Spirit of a Fighter295 / 1295

Spirit of a Fighter – Chapter 295

7 min read November 5, 2026

मैंने उनकी तरफ़ देखा और सिर हिलाया। माँ ने होंठ हिलाए, बिना आवाज़ के। मैंने पढ़ा — "मैं जानती थी।"

तभी पीछे से कालू काका की आवाज़ आई। "मुंशीजी, अलमारी खोलो। अब सब कुछ सबके सामने।"

मुंशीजी ने चाबी ली, हाथ काँप रहे थे। वो अलमारी की तरफ़ बढ़े। लोगों की साँसें रुकी हुई थीं।

मैंने मीरा की तरफ़ देखा। वो अपने पापा के कंधे पर सिर रखे मुझे देख रही थी। उसके होंठ हिले — "ठीक है?"

मैंने सिर हिलाया। पर मेरे अंदर कुछ और चल रहा था।

क्योंकि जब मैं कुएँ से ऊपर आया था, तो मुझे वो गंध आई थी जो सब गंधों से अलग थी। ताज़ी कॉफ़ी की गंध नहीं, चाय की नहीं, दवा की नहीं। वो किसी और की गंध थी। कोई और था, जो इस पूरे खेल में पीछे खड़ा था। कोई, जिसने भैरव को ये ज़हर दिया था। कोई, जो आज भी अखाड़े के अंदर था।

क्योंकि भैरव ने खुद कहा था — "मेरे पिता की शीशी किसी तरह मुझे मिली।" किसी तरह? बीस साल पहले, एक चौदह साल के लड़के को, उसके भागे हुए बाप की ज़हर की शीशी "किसी तरह" कैसे मिल जाती है?

मुंशीजी ने अलमारी का ताला खोला। दरवाज़ा चरमराया। और उसी वक़्त, भीड़ के पीछे से, एक आवाज़ आई — मीठी, धीमी, जैसे गुड़ में ज़हर घुला हो।

"रुको। अलमारी मत खोलो।"

सब पलटे। मैं भी पलटा।

सब पलटे। मैं भी पलटा।

भीड़ के पीछे, अखाड़े के दरवाज़े की छाया में, मुंशीजी की पत्नी खड़ी थीं। शकुन बुआ। जिनके हाथ की कढ़ी पूरा अखाड़ा खाता था। जिनका चेहरा हमेशा मीठी बातों से भरा रहता था।

पर आज उनके चेहरे पर वो मिठास नहीं थी।

"शकुन, तू क्यों रोक रही है?" कालू काका ने सख़्त आवाज़ में कहा। "अंदर आ। सामने आ।"

वो धीरे-धीरे आगे आईं। उनके हाथों में एक थाली थी — कटोरी, गिलास, कुछ और। पर वो थाली काँप रही थी। नहीं, थाली नहीं — उनके हाथ काँप रहे थे।

"अलमारी खोलो," वो बोलीं, "पर पहले मेरी बात सुनो।"

"कैसी बात?" मुंशीजी ने कहा। उनकी आवाज़ में डर था। अपनी अलमारी का डर नहीं, अपनी पत्नी का डर।

शकुन बुआ ने थाली नीचे रखी और मेरी तरफ़ देखा। सीधे मेरी आँखों में। "तू वो लड़का है जो हर सुबह अखाड़े के बाहर खड़ा रहता था। जो मिट्टी सूँघता था।"

मेरा गला सूख गया। "आपको कैसे पता?"

"क्योंकि मैं भी वहाँ से आई हूँ," वो बोलीं। "मैं भी मिट्टी सूँघकर बड़ी हुई हूँ। और मैंने भी वो गंध पहचानी है जो तू आज सुबह सूँघकर आया है।" उन्होंने भैरव की तरफ़ देखा। "ये गंध मेरे हाथ से निकली है, भैरव। तेरे बाप की शीशी मैंने ही तुझे दी थी।"

भैरव का चेहरा पत्थर हो गया।

"तू चौदह साल का था," शकुन बुआ की आवाज़ टूटी, "जब तेरे बाप नेहर में डूबा। सबने कहा — हादसा। मैंने कहा — हाँ, हादसा। पर मैं जानती थी। वो डूबा नहीं था। उसे डुबोया गया था।"

कालू काका ने लालटेन और ऊँची कर ली। "शकुन, तू क्या कह रही है?"

"मैं कह रही हूँ कि जिस पानी की शीशी की तलाश में ये आज खड़ा है, वो शीशी मेरे पास बीस साल से थी। बाप का ज़हर बेटे के हाथ में दे दिया।" उन्होंने अपनी आँखें बंद कर लीं। "मैंने सोचा, बेटा बाप का बदला लेगा। पर बदला किससे? मुझसे? कालू से? इस पूरे अखाड़े से?"

भैरव ने एक कदम आगे बढ़ा। "तू जानती थी मेरे बाप को किसने डुबोया?"

शकुन बुआ ने कालू काका की तरफ़ देखा। बहुत देर तक देखा। फिर धीरे से बोलीं, "पूछ इससे।"

हवा रुक गई। कालू काका के हाथ से लालटेन थोड़ी झुकी, फिर संभली। उनका चेहरा लालटेन की रोशनी में आधा अँधेरे में था। "शकुन," उन्होंने धीमी आवाज़ में कहा, "बीस साल पुरानी बात खोदेगी, तो जो गड़ा है, वो सब निकलेगा। सोच ले।"

"मैंने बीस साल सोच लिया, कालू।" शकुन बुआ की आँखों से पानी बह रहा था, पर आवाज़ पत्थर जैसी थी। "अब तू सोच।"

भैरव ने धीरे से कटोरी नीचे रखी। उसकी उँगलियाँ काँप रही थीं। वो पलटा, कालू काका के सामने खड़ा हुआ, और उसकी आवाज़ ऐसी निकली जैसे किसी पुराने ज़ख्म से खून बह रहा हो।

"बोल कालू… मेरी माँ के बारे में तू क्या जानता है?"

॥

कालू काका ने लालटेन नीचे रखी। धीरे से। जैसे कोई बीमार आदमी अपनी लाठी रखता है। फिर उन्होंने भैरव की तरफ़ देखा — एक बार भी नहीं पलटे, सीधे उसकी आँखों में।

"तेरी माँ, कमला," कालू काका बोले, "यहाँ आती थी। इसी तहखाने में। साधना करने।"

भैरव की साँस रुक गई।

"वो साधना नहीं करती थी," कालू काका ने आवाज़ और धीमी की, "वो इस मिट्टी को जानती थी। जानती थी कि इस मिट्टी में क्या है। और वो बीस साल पहले तुझे यहीं से खींचकर ले गई थी — तू पहली बार यहाँ आया था।"

"मैं याद…" भैरव ने होंठ हिलाए, "मैं याद नहीं…"

"याद है," कालू काका ने कहा। "बिलकुल याद है। तू तब चौदह साल का था। तूने ये मिट्टी खोदी थी। और उसमें से कुछ निकाला था।"

मैंने भैरव की मुट्ठी देखी। वो कटोरी पकड़े था, और उसकी उँगलियाँ सफ़ेद हो गई थीं।

"तूने उस मिट्टी में ज़हर मिलाया था," कालू काका ने कहा। "तेरी माँ ने देखा। वो नीचे उतरी, तुझे रोका। तूने उसे धक्का दिया।"

"नहीं," भैरव ने कहा। बहुत धीरे। "नहीं, ऐसा नहीं…"

"वो सीढ़ियों से गिरी," कालू काका की आवाज़ टूटी, "और उसी रात मरी। और तूने कहा — कुएँ से गिरी। कोई देखने वाला नहीं था। सिवाय मेरे।"

तहखाने में ऐसी चुप्पी छाई कि मुझे अपना दिल सुनाई देने लगा। माँ की लालटेन की रोशनी भैरव के चेहरे पर पड़ रही थी — और वो चेहरा सफ़ेद था। एकदम सफ़ेद। जैसे किसी ने उसका खून ही निकाल लिया हो।

भैरव की मुट्ठी खुली। कटोरी ज़मीन पर गिरी और पानी मिट्टी में फैल गया। वो पानी जो मैदान में था, जो मेरे पापा के हाथों से निकला था, जो ग्यारह पहलवानों की उम्र खा गया — वो अब इस तहखाने की मिट्टी में मिल रहा था। और मैं… मैं कुछ नहीं कर सका। बस देखता रहा।

पर मेरे पैर मुझे कहीं और खींच रहे थे।

मीरा।

मैं घूमा। तहखाने के कोने में एक पुराना खंभा था, और उससे रस्सी बँधी थी। रस्सी के दूसरे सिरे पर मीरा थी। उसके हाथ पीछे बँधे थे, सिर झुका हुआ था, कुर्ते पर मिट्टी की परत जमी थी।

"मीरा!" मेरी आवाज़ फट गई।

वो सिर उठाया। उसकी आँखें पहले धुँधली थीं, फिर मुझे देखकर साफ़ हो गईं। उसके होंठ हिले — कुछ बोलना चाहा, पर आवाज़ नहीं निकली।

मैं उसकी तरफ़ बढ़ा, पर भैरव तेज़ था। वो पलटा और मेरे रास्ते में खड़ा हो गया। उसकी आँखों में पानी था — मैंने पहली बार भैरव की आँखों में पानी देखा।

"मैंने उसे मारा नहीं," वो बोला। आवाज़ काँप रही थी। "वो गिर गई थी। मैंने बचाने की कोशिश की थी। मैंने उसका सिर अपनी गोद में रखा था।"

"तूने बचाया नहीं," कालू काका ने कहा। उनकी आवाज़ में अब गुस्सा नहीं था, सिर्फ़ थकान। "तूने छुपाया। बीस साल तक छुपाया।"

"चुप रह!" भैरव चीखा और उसने कालू काका की तरफ़ हाथ उठाया।

पर उसका हाथ मेरे हाथ में आ गया।

मैंने उसे पकड़ा। बीस साल की मेहनत से। चक्की चलाने वाले हाथ। मज़दूरी करने वाले हाथ। और भैरव उस पकड़ में उलझ गया।

उसी पल बब्बर पीछे से आया और उसने भैरव को कमर से पकड़ लिया। भैरव गिरा — भारी शरीर, धूल उड़ी, लालटेन का पीला प्रकाश मिट्टी पर नाच गया। और टिंकू — मेरा टिंकू, जो कभी कसरत कल से शुरू करने का वादा करता था — वो दौड़कर खंभे के पास गया और उसने रस्सी खोलनी शुरू कर दी।

उसके हाथ काँप रहे थे। रस्सी उलझी हुई थी। वो बड़बड़ाया, "बस दो पल, बस दो पल, ये गाँठ मेरी माँ की पूड़ी जैसी कसी हुई है…"

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