Spirit of a Fighter – Chapter 324
मेरी नाक खुद-ब-खुद तस्वीर के करीब गई। बेवकूफ़ी थी, मुझे पता था। काग़ज़ की गंध क्या होगी, बीस साल पुरानी स्याही की गंध। पर मेरी नाक को फ़र्क नहीं पड़ता। जब वो पहचान लेती है, तो पहचान लेती है।
उस तस्वीर से वो गंध आ रही थी। वो गंध जो रात को माँ के आँचल में बसती है। वो गंध जो मेरे बचपन के किसी कोने में छुपी बैठी थी, जिसे मैं नाम नहीं दे सकता था, पर जिसे मेरा सीना जानता था।
"ये…" मेरी आवाज़ फट गई। मैंने गला साफ़ किया। "ये रघुवीर हैं। मेरे पापा।"
कालू काका दरवाज़े से अंदर आए। उनके कदम धीमे थे, जैसे ज़मीन उनके नीचे से खिसक रही हो। वो मेरे पास आए और तस्वीर पर झुके।
"हाँ," उन्होंने कहा। "ये रघुवीर हैं। और ये तस्वीर उस दिन की है जिस दिन इन तीनों ने अखाड़े की मिट्टी में हाथ डालकर क़सम खाई थी।"
"तीनों?"
कालू काका ने तस्वीर पलटी।
पीछे, पुरानी स्याही में, काँपते हाथ से कुछ लिखा था। स्याही फीकी पड़ गई थी, पर अक्षर साफ़ थे। मैंने लालटेन करीब की और पढ़ा।
«हम तीन, एक मिट्टी के।»
मेरी नाक के पीछे एक झटका लगा। तीन। तस्वीर में दो थे।
"तीसरा कौन?" मैंने पूछा।
कालू काका ने कोई जवाब नहीं दिया। मैंने उनकी तरफ़ देखा। उनकी आँखें तस्वीर पर टिकी थीं, और उन आँखों में पानी भर आया था। बूढ़े आदमी का पानी। ऐसा पानी जो बहुत सालों से रुका हुआ था और अब खुद-ब-खुद आ गया था।
"काका?"
"तीसरा…" उन्होंने आवाज़ निकाली, पर वो टूट गई। उन्होंने हथेली से आँखें पोंछीं और सीधे खड़े हो गए। "तीसरा वो था जिसने इस अखाड़े को अपना घर बनाया। जो रणवीर और रघुवीर का सबसे पक्का दोस्त था। जिसे रणवीर अपने घर का बेटा मानता था।"
वो रुके। उनका गला फिर सूखा।
"और फिर उसी ने सबको ज़हर देना शुरू किया।"
मेरे हाथ से तस्वीर फिसल गई। वो ज़मीन पर गिरी और मिट्टी में उसका कोना दब गया। मैंने उसे उठाने की कोशिश की, पर मेरी उँगलियाँ काम नहीं कर रही थीं।
"उसका असली नाम मोहन था," कालू काका ने कहा। उनकी आवाज़ अब काँप नहीं रही थी — वो ठंडी हो गई थी, जैसे कोई पुरानी किताब पढ़ रहा हो। "मोहन सिंह। रामपुर के बाहर, उस पार के गाँव का। रघुवीर और रणवीर उसे अपने से भाई मानते थे। तीनों साथ उठते, साथ मिट्टी गूंधते, साथ खाते। एक ही थाली में।"
उन्होंने मेरे हाथ से तस्वीर ली और उसे अपने सीने से लगाया।
"पर मोहन के दिल में कुछ और था। वो रणवीर से जलता था। रणवीर जीतता था, मोहन हारता था। और हर हार के बाद उसके अंदर कुछ मरता था — कुछ अच्छा। और जो मरता था, उसकी जगह कुछ और भरता जाता था।"
"फिर क्या हुआ?" मेरी आवाज़ बहुत छोटी निकली।
"फिर उसने मिट्टी से दोस्ती तोड़कर पानी से दोस्ती कर ली," कालू काका ने कहा। "उसने रघुवीर से ज़हर बनाना सीखा। रघुवीर खुद उसे सिखाता था — जड़ी-बूटियों का खेल, कौन सी चीज़ किसके साथ मिले तो क्या बने। रघुवीर को लगता था वो उसे दवा बनाना सिखा रहा है। और मोहन दवा से ज़हर बनाता रहा।"
मैंने अलमारी की तरफ़ देखा। बोतलों की कतारें। सफ़ेद तलछट।
"और आज वो मोहन…"
"आज वो भैरव सिंह है," कालू काका ने कहा।
फिर वो मेरे सामने आए और मेरी आँखों में देखा।
"और बेटा, सबसे बड़ी बात — जो चीज़ भैरव को सबसे ज़्यादा डराती है, वो इस अलमारी में नहीं। वो इस डिब्बे में है।"
मैंने डिब्बे में देखा। तस्वीर के नीचे काग़ज़ों की गड्डी थी। छोटी-छोटी पर्चियाँ, रसीदें, कुछ पुराने काग़ज़ जो पीले पड़ गए थे। और उन सबके नीचे, सबसे नीचे, एक तिकोना काग़ज़ — मोटा, हाथ से लिखा हुआ।
कालू काका ने उसे उठाया और मेरी तरफ़ बढ़ाया।
"ये वो काग़ज़ है," उन्होंने कहा। "इस पर तीनों के हस्ताक्षर हैं। तीनों के। रणवीर, रघुवीर, और मोहन। इसमें लिखा है कि अखाड़े की मिट्टी किसी की जागीर नहीं होगी। न रणवीर की, न रघुवीर की, न मोहन की। जो इस मिट्टी में पसीना डालेगा, वो इसका होगा।"
मैंने काग़ज़ पकड़ा। काग़ज़ भारी था, हाथ में ऐसा लगा जैसे कोई ईंट हो। नीचे तीन अंगूठे के निशान थे — लाल स्याही में, एक-एक करके, और उनके नीचे तीन नाम।
रणवीर। रघुवीर। मोहन।
तीसरे नाम पर मेरी उँगली रुक गई। उसके नीचे एक छोटी सी टेढ़ी लाइन खिंची थी, जैसे किसी ने उसी कलम से, उसी पल, किसी बात पर भरोसा जताया हो।
"भैरव इस काग़ज़ से डरता है," कालू काका ने कहा। "क्योंकि ये साबित करता है कि अखाड़ा उसका नहीं था, न कभी रहा। और ये तीनों के हाथ से लिखा है — किसी वकील का काग़ज़ नहीं, अपने हाथ का काग़ज़। पंचायत इस एक काग़ज़ को देखकर उसकी सारी ज़मीन उससे छीन सकती है।"
मैंने काग़ज़ को अपनी धोती में लपेटा, बहुत संभालकर, जैसे माँ रोटी लपेटती है।
"काका," मैंने कहा, "ये काग़ज़ आपके पास बीस साल से था?"
"नहीं बेटा।" उन्होंने सिर हिलाया। "ये काग़ज़ मेरे पास नहीं था। ये काग़ज़ भैरव के पास था। वो इसे जलाना चाहता था, पर जला नहीं पाया। इसलिए उसने इसे इस डिब्बे में बंद कर दिया, ताले में नहीं, पर अपने डर में। और आज…"
वो रुके। उनकी आँखें दरवाज़े की तरफ़ उठीं।
"आज वो डर खुल गया।"
और तभी दरवाज़े पर हाथ पड़ा।
एक ज़ोर का हाथ, जिससे दरवाज़े की चौखट हिल गई। मैंने कूदकर देखा — दरवाज़ा काँप रहा था, उसके नीचे की मिट्टी झड़ रही थी।
"कालू!"
वो आवाज़। भैरव की आवाज़। पर इस बार मीठी नहीं थी। इस बार वो गुड़ जैसी नहीं थी। इस बार वो किसी ऐसे जानवर की आवाज़ थी जिसे पता चल गया हो कि उसके बाड़े का दरवाज़ा खुला है।
"कालू, तू अंदर है न! मुझे पता है! मैंने तेरी लालटेन देखी, तूने सोचा मैं नहीं देखूँगा?"
दरवाज़े पर फिर हाथ पड़ा। इस बार ज़्यादा ज़ोर से। चौखट के ऊपर से मिट्टी गिरी और मेरे सिर पर आकर बिखरी।
"काका," मैंने फुसफुसाया। "छिप जाओ।"
"नहीं।" कालू काका बिलकुल नहीं हिले। उन्होंने अपनी कमर सीधी की — वो कमर जो बीस साल से झुकी हुई थी — और मुझे देखा। "बेटा, ये दरवाज़ा ज़्यादा देर नहीं टिकेगा। भैरव के साथ आदमी हैं। मैंने बाहर से लुट्टन की आवाज़ सुनी है।"
मेरा पेट ठंडा हो गया।
"लुट्टन?"
"हाँ। और एक और आवाज़ थी — वो मोटी आवाज़, हरनाम की।"
मैंने काग़ज़ अपनी छाती से लगाया। मेरी साँस तेज़ हो गई थी। अलमारी खुली थी, बोतलें अंदर थीं, काग़ज़ों की गड्डियाँ थीं — अगर भैरव ने ये सब देख लिया तो एक पल में सब जल जाएगा।
"काका," मैंने कहा, "आपको इस काग़ज़ को लेकर भागना होगा।"
"मैं नहीं भागूँगा।" उन्होंने मेरा कंधा पकड़ा। उनकी पकड़ सूखी थी, पर मज़बूत थी — वो ताकत जो बूढ़े लोगों के हाथों में होती है, जो पूरी ज़िंदगी मिट्टी में काम करते हैं। "तू भागेगा।"
"पर—"
"सुन।" उनकी आवाज़ बहुत धीमी हो गई, बहुत पास। "ये दरवाज़ा जब टूटेगा, तो भैरव पहले मुझे देखेगा। मैं दरवाज़े के सामने खड़ा होऊँगा, हाथ जोड़कर, गिड़गिड़ाते हुए। वो सोचेगा कि मैं चोरी-चोरी यहाँ आया था, कुछ ढूँढ रहा था। उसे ज़रा भी शक नहीं होगा कि तू अंदर है।"
"और मैं?"
"तू पीछे वाली खिड़की से निकलेगा।"
मैंने पीछे देखा। उस कमरे की पीछे की दीवार पर एक छोटी खिड़की थी, ऊँची, संकरी। मैं उससे निकल सकता हूँ, पर मुश्किल से।
"काका, वो खिड़की बहुत छोटी है।"
वेबसाइट पर अपनी पसंदीदा कहानियाँ मुफ्त पढ़ें और Story FM App पर उन्हीं कहानियों का शानदार Audio Experience लें।
यह कहानी Story FM app पर ऑडियो में भी सुनें — आगे के एपिसोड सबसे पहले वहीं आते हैं।
Audio mein suno