Spirit of a Fighter289 / 1295

Spirit of a Fighter – Chapter 289

7 min read November 5, 2026

लुट्टन ने सिर हिलाया। उसकी आँखों में पानी था, पर वो रोया नहीं। जैसे उसने अपनी सारी रुलाई उस पल के लिए बचा रखी हो जब काम हो जाए।

रात बढ़ती गई। माँ ने खाट पर बिछौना डाल दिया, पर कोई सोया नहीं।

मैं आँगन में आया। आसमान में बादल थे, और हवा में वो गंध थी जो बारिश से पहले आती है — मिट्टी की, पुरानी, प्यासी।

मीरा मेरे पीछे आई। उसने कुछ नहीं कहा। बस मेरे पास खड़ी हो गई।

"मुझे डर लग रहा है," मैंने कहा। मैंने सोचा था कहूँगा तो अजीब लगेगा, पर मुँह से निकल ही गया।

"मुझे भी," उसने कहा, बिना नाटक किए। "पर अब डर से चलने का वक़्त नहीं है। अब डर को साथ लेकर चलना है, जैसे तू सुबह बोरा उठाता है।"

मैं हँस पड़ा। इतनी देर बाद पहली हँसी।

"तू अजीब बातें करती है," मैंने कहा।

"तेरे पापा भी करते थे," उसने कहा। "पापा बताते थे, रघुवीर कहते थे — जो पहलवान मुस्कुराना भूल जाए, वो हार गया, चाहे वो जीत जाए।"

मैंने उसकी तरफ़ देखा। चाँदनी में उसका चेहरा ऐसा लग रहा था जैसे कोई पुरानी तस्वीर हो जो धीरे-धीरे रंग पकड़ रही हो।

"मीरा," मैंने धीरे से कहा, "कल अगर मैं…"

"मत कह," उसने मेरी बात काटी। और फिर थोड़ी देर चुप रही। "जब कहना हो तो बताना, पर अभी मत कह।"

मैंने पोटली को अपने सीने से और कस लिया।

॥

दरवाज़ा खुला और बंद हुआ। आँगन की चुप्पी अब चारों तरफ़ फैल गई थी — खाट की रस्सियों में, दीवार की दरारों में, और मेरे सीने में।

कालू काका उठे। उन्होंने अपनी कमर सीधी की, जो उनकी उम्र में कभी सीधी नहीं होती थी। फिर वो दीवार की तरफ़ बढ़े, जहाँ भैरव का दिया हुआ वो पुराना नोटिस अब भी चिपका था — अखाड़ा तीन दिन बंद।

कालू काका ने उसे देखा और बोले, "तीन दिन। आज तीसरा दिन है।"

मेरे हाथ में पोटली थी। मुंशीजी ने इसे खोलने की शर्त रखी थी — मैदान में, सबके सामने। पर मैदान तो बंद था। ताला लगा था। और अब भैरव कह रहा था — तीन दिन बाद वो लड़ेगा।

तीन दिन। मेरे दिमाग़ में एक आवाज़ बजी — कल कहा था, और आज कह रहा है तीन दिन।

"काका," मैंने कहा, "भैरव कुछ छिपा रहा है। वो अब तीन दिन की बात कर रहा है। पर हमें तो कल की बात कही थी उसने — भट्ठे के पीछे।"

कालू काका ने पलटकर मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखें ऐसी थीं जैसे अंधेरे में दीया जलाया गया हो।

"वो तुझे डरा रहा है," वो बोले। "तीन दिन कहकर वो तेरे अंदर का इंतज़ार बढ़ा रहा है। इंतज़ार में आदमी पिघलता है। एक दिन में लड़ने वाला तेज़ लड़ता है। तीन दिन सोचकर लड़ने वाला पहले ही थक जाता है।"

लुट्टन ने खाट से उठते हुए कहा, "तो क्या करें?"

कालू काका ने दीवार को छुआ, जैसे उससे बात कर रहे हों। "जो आदमी दिन बढ़ाता है, वो असल में अपना दिन घटाता है। वो कल के लिए तैयार नहीं है, इसीलिए डाला हुआ है।"

मैंने पोटली सीने से उतारी और खाट पर रख दी।

"मैं कल लड़ूँगा," मैंने कहा। "जब उसने कहा कल — तो कल। और अगर वो तीन दिन की बात करता है, तो आज रात उसके पास जाकर मैं उसकी तीन दिन वाली बात ही खत्म कर दूँगा।"

कालू काका मुड़े। उनके चेहरे पर कुछ ऐसा आया जो मैंने पहले कभी नहीं देखा — डर और शान, दोनों साथ।

"तू रघुवीर का बेटा है," वो बोले। "वो भी ऐसे ही कहते थे — जब दुश्मन दिन बदल दे, तो तू दिन न बदल।"

माँ बाहर आईं। उन्होंने सुना था। उनके हाथों में एक कटोरी थी — ठंडी रोटी और अचार। उन्होंने कटोरी मेरी तरफ़ बढ़ाई, और कुछ नहीं बोलीं।

"माँ," मैंने कहा, "मैं आज रात जाऊँगा।"

"जानती हूँ," वो बोलीं। "तभी तो रोटी दे रही हूँ। भूखे आदमी का गुस्सा भी खाली होता है।"

मैंने रोटी खाई। अचार की तीखी गंध और माँ के हाथों की हल्दी — दोनों मेरे नाक में घुल गए। मैंने धीरे-धीरे खाया। जल्दी में खाया तो माँ को लगता कि मैं डरा हुआ हूँ।

टिंकू दौड़ता हुआ आया। उसके हाथ में एक छोटी डिब्बी थी।

"भाई," वो हाँफते हुए बोला, "मैंने नहर के किनारे सुना है — भैरव ने शहर से दो आदमी बुलाए हैं। बड़े अखाड़े के पहलवान हैं, हरियाणा से। वो आज रात आ रहे हैं।"

कालू काका ने उसकी तरफ़ देखा। "दो आदमी। किसके लिए?"

टिंकू की आवाज़ धीमी हो गई। "उसने कहा था — वीर को तीन दिन में तोड़ना है। तो पहला दिन आज रात है।"

मेरे पेट में आग भर गई। वो मुझे अकेले नहीं लड़ना चाहता था। वो मुझे दो दिन थका के रखना चाहता था, और तीसरे दिन — खुद लड़ना चाहता था। जब मेरी हड्डियाँ सुस्त हों और साँस फूल रही हो, तब वो मैदान में उतरे।

"समझ गया," मैंने कहा। "वो मुझे तीन दिन में पीस डालना चाहता है।"

लुट्टन ने मुट्ठी भींची। "तो हम उसकी चाल उलट दें।"

मैंने उसकी तरफ़ देखा। "कैसे?"

"वो दो आदमी शहर से आ रहे हैं," लुट्टन ने कहा। "रास्ते में नहर का पुल है। रात के दस बजे गाड़ी वहीं से गुज़रेगी। अगर हम वहीं मिलें…"

कालू काका ने उसकी बात काटी, "नहीं। लड़ाई अखाड़े में लड़ी जाती है, नहर पर नहीं। और वीर, तू उन दो आदमियों से नहीं लड़ेगा। तू उनसे बात करेगा।"

मैं चौंका। "बात?"

"भैरव को सबसे ज़्यादा डर किस बात का है?" कालू काका ने पूछा। "इस बात का कि उसके अपने आदमी उसके खिलाफ़ हो जाएँ। उसने लुट्टन को खो दिया। अब वो बाहर से आदमी ला रहा है। अगर वो दोनों समझ जाएँ कि भैरव उन्हें अपना ढाल बनाकर आगे खड़ा कर रहा है — तो वो पीछे हट जाएँगे। भैरव अकेला रह जाएगा। और वो उससे बर्दाश्त नहीं होगा।"

मैंने सोचा। ये बात सीधी थी, पर सच थी।

"ठीक है," मैंने कहा। "मैं उनसे बात करूँगा। पर कैसे? वो मुझे पहचानते नहीं।"

लुट्टन ने कहा, "मैं उन्हें पहचानता हूँ। एक का नाम बसंता है, दूसरे का सरदार। बसंता पैसे का भूखा है, सरदार थोड़ा ठीक है। भैरव ने उन्हें चालीस हज़ार का लालच दिया है। अगर हम उन्हें एक साथ दो बातें दिखाएँ — भैरव का ज़हर और उसका झूठ — तो शायद वो मान जाएँ।"

कालू काका ने सिर हिलाया। "पर एक शर्त है।"

हम सब उनकी तरफ़ देखने लगे।

"वीर अकेला नहीं जाएगा," वो बोले। "मैं जाऊँगा। और लुट्टन जाएगा। और मीरा भी जाएगी।"

माँ ने कहा, "मीरा?"

"हाँ," कालू काका बोले। "क्योंकि जब वो दो पहलवान भैरव का ज़हर देखेंगे, तो उन्हें सबूत चाहिए होगा। एक आयुर्वेद वाली लड़की का सबूत, सात आदमियों की गवाही से भारी होता है।"

मैंने माँ की तरफ़ देखा। उनकी आँखों में कुछ था — ना मना करने का, ना हाँ कहने का। बस एक सवाल।

"माँ," मैंने कहा, "मीरा का पापा…"

"मीरा तेरे से बड़ी है?" माँ ने पूछा।

मैं चौंका। "क्या?"

"पूछ रही हूँ," वो बोलीं, "वो तेरे से समझदार है, या नहीं?"

"हाँ," मैंने कहा। "बहुत।"

"तो फिर उससे मत पूछ कि वो साथ चलेगी या नहीं। वो खुद फैसला करेगी।" माँ ने कटोरी उठाई। "मैं तेरे पापा के साथ हर लड़ाई में गई थी। एक में भी नहीं रुकी। तेरी मीरा भी रुकेगी नहीं।"

मैंने उनका हाथ चूमा। उन्होंने झटक लिया, पर होंठों पर हल्की सी हँसी आई।

टिंकू ने कहा, "और मैं? मैं क्या करूँ?"

"तू रास्ते में खड़ा रहेगा," कालू काका बोले। "अगर हम वापस न आएँ, तो रणवीर सिंह को खबर देगा।"

"मतलब मैं काम चोर हूँ?" टिंकू ने कहा।

"मतलब तू हमारी आख़िरी उम्मीद है," कालू काका ने कहा, और उनकी आवाज़ में पहली बार हल्की हँसी थी।

टिंकू ने सीना फुलाया। "ठीक है। पर भाई, अगर तू हारा, तो मैं तेरे पीछे-पीछे आऊँगा और उन दोनों पहलवानों को खीर खिलाकर मार डालूँगा।"

मैं हँसा। "खीर में ज़हर है क्या?"

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