Spirit of a Fighter – Chapter 307
"मैंने… मैंने पी लिया।" उसने अपना गला पकड़ा। "कसरत के बाद। भैरव ने मुझे खुद दिया। कहा — तू मेरा बेटा है, तू पी ले। और मैंने पी लिया।" उसकी आँखों में पानी आ गया। "और अब मेरे अंदर जल रहा है। बहुत जल रहा है।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा। उसकी साँस में वो कड़वाहट अब और गहरी थी। और उसके साथ कुछ और भी था। एक नई बू। धुएँ की बू।
"तूने कब पिया?"
"अभी।" उसने कहा। "थोड़ी देर पहले।"
"कितना?"
"एक गिलास।" उसने कहा। "पूरा।"
मेरे पैरों के नीचे ज़मीन खिसक गई।
एक गिलास। उस ज़हर का एक गिलास। जो पहलवान महीनों में मरते हैं।
"अंदर आ।" मैंने उसका हाथ पकड़ा। "जल्दी।"
उसे अंदर खींचा। माँ दौड़कर आईं। उन्होंने उसका चेहरा देखा।
"बेटा," माँ ने कहा। "ये तो पी चुका है।"
"माँ, तेरे पास कुछ है?"
"रुक।" माँ चूल्हे के पास गईं। उन्होंने एक डिब्बी निकाली। उसमें काली मिर्च, सोंठ, और कुछ और था। "ये उल्टी करेगा। जल्दी।"
लुट्टन को बैठाया। माँ ने उसे पिलाया।
वो उल्टी करने लगा। ज़ोर से। उसका शरीर काँप रहा था।
मैंने उसका हाथ पकड़ा। उसकी नब्ज़ छू रही थी। तेज़। बहुत तेज़।
"माँ, ये ठीक होगा?"
माँ की आँखें भरी हुई थीं। "पता नहीं। एक गिलास बहुत है।"
लुट्टन ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों से पानी बह रहा था। "वीर… मुझे बचा। मैंने… मैंने सबको बचाने की कोशिश नहीं की। मैंने सब देखा। मैंने… मैंने हरनाम का बेटा बंधक होते देखा। मैंने बब्बर का ज़हर पीते देखा। मैंने सब देखा और चुप रहा।" उसने मेरा हाथ कसकर पकड़ा। "अब मुझे बचा। प्लीज। मैं… मैं सब बताऊँगा। सब।"
मैंने उसका हाथ थामा। मेरे हाथ काँप रहे थे।
"माँ," मैंने कहा। "मीरा को बुला। वो डॉक्टर है… मतलब, वो जानती है। जल्दी।"
गुड़िया दौड़ी। दरवाज़े से निकली।
लुट्टन मेरी गोद में सिर रखकर लेटा था। उसकी साँस तेज़ थी। उसके होंठ सूख रहे थे।
"वीर," उसने धीरे से कहा। "भैरव ने… भैरव ने मुझे आज ही दिया। कहा — तूने मेरी बात मानी, इसलिए इनाम।" उसने आँखें बंद कर लीं। "इनाम।"
मेरे अंदर कुछ जम गया।
भैरव ने उसे इनाम में ज़हर दिया। क्योंकि उसने मेरी बोतल नहीं ली थी। क्योंकि उसने भैरव की बात मानी थी। यही उसका इनाम था।
"लुट्टन," मैंने उसका चेहरा पकड़ा। "आँखें खोल। खोल।"
उसने आँखें खोलीं। उनमें मुझे दिख रहा था।
"मैं तुझे बचाऊँगा," मैंने कहा।
"क्यों?" उसने धीरे से कहा। "मैंने… मैंने तेरे साथ बुरा किया।"
"क्योंकि तूने आज मेरी बोतल नहीं ली थी।" मैंने उसका हाथ कसकर पकड़ा। "उस एक पल में तू भैरव का नहीं था। उस एक पल में तू अपना था। और अपने आदमी को मैं नहीं छोड़ता।"
लुट्टन की आँखों से पानी बहा। उसने मेरा हाथ पकड़ा। और रोया। बच्चे की तरह।
बाहर से गुड़िया की आवाज़ आई। "भैया! मीरा दीदी आई!"
दरवाज़ा खुला। मीरा अंदर आई। उसके बाल बिखरे हुए थे। वो दौड़ी हुई आई थी। उसके हाथ में अपना बैग था।
उसने लुट्टन को देखा। फिर मेरी तरफ़।
"कितना?"
"एक गिलास।"
उसका चेहरा सख्त हो गया। "माँ, गरम पानी लाओ। बहुत सारा। और नमक।"
वो लुट्टन के पास बैठी। उसने उसकी नब्ज़ पकड़ी। फिर उसकी आँखें देखीं। फिर उसके होंठ।
"लुट्टन," उसने कहा। "मेरी तरफ़ देख। मेरी तरफ़।"
लुट्टन ने उसकी तरफ़ देखा।
"तू डरेगा नहीं।" उसने कहा। "मैं तुझे बचाऊँगी। पर तू मेरी बात मानेगा। समझा?"
उसने सिर हिलाया।
मीरा ने अपना बैग खोला। उसमें से कुछ जड़ी-बूटियाँ निकालीं। उन्हें माँ के गरम पानी में डाला।
"ये पी।" उसने लुट्टन को पिलाया। "और अब उल्टी कर। जो अंदर बचा है, सब बाहर।"
लुट्टन उल्टी करने लगा। मीरा उसकी पीठ सहलाती रही।
मैं दीवार के पास खड़ा देखता रहा।
माँ मेरे पास आईं। उन्होंने धीरे से कहा, "देखा? मैंने कहा था न। उस लड़की को बुला।"
मैंने माँ की तरफ़ देखा। उनकी आँखों में कुछ था। जो मैं समझ नहीं पाया।
लुट्टन की उल्टी रुकी। उसकी साँस धीमी हुई। मीरा ने उसकी नब्ज़ फिर पकड़ी।
"अब बेहतर है," उसने कहा। पर उसके चेहरे पर तनाव अभी भी था। "पूरा ज़हर नहीं निकला। शरीर में कुछ रह गया है।" उसने मेरी तरफ़ देखा। "इसे कल तक आराम चाहिए। और देखना, इसके होंठ नीले न पड़ें।"
"होंठ नीले क्यों पड़ेंगे?"
मीरा ने मेरी तरफ़ देखा। "क्योंकि ये ज़हर शरीर का खून धीमा करता है। अगर ज़्यादा हो गया, तो दिल धीमा हो जाता है।" उसने धीरे से कहा। "वीर, एक गिलास बहुत है। मुझे नहीं पता कि ये बचेगा या नहीं।"
मेरे हाथ बंद हो गए।
"तो इसे बचाना पड़ेगा," मैंने कहा।
"मैं कोशिश कर रही हूँ।" उसने कहा। "पर मुझे सब कुछ चाहिए। सारी जड़ी-बूटियाँ। मेरे पास आधी हैं।"
"क्या चाहिए?"
उसने एक काग़ज़ निकाला। उस पर कुछ लिखा। "ये सब। पहाड़ी इलाके से आता है। गाँव के बाहर, नहर के पार, पुराने वैद्य का घर है। वो इन्हें रखता है। पर वो रात को नहीं खोलता।"
"मैं जाऊँगा।"
"वो नहीं खोलेगा।"
"मैं खुलवा लूँगा।"
मीरा ने मेरी तरफ़ देखा। बहुत देर तक। फिर उसने काग़ज़ मेरी तरफ़ बढ़ाया।
"ये ले। और जल्दी कर।" उसने कहा। "मैं यहाँ रहूँगी। मैं इसे अकेला नहीं छोड़ूँगी।"
मैंने काग़ज़ लिया। मैंने लुट्टन की तरफ़ देखा। वो आँखें बंद किए लेटा था। उसकी साँस अब भी तेज़ थी।
मैं दरवाज़े की तरफ़ बढ़ा।
"वीर।" मीरा की आवाज़ आई।
मैं रुका।
"रास्ते में सुक्खी बुआ मिलें, तो उनसे कह देना — रात को अखाड़े के पीछे कोई लालटेन लेकर घूम रहा है।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा।
"मुझे पता है," उसने कहा। "मैंने भी सुना है।"
मैं बाहर निकला। रात अब और गहरी हो गई थी।
मैं नहर की तरफ़ चला। रास्ता लंबा था। पर मेरे पैर तेज़ चल रहे थे।
रास्ते में सुक्खी बुआ मिलीं। रात को। चमकीली साड़ी में। हाथ में पान का बीड़ा।
"अरे वीर," उन्होंने कहा। "इतनी रात को कहाँ?"
"बुआ, तुम यहाँ क्या कर रही हो?"
"मैं तो बस…" उन्होंने इधर-उधर देखा। "मैंने सुना है कि अखाड़े के पीछे कोई लालटेन लेकर घूम रहा है।"
मैं रुका।
"कौन?"
"पता नहीं।" उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखों में वो चुगली नहीं थी। डर था। "पर बेटा, वो लालटेन अजीब है। बुझती नहीं। रात भर जलती रहती है। और उसके पीछे कोई चलता है।"
"कौन?"
"मैंने देखा नहीं।" उन्होंने धीरे से कहा। "बस सुना है। पर आज मैंने खुद झाँका। दीवार के छेद से। और वो लालटेन कुएँ की तरफ़ जा रही थी। वहाँ से जो रास्ता नीचे जाता है न — नीम के पेड़ के पास से।" उन्होंने मेरा हाथ पकड़ा। "बेटा, वो रास्ता भैरव का है। पर आज वहाँ कोई और चल रहा था।"
मेरे हाथ ठंडे हो गए।
"कौन?"
"मैंने चलने से पहचाना।" उन्होंने मेरी आँखों में देखा। "बेटा, वो माधव सिंह है।"
मेरे पैर जैसे ज़मीन से चिपक गए। माधव सिंह। भैरव का बड़ा बेटा। जो शहर में रहता था, पढ़ता था, अखाड़े की मिट्टी को हाथ नहीं लगाता था। गाँव में सब कहते थे — बाप की तरह नहीं है, सीधा-सादा है, इन सब झगड़ों से दूर रहता है।
तो वो रात को, उस रास्ते पर, लालटेन लेकर क्या कर रहा था?
"बुआ, तुम ठीक से देखा था? भैरव का बेटा शहर में रहता है।"
"मैंने उसकी चाल से पहचाना, बेटा।" उन्होंने बीड़ा थूक दिया। "भैरव की चाल है। पर कंधे छोटे। बाप नहीं, बेटा।" वो मेरी तरफ़ झुकीं। "और उसके हाथ में लालटेन के साथ कुछ और भी था। लंबी सी चीज़। जैसे… कुदाल हो, या डंडा।"
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