Spirit of a Fighter – Chapter 29
"तो चल," उन्होंने कहा। "पर अंधेरे में मेरा हाथ मत छोड़ना।"
हम सीढ़ियों से उतरने लगे। पीछे कुएँ का ढक्कन खुला रह गया, और उससे आती ठंडी हवा मेरी गर्दन पर लग रही थी। जब मैं आधा नीचे उतर चुका था, तभी मुझे कुछ सुनाई दिया — ऊपर से, दूर से, अखाड़े की तरफ़ से। किसी के भारी कदमों की आवाज़।
कोई ऊपर आ रहा था।
कालू काका ने भी सुना। उन्होंने लालटेन बुझा दी, और अंधेरे में मेरा हाथ कसकर पकड़ लिया।
"नीचे," उन्होंने मेरे कान में फुसफुसाया। "जल्दी।"
मैं तेज़ी से उतरने लगा, और मेरे पीछे-पीछे कालू काका। और ऊपर, सीढ़ियों पर, किसी के पैरों की आवाज़ तेज़ होती गई — जैसे कोई जानता हो कि हम नीचे हैं। जैसे कोई आ रहा हो हमें वहीं दबाने, उसी अंधेरे में, जहाँ से मैं अभी-अभी निकला था।
॥
मेरी कोहनी फट रही थी। कालू काका ने उस पर हल्दी वाला पानी बाँधकर धोती का पट्टा कस दिया था, और अब वो पट्टा सूखकर अकड़ गया था — जैसे कोई मुझे याद दिला रहा हो कि आज सुबह मैं कुएँ में गिरा था, और अंदर क्या देखा था।
नहर का पानी धीरे बह रहा था। दोपहर ढल चुकी थी, पर धूप अभी भी मिट्टी से तप रही थी — वो गंध, जो सिर्फ़ मार्च की दोपहर में आती है, जब धरती अपनी पूरी भाप छोड़ती है।
टिंकू मेरे पास बैठा था, टीन की कटोरी हाथ में, और उसमें खीर। ऊपर से घी का पतला तार, और उस पर चार बादाम।
"ले, ठंडी न हो जाए।"
मैंने कटोरा नहीं लिया। मैंने उसकी तरफ़ देखा — वो हमेशा की तरह मुस्कुरा रहा था, पर उसकी मुस्कान में वो चीज़ नहीं थी जो रोज़ होती थी। वो मुस्कान थकी हुई थी, जैसे किसी ने उसे पहनकर रख लिया हो।
"हर बार खीर," मैंने कहा। मेरी आवाज़ अपने कानों में भी अजीब लगी — सूखी, झुंझलाई हुई। "हर बार कल से कसरत। टिंकू, मैं आज सुबह कुएँ के नीचे था। अंदर। नीचे।"
कटोरा उसके हाथ में रुक गया।
मुस्कान गई। पूरी तरह गई। और मैंने पहली बार टिंकू का वो चेहरा देखा जो उसने शायद कभी किसी को नहीं दिखाया था — कोई हँसता हुआ लड़का नहीं, एक डरा हुआ आदमी।
"तू पागल है, वीर।" उसने कटोरा ज़मीन पर रख दिया। खीर हिली। "पागल। भैरव को पता चला तो वो तेरी हड्डी-हड्डी अलग कर देगा। और तेरी माँ को? गुड़िया को? उन्हें कौन बचाएगा?"
"मुझे पता है क्या कर रहा हूँ।"
"नहीं जानता।" उसने मेरी तरफ़ देखा, और उसकी आँखें चमक रही थीं, पर गुस्से से नहीं। पानी से। "तू नहीं जानता। तेरे पास माँ है, वीर। तेरे पास गुड़िया है। मेरे पास कौन है?"
मैं चुप हो गया।
वो उठकर नहर के किनारे चला गया और पानी में कंकड़ फेंका। उसकी पीठ देखकर लगा जैसे कोई लड़का नहीं, कोई बूढ़ा आदमी खड़ा हो जिसने बहुत कम उम्र में बहुत कुछ झेल लिया हो।
"मेरे पापा," उसने कहा, और आवाज़ धीमी थी, "पहलवान थे। अखाड़े में लड़ते थे। मैं छोटा था, तब मैं उन्हें यहाँ से देखता था — इसी नहर से, इसी जगह से। मिट्टी में लिपटे, पसीने से भीगे, और जब वो जीतकर आते तो मुझे उठाकर कंधे पर बिठा देते।" उसने पलटकर मेरी तरफ़ देखा। "और फिर एक दिन वो बीमार पड़ गए। डॉक्टर ने कहा कमज़ोरी है। दो महीने में चले गए। मेरी माँ ने रो-रोकर आँखें खराब कर लीं। और मैं… मैं बारह साल का था, वीर। बारह साल का।"
मेरा गला सूख गया।
"तूने कभी नहीं बताया।"
"किसको बताता?" उसने कंधे उचकाए। "गाँव वालों को? जो कहते हैं 'टिंकू का बाप भी वही हुआ जो सबका होता है'? और तू तो रोज़ अपने ही सपनों में डूबा था।" उसने धीरे से हँसा, पर वो हँसी में ज़हर था। "मैं बताता भी तो क्या? कि मुझे डर लगता है? कि रोज़ रात को मैं सोचता हूँ — अगर कभी मैंने भी अखाड़े की मिट्टी छुई, तो मेरे साथ भी वही होगा?"
वो अपनी जेब में हाथ डालकर कुछ निकालने लगा। उसकी उँगलियाँ काँप रही थीं — मैंने टिंकू को पहले कभी काँपते नहीं देखा था। वो एक छोटी-सी तह की हुई चिट्ठी निकालकर मेरे हाथ में रखने लगा, फिर रुक गया, फिर रख दी।
काग़ज़ पुराना था। किनारों से फटा हुआ, मोड़ों पर से चिकना — जैसे कोई इसे बार-बार खोलता और बंद करता हो।
"ये मेरे पापा की लिखाई है," टिंकू ने कहा, और उसकी आवाज़ ऐसी थी जैसे किसी ने उसका गला दबा दिया हो। "मरने से तीन दिन पहले उन्होंने ये मेरी माँ को दी थी। कहा था — 'जब ये लड़का बड़ा हो जाए, तब देना। और कहना कि माफ़ कर दे।'"
मैंने चिट्ठी खोली। लिखाई टेढ़ी-मेढ़ी थी, काँपती हुई — जैसे किसी ऐसे आदमी ने लिखा हो जिसके हाथ में ताकत न बची हो।
"भैरव के पानी से मैं मर रहा हूँ। मुझे इलाज नहीं चाहिए, इलाज सिर्फ़ एक है — उस पानी से दूरी। पर अब देर हो गई। मेरी जान जाए, पर मेरा बेटा अखाड़े के पास भी न आए। भैरव मीठा बोलता है, पर उसकी मिठास में ज़हर है। जो पीता है, वो जीता हुआ भी हार जाता है। मैंने पीया था, टिंकू की माँ। और आज जो मेरे साथ हो रहा है, वो तुम्हारी आँखों के सामने है। मुझे माफ़ कर देना। और उस बेटे को माफ़ कर देना जो अपने बाप की तरह बनना चाहेगा।"
मेरे हाथ काँप रहे थे। मैंने चिट्ठी मोड़ी और टिंकू की तरफ़ देखा।
वो अपने घुटनों पर झुककर बैठ गया था, और उसके कंधे हिल रहे थे। चुपचाप। कोई आवाज़ नहीं। बस कंधे।
"मैं डरपोक हूँ, वीर," उसने कहा, और आवाज़ टूट रही थी। "मैं तेरे साथ अखाड़े तक आता हूँ, खीर लाता हूँ, मज़ाक करता हूँ — पर अंदर जाने से डरता हूँ। क्योंकि मुझे पता है, अगर मैं अंदर गया, तो मेरे पापा की तरह मरूँगा। पर आज तूने कहा कि तू अंदर जा चुका है, कुएँ के नीचे। और मैं यहाँ बैठा हूँ, खीर पकाकर, जैसे कुछ हुआ ही न हो।"
मैंने उसका कंधा पकड़ा। उसकी हड्डी मेरी मुट्ठी में आ गई — वो कितना दुबला था, मैंने आज पहली बार महसूस किया।
"टिंकू," मैंने कहा, और मेरी आवाज़ भारी थी। "तेरे पापा मरे नहीं। तेरे पापा को मारा गया। मेरे पापा को मारा गया। और तेरी माँ की आँखें भैरव ने नहीं ली — उसने तो सिर्फ़ पानी दिया। आँखें तो हम लोगों ने खोई हैं, चुप बैठकर।" मैंने उसकी तरफ़ मुँह किया। "तो अब हम दोनों एक ही रास्ते पर हैं। और एक बात सुन — तुझे अकेले नहीं जाना है। मैं सामने रहूँगा।"
टिंकू ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में वो चीज़ थी जो बारह साल के एक बच्चे की आँखों में बंद हो गई थी — सवाल। "कैसे?"
"चोरी-छुपे नहीं," मैंने कहा। "खेल के अंदर से। भैरव अखाड़े का मालिक नहीं है, वो सिर्फ़ मैनेजर है। और अगर मैं अंदर रहूँगा, खेल के अंदर, तो वो मुझे चुपचाप नहीं मिटा सकता। सबके सामने खेलना पड़ेगा। और सबके सामने भैरव हारता है।"
टिंकू कुछ देर मेरी तरफ़ देखता रहा। फिर उसने अपनी आस्तीन से अपनी आँखें पोंछीं — बड़ी बेढंगी, बच्चों जैसी हरकत, और मुझे उस पर हँसी आई। वो भी हँसा।
"एक चीज़ है," उसने कहा, और अब उसकी आवाज़ में वो पुरानी चमक लौट रही थी। "अखाड़े में मुंशीजी हैं — ये ठेकेदार हरनाम के चेले जैसे हैं, हिसाब-किताब रखते हैं। उन्हें रोज़ दोपहर में चाय चाहिए होती है — गुड़ वाली, अदरक वाली, ऊपर से मलाई। अगर मैं उनके घर चाय पहुँचाने का काम ले लूँ, तो मैं अखाड़े के अंदर आ-जा सकता हूँ। और मैं जहाँ जाऊँगा, वहाँ तेरे लिए रास्ता बनाऊँगा।"
"तू?" मैंने कहा। "तू अंदर जाएगा?"
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