Spirit of a Fighter308 / 1295

Spirit of a Fighter – Chapter 308

6 min read November 5, 2026

मेरे पेट में ठंड फैल गई। कुदाल।

"तू इस वक़्त कहाँ जा रहा है?" उन्होंने मेरा हाथ नहीं छोड़ा।

मैंने सोचा। क्या बताऊँ? कि लुट्टन मर रहा है, कि मीरा ने जड़ी-बूटियों की पर्ची दी है, कि वैद्य का घर नहर के पार है? सुक्खी बुआ की ज़ुबान ईंट से भी बोझिल है।

"बुआ, बस एक काम से। तुम घर जाओ। और किसी से ये बात मत कहना। वो लालटेन, वो रास्ता — कुछ भी।"

उन्होंने मेरी आँखों में देखा। फिर मेरा हाथ छोड़ा। "जा। पर रास्ते में नीम के पेड़ के पास मत रुकना। वहाँ से वो नीचे उतरा था।"

मैं चला। नहर तक का रास्ता खाली था। पर मेरी पीठ पर आँखें महसूस हो रही थीं। मैंने पलटकर नहीं देखा। पुराने वैद्य का घर नीम के पेड़ के उस पार था। मैंने पेड़ के पास से गुज़रते वक़्त साँस रोक ली। वहाँ कुछ नहीं था। पर मिट्टी पर ताज़े निशान थे। जूतों के। बड़े। और उनके साथ किसी लंबी चीज़ का घसीटता हुआ निशान।

मैं वैद्य के दरवाज़े तक पहुँचा। खटखटाया। कोई जवाब नहीं।

"बाबा, मैं वीर हूँ। ईंट ढोने वाला। मेरा काम है।"

अंदर कोई हिला। दरवाज़ा आधा खुला। बूढ़े वैद्य ने मेरा चेहरा देखा, फिर बाहर, फिर मेरा चेहरा।

"तुझे किसने भेजा?"

"मीरा। भैरव की बेटी।"

उनके हाथ काँपे। "उस लड़की ने मुझे पहले कभी नहीं बुलाया।" वो झिझके। "क्या हुआ है?"

"एक लड़का मर रहा है। ज़हर पी लिया। उल्टी की, पर कुछ अंदर रह गया है।"

वैद्य ने मेरी तरफ़ देखा। फिर धीरे से बोले, "कौन लड़का?"

"लुट्टन।"

उनका चेहरा बदल गया। "भैरव का पहलवान?" उन्होंने दरवाज़ा और खोला। "अंदर आ। जल्दी।"

अंदर जड़ी-बूटियों की गंध थी, और किसी पुरानी बीमारी की गंध। वैद्य ने अलमारी खोली। मैंने मीरा की पर्ची उन्हें दी। उन्होंने पढ़ी, फिर एक-एक चीज़ पोटली में डालने लगे।

"बाबा, जल्दी।"

"जल्दी से पत्ते नहीं टूटते।" उन्होंने कहा। फिर रुके। "एक बात कहूँ? ये ज़हर कोई आम नहीं है। मैंने इसका स्वाद पहचाना है। ये मांदर का ज़हर है। इसे बनाने वाले दो ही लोग हैं — मैं और भैरव।"

मेरे हाथ ठंडे हो गए।

वैद्य ने पोटली मेरे हाथ में रखी। "जा। पर रास्ते में नीम के पेड़ के पास से मत जाना। नहर के किनारे-किनारे जा।"

मैं भागा। नहर के किनारे कीचड़ था, पर मैंने पैर नहीं रोके। दूर से अखाड़े की दीवार दिख रही थी। और उसी वक़्त मुझे पीछे से आवाज़ आई —

"वीर सिंह।"

वो आवाज़ मीठी थी। बहुत मीठी। जैसे कोई बच्चे को बुला रहा हो।

मैं पलटा। सामने भैरव खड़ा था। अकेला। हाथ में लालटेन। मुस्कुरा रहा था।

"इतनी रात को? और हाथ में पोटली?" उसने कदम बढ़ाया। "किसके लिए दवा लेकर आ रहा है, बेटा?"

मैं पोटली पीछे छिपा गया। "बस… अपने लिए।"

"अपने लिए।" उसने सिर हिलाया। फिर धीरे से, बहुत धीरे से कहा, "तू बड़ा दयालु है, वीर सिंह। पर याद रख, दया उसी पर करना जिसे बचाना हो। लुट्टन को मैं बचाऊँगा या मारूँगा, ये मेरे हाथ में है।" वो मेरे और पास आया। उसकी लालटेन की रोशनी मेरे चेहरे पर पड़ी। उसकी मूँछों के नीचे मुस्कान थी, जो डराती थी। "तू अपने हाथ में क्या रखेगा — मीरा का हाथ या उसकी लाश?"

॥

"तू अपने हाथ में क्या रखेगा — मीरा का हाथ या उसकी लाश?"

भैरव की लालटेन की रोशनी मेरे चेहरे पर पड़ी रही। मैंने पोटली पीछे की। उसकी मूँछों के नीचे वो मुस्कान थी जो गुड़ जैसी दिखती है और कुएँ जैसी लगती है।

"मेरे हाथ में कुछ नहीं है, सर।" मैंने अपनी आवाज़ ठीक रखी। "बस दवा है। लुट्टन के लिए।"

"लुट्टन के लिए।" उसने लालटेन थोड़ी ऊपर की। "तू मेरे पहलवान के लिए दवा लेकर आ रहा है? तू, जो मेरे खिलाफ़ खड़ा है?"

"वो मर रहा है, सर।"

"मरता है तो मरे।" उसने कंधे उचकाए। "ऐसे चार और हैं अखाड़े में।"

मेरे भीतर कुछ ठंडा हो गया। ये वो आदमी था जो अपने ही पहलवान को एक गिलास में खत्म करके बात कर रहा था, जैसे कोई रोज़ की बात बता रहा हो।

"फिर भी," मैंने कहा, "मैं दवा पहुँचाऊँगा।"

वो हँसा। छोटी हँसी। "जा। मैं रोक नहीं रहा।" उसने रास्ता छोड़ा। मैं दो कदम बढ़ा ही था कि उसकी आवाज़ पीछे से आई, "पर वीर सिंह, एक बात याद रख। तू जिसे आज बचाने जा रहा है, वही कल तेरी उँगली पकड़कर तुझे नीचे खींचेगा। मैंने उसे पाला है। उसकी बच्ची मेरे पास है। उसका पेट मेरे हाथ में। वो तेरा नहीं हो सकता।"

मैं रुका। पलटा। "बच्ची?"

भैरव की आँखें एक पल के लिए बदलीं। फिर वो मुस्कुराया। "ये कहानी लंबी है। तू पहले दवा पहुँचा। फिर सोचना।" और वो लालटेन लेकर अंधेरे में घुल गया, जैसे धुआँ।

मैं भागा। नहर के किनारे-किनारे। कीचड़ मेरी चप्पलों में भरता गया, पर मैंने पैर नहीं रोके। अखाड़े की दीवार दिखी, फिर पीछे का वो टूटा दरवाज़ा जहाँ से टिंकू ने मुझे रात में बुलाया था।

टिंकू दरवाज़े पर बैठा था। मुझे देखते ही उठ खड़ा हुआ। "भाई, देर क्यों हुई? लुट्टन की हालत…" उसकी आवाज़ रुक गई।

"क्या?"

"वो बोल नहीं रहा। आँखें खुली हैं, पर बोल नहीं रहा। बस आसमान को देख रहा है।"

मैं अंदर घुसा। छोटा-सा कमरा, जिसमें लुट्टन पड़ा था। उसका शरीर पसीने से भीगा था, पर पसीना ठंडा था। मैंने पोटली खोली, वैद्य की पत्तियाँ निकालीं, पानी में घोली।

"लुट्टन।" मैंने उसका सिर उठाया। "ये पी।"

उसने होंठ हिलाए। कुछ नहीं निकला। मैंने धीरे से उसके मुँह में घोल डाला। वो खाँसा। फिर फिर खाँसा। फिर उसकी आँखों में ज़रा रोशनी आई।

"भाई…" टिंकू ने मेरा कंधा पकड़ा। "मीरा मैडम आई हैं। बाहर खड़ी हैं।"

मैं बाहर निकला। मीरा दीवार के सहारे खड़ी थी। उसके हाथ में छोटा-सा डिब्बा था। बाल बिखरे थे, कुर्ते पर धूल थी। वो दौड़कर आई थी, ये उसके जूतों पर लगी कीचड़ से पता चल रहा था।

"क्या हुआ?" उसने पूछा। सीधा। बिना भूमिका।

मैंने सब बताया। लुट्टन की बोतल, नीचे की सफ़ेद तलछट, भैरव का रास्ता रोकना, उसकी धमकी। और आख़िर में वो बात — "उसने कहा लुट्टन की बच्ची उसके पास है।"

मीरा ने एक पल मेरी तरफ़ देखा। फिर उसने आँखें बंद कीं। "बच्ची?" उसने धीरे से दोहराया। "लुट्टन की बच्ची है?"

"मुझे भी नहीं पता था।"

वो दीवार से टिकी रही, जैसे किसी ने उसके पैरों के नीचे से ज़मीन खींच ली हो। फिर उसने आँखें खोलीं और आवाज़ बदल गई — वो आवाज़ जो अब मैं पहचानता था, जो फ़ैसला ले चुकी होती है।

"वीर सिंह, सुनो।" उसने मेरी तरफ़ मुँह किया। "अगर लुट्टन हमारा गवाह बन जाए, तो भैरव का पूरा जाल खुल जाएगा। वो अकेला आदमी है जो अंदर से सब जानता है — किसको पानी दिया, कब दिया, कितना दिया। काग़ज़ तो हम जला चुके, पर ज़ुबान नहीं जलती।"

"पर पहले उसकी जान बचानी होगी।" मैंने कहा।

"हाँ।" उसने अपना डिब्बा खोला। उसमें छोटी-छोटी गोलियाँ थीं, काले रंग की। "ये मेरी बनाई हैं। ज़हर नहीं काटेंगी, पर जलन रोकेंगी। पर मुझे देखना होगा कि अंदर कितना ज़हर बचा है।"

"तू अंदर जाएगी?"

"मैं अखाड़े की मालकिन की बेटी हूँ।" उसने कंधे उचकाए। "मुझे कौन रोकेगा?"

"भैरव।"

वो रुकी। फिर बोली, "भैरव से मैं खुद लड़ूँगी। पर पहले लुट्टन को बाहर बुलाना होगा। अखाड़े के अंदर वो नहीं खुलेगा, वहाँ भैरव की आँखें हर कोने में हैं।"

"तो कहाँ?"

"दीवार के पीछे। नीम के पेड़ के नीचे।" उसने कहा। "तुम उसे बुलाओ। कहो मैडम ने बुलाया है। और वो आए तो उसका हाथ मेरी तरफ़ बढ़ाना।"

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