Spirit of a Fighter336 / 1295

Spirit of a Fighter – Chapter 336

7 min read November 5, 2026

"तू झूठ बोल रहा है," मैंने कहा। आवाज़ फटी हुई निकली। "मेरे पापा मर गए। दो पापा मरे। तीसरा कहाँ से आया?"

बूढ़े ने कुछ नहीं कहा। उसने बस अपनी कलाई आगे की।

लालटेन की रोशनी उस पर पड़ी।

और मैंने वो निशान देखा। जला हुआ, पुराना, ऐसा ही जैसा मेरी कलाई पर है।

मेरी साँस रुक गई।

"तू जगदीश का बेटा नहीं है," बूढ़े ने धीरे से कहा। "तू रघुवीर का बेटा है। और मैं रघुवीर का दोस्त हूँ। मेरा नाम रामदीन है।"

"रामदीन?" कालू काका आगे आए। उनकी आवाज़ काँप रही थी। "तू… तू कुएँ में नहीं है? मैंने सुना था तू बंद है।"

"बंद हूँ," रामदीन ने कहा। "पर उस कुएँ में नहीं जिसमें तू सोचता है। मैं बंद हूँ उस कमरे में जिसे कोई ढूँढ नहीं सकता।" उसने मेरी तरफ़ देखा। "और मैं आज बाहर आया हूँ क्योंकि आज रात भैरव को कुछ पता चल गया है। वो जान गया है कि तू सच के कितने करीब है।"

मेरा सिर घूमने लगा।

"रुको," मैंने कहा। मैंने हाथ उठाया। "रुको। तुम कह रहे हो कि तुम मेरे पापा के दोस्त हो, तुम कुएँ में बंद थे, और तुम आज बाहर आए हो। तो ये सब इतना आसान कैसे?"

रामदीन मुस्कुराया। पर वो मुस्कान में कुछ दर्द था।

"आसान नहीं है, बेटा," उसने कहा। "बीस साल लगे मुझे उस कमरे का दरवाज़ा खोलने में। बीस साल। हर रात मैं उस दीवार को खुरचता था जिसके पीछे तू रहता है। और हर सुबह भैरव आकर देखता था कि कहीं मैं निकल न गया हो।"

"तो आज कैसे निकले?"

"आज उसने मुझे खुद निकाला," रामदीन ने कहा। "क्योंकि आज उसे लगा कि मैं उसके काम आ सकता हूँ। उसने मुझे बाहर निकाला और कहा — जा, उस लड़के से बात कर, और उसे रास्ते से हटा।"

मेरे रोंगटे खड़े हो गए।

"तो तुम भैरव के आदमी हो?"

"मैं भैरव का आदमी नहीं हूँ," रामदीन ने कहा। और उसकी आवाज़ में पहली बार कुछ गरमी आई। "मैं तेरे पापा का आदमी हूँ। और मैं बीस साल इसी दिन का इंतज़ार कर रहा था — जिस दिन मैं रघुवीर के बेटे से मिलूँ।"

कालू काका ने मेरा कंधा दबाया।

"वीर," उन्होंने कहा। "ये आदमी सच बोल रहा है। मैंने इसे बीस साल पहले भैरव के साथ देखा था। पर तब मुझे लगा ये भी भैरव जैसा है।"

रामदीन ने कालू काका की तरफ़ देखा।

"तू वही कालू है," उसने कहा। "जो उस रात मिट्टी सींच रहा था जब रघुवीर गिरा था।"

कालू काका ने सिर नीचा कर लिया।

मेरे दिल में बहुत कुछ चल रहा था। गुस्सा, डर, हैरानी — सब एक साथ। मैंने जेब में हाथ डाला। बोतल वहीं थी। गरम। अब भी गरम।

"तुम्हें भैरव ने भेजा है," मैंने कहा। "तो तुम भैरव के आदमी हो। बस तुम मुझे भैरव के खिलाफ़ भड़का रहे हो ताकि मैं कुछ गलत कर बैठूँ।"

रामदीन ने मेरी तरफ़ देखा। लंबा देखा।

"तेरे पापा ने भी पहली बार मुझ पर शक किया था," उसने कहा। "तब मैंने उनसे कहा था — शक करना ठीक है। पर शक करते-करते मौका मत गँवा देना।"

वो कुएँ के ढक्कन से उतरा। उसकी चाल धीमी थी, जैसे जोड़ दुख रहे हों।

"मैं तुझसे कुछ नहीं माँगता," उसने कहा। "मैं बस एक बात बताने आया हूँ। भैरव आज रात कुएँ की सीढ़ियाँ तुड़वा रहा है। वो कल से पहले तहखाने की मिट्टी उठा लेगा। और अगर वो मिट्टी उसके हाथ लग गई, तो फिर कोई उसे नहीं रोक सकेगा।"

"मिट्टी से क्या होगा?" मैंने पूछा। "मिट्टी तो मिट्टी है।"

रामदीन ने मेरी आँखों में देखा।

"तू मिट्टी को नहीं जानता," उसने कहा। "तू सिर्फ़ उसे सूंघता है। पर उसमें जो है, वो तेरे पापा जानते थे। रघुवीर ने उस मिट्टी से अपने घाव भरे थे। उसी मिट्टी से उसने एक बार भैरव को हराया था। और उसी मिट्टी को भैरव बीस साल से चुराना चाहता है।"

कालू काका ने धीरे से कहा, "वो सही कह रहा है, वीर।"

मैंने बोतल जेब से निकाली। लालटेन की रोशनी में उसे देखा। काँच पर लिखे तीन शब्द अब मिट गए थे।

"ये बोतल तुम्हारी है?" मैंने रामदीन से पूछा।

"नहीं," उसने कहा। "ये माधव सिंह की है।"

"माधव सिंह कौन है?"

रामदीन ने कुछ देर मेरी तरफ़ देखा। फिर उसने कहा, "अभी वक़्त नहीं है। अभी तुझे बोतल मीरा के पास ले जानी है। वो इससे ज़्यादा बता सकेगी। मैं तुझे अगली बार मिलूँगा — पर अकेले।"

"कब?"

"जब तेरे पास वो हो जो मैं तुझे दूँगा।" उसने अपनी जेब से कुछ निकाला। एक छोटी सी, मुड़ी-तुड़ी पर्ची। "ये रघुवीर की लिखाई है। इसे तू अपने पास रख। जब भैरव तुझे तोड़ने की कोशिश करे, तो ये निकाल देना।"

मैंने पर्ची ली। काग़ज़ पुराना था, मुलायम, जैसे सैकड़ों बार मोड़ा गया हो।

"और वीर," रामदीन ने कहा। "तेरी माँ को बता देना — रामदीन ज़िंदा है। वो रोएगी। पर उसे बताना।"

फिर वो पलटा और अंधेरे में चला गया।

मैं कुछ कहने के लिए मुँह खोलने ही वाला था कि कालू काका ने मेरा हाथ पकड़ लिया।

"मत बुला," उन्होंने कहा। "वो जब चाहेगा, खुद आएगा।"

मैंने पर्ची खोली। कालू काका ने लालटेन पास की।

पर्ची पर सिर्फ़ दो लाइनें थीं। रघुवीर की लिखाई। मैंने उसे पहचाना — वही अक्षर जो माँ ने मुझे दिखाए थे पीले काग़ज़ पर।

"जो मिट्टी को अपना कहेगा, मिट्टी उसे अपना बनाएगी। जो उसे बेचेगा, वो मिट्टी में मिल जाएगा।"

मेरे हाथ काँप गए।

"काका," मैंने कहा। "अब मुझे मीरा के पास जाना है।"

कालू काका ने मेरी तरफ़ देखा।

"जा," उन्होंने कहा। "पर रास्ते में पीछे मत देखना।"

मैंने पर्ची अपनी धोती की कमर में खोंस ली। बोतल को कपड़े में लपेटा। और चल पड़ा।

रास्ते में भैरव की बात मेरे दिमाग में चल रही थी। वो कुएँ पर खुश क्यों था? उसने मुझे रोका नहीं, पकड़ा नहीं। जबकि वो जानता था कि मैं उसके कमरे में घुसा था। जबकि वो जानता था कि मेरे पास उसकी बोतल है।

तो वो खुश क्यों था?

जब कोई आदमी खुश होता है जबकि उसे दुखी होना चाहिए — तो उसका मतलब है वो कुछ जानता है जो हम नहीं जानते।

मैंने कदम तेज़ किए।

मीरा का घर खाली था। दरवाज़े पर ताला लगा था। मैंने मन में गिनती की — उसका कॉलेज इस वक़्त खुला रहता है। मैंने रास्ता बदला और सीधे कॉलेज की तरफ़ चल पड़ा।

कॉलेज का गेट खुला था। अंदर जाते ही सन्नाटा। शाम हो चुकी थी, सिर्फ़ एक चपरासी गेट के पास चारपाई पर बैठा पान खा रहा था।

"मैडम मीरा?" मैंने पूछा।

उसने मुँह में पान दबाकर कहा, "लैब में होगी। आख़िरी बिल्डिंग, दूसरी मंज़िल।"

मैं सीढ़ियाँ चढ़ा। दूसरी मंज़िल पर एक कमरे से पीली रोशनी आ रही थी।

मैंने दरवाज़ा खटखटाया।

"आ जाओ," मीरा की आवाज़ आई। "मैंने तुम्हारा ही इंतज़ार किया था।"

मैं अंदर गया। कमरे में जड़ी-बूटियों की तेज़ गंध थी। तुलसी, अदरक, और कुछ और जो मैं पहचान नहीं पाया। दीवारों पर शीशियों की अलमारियाँ थीं, बीच में लकड़ी की एक लंबी मेज़, और कोने में एक बड़ा-सा तराज़ू।

मीरा ने मेरी तरफ़ देखा। उसके हाथों में एक छोटा-सा काँच का बर्तन था।

"तूने कुछ पीया?" उसने पूछा।

"नहीं।"

"कुछ खाया?"

"नहीं।"

"कुछ सूंघा?"

मैं एक पल रुका।

"बोतल," मैंने कहा। "बोतल सूंघी।"

मीरा ने मेरी तरफ़ देखा। फिर उसने अपना बर्तन मेज़ पर रखा और मेरे पास आई। उसने मेरी नाड़ी पकड़ी।

"तू अभी भी गरम है," उसने कहा। "बोतल की गंध तुझ पर चढ़ गई है। इसे सूंघना ठीक नहीं था, वीर।"

"मैंने चाहकर नहीं सूंघा," मैंने कहा। "बोतल ने खुद मुझे बुलाया।"

मीरा ने मेरी आँखों में देखा। लंबा देखा।

"क्या बोला बोतल ने?"

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