा। "और कुछ जो मैं पहचान नहीं पाती।"
उसने बोतल से एक बूँद काँच की प्लेट पर डाली। बूँद लाल थी, गाढ़ी, जैसे खून।
"इसमें खून मिला है," मीरा ने कहा।
"किसका?"
"यही तो सवाल है।"
उसने एक और बूँद दूसरी प्लेट पर डाली। फिर एक तीसरी। फिर उसने अपनी अलमारी से कुछ शीशियाँ निकालीं और एक-एक करके उनमें मिलाने लगी।
मैं पीछे बैठा देखता रहा।
मीरा के हाथ काँप रहे थे।
वो एक शीशी उठाती, उसमें से दो बूँद डालती, फिर मिलाती। फिर रुककर सोचती। फिर फिर मिलाती। उसके माथे पर पसीना आ गया था, पर वो पोंछती नहीं थी।
एक बार उसकी उँगली काँच की प्लेट से टकराई और प्लेट खिसक गई। वो उसे पकड़ने के लिए झुकी, और उसका हाथ काँपा।
मैंने कहा, "मीरा…"
"चुप," उसने कहा। पर आवाज़ में गुस्सा नहीं था। थकान थी।
वो फिर काम में लग गई।
मैं उसकी तरफ़ देखता रहा। उसके हाथ। लंबी उँगलियाँ। उँगलियों पर हल्के निशान — कहीं कटे थे, कहीं जले थे। छोटे-छोटे निशान। जैसे कोई रोज़ काँच की चीज़ों से खेलता हो।
और वो हाथ काँप रहे थे।
इतने काँप रहे थे कि एक बार उसने शीशी मेज़ पर रखी और अपनी उँगलियाँ मुट्ठी में भींच लीं।
फिर उसने आँखें बंद कीं। दो बार साँस ली। और फिर काम में लग गई।
मैंने कुछ नहीं कहा।
कुछ देर बाद उसने पीछे मुड़कर मेरी तरफ़ देखा।
"तूने ये बोतल उठाते वक़्त क्या सोचा था?"
सवाल अचानक आया। मैं तैयार नहीं था।
"क्या?"
"जब तूने ये बोतल उठाई," उसने कहा। "अखाड़े के कमरे में। जब तेरे हाथ में आई। तब तूने क्या सोचा?"
मैं एक पल चुप रहा।
"मैंने सोचा," मैंने धीरे से कहा, "कि अगर आज पकड़ा गया, तो मेरी माँ को कौन खाना देगा।"
मीरा ने मेरी तरफ़ देखा।
लंबा देखा।
फिर उसने धीरे से कहा, "मेरे पापा को भी कोई खाना देने वाला नहीं है।"
कमरे में चुप्पी छा गई।
ऐसी चुप्पी जिसमें शब्दों की ज़रूरत नहीं थी। सिर्फ़ शीशियों की खनक, और बाहर से आती हवा की आवाज़, और मेरी अपनी साँस।
मीरा ने पलटकर फिर काम शुरू किया। पर इस बार उसके हाथ काँप नहीं रहे थे।
मैंने देखा उसने शीशी उठाई, दो बूँद डालीं, और मिलाया। फिर उसने रोशनी में प्लेट उठाई और उसे घुमाया।
और उसका चेहरा बदल गया।
सफ़ेद। बिलकुल सफ़ेद।
"वीर," उसने धीरे से कहा।
मैं उठकर उसके पास गया।
"देख।"
उसने काँच की प्लेट रोशनी में उठाई। उसमें एक पतली सी लकीर बन गई थी। नीली-हरी।
"ये क्या है?" मैंने पूछा।
मीरा ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में कुछ था जो मैंने पहले नहीं देखा था। डर। असली डर।
"ये वो चीज़ है," उसने कहा, "जो मेरे पापा की दवा में है।"
मेरा सिर घूम गया।
"क्या मतलब?"
"मेरे पापा की दवा में एक चीज़ मिली है," उसने कहा। "जो उनके दर्द को कम करती है। पर उनके पैरों को और सुन्न कर देती है। मैं दो साल से यही ढूँढ रही हूँ — कि ये चीज़ है क्या। आज मिल गई।"
उसने प्लेट मेज़ पर रखी।
"ये वही चीज़ है, वीर। वही।" उसकी आवाज़ टूट रही थी। "जो पापा को बचाने के लिए देता है, उसी दवा में मारने वाली चीज़ मिला रहा है।"
मैंने प्लेट को देखा। नीली-हरी लकीर। छोटी सी। मासूम सी।
"मतलब भैरव…" मैंने कहा।
"भैरव दवा देता है," मीरा ने कहा। "पर दवा में ज़हर मिलाता है। हर बार। थोड़ा-थोड़ा। इतना कि पापा को पता न चले। और इतना कि वो हमेशा बीमार रहें। हमेशा।"
उसकी आवाज़ रुक गई।
"बीस साल से, वीर," उसने कहा। "बीस साल से मेरे पापा को वो अपनी दवा से बाँधे हुए है।"
मेरे हाथ मुट्ठी में बंध गए।
"तो पापा जानते हैं?" मैंने पूछा।
"नहीं," मीरा ने कहा। "और यही सबसे बड़ी बात है।" उसने मेरी तरफ़ देखा। "अगर मैंने उन्हें बता दिया, तो वो दवा लेना बंद कर देंगे। और उस दिन भैरव को पता चल जाएगा कि मैं जान गई हूँ।"
"तो क्या करें?"
मीरा ने प्लेट उठाई। उसने मुझे दी।
"तू इसे सूंघ," उसने कहा।
मैंने प्लेट नाक के पास की। एक गहरी साँस ली।
और मेरी आँखें खुल गईं।
"ये…"
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