Spirit of a Fighter – Chapter 280
मैंने देखा कि दीवार के पास, मिट्टी में, किसी के पैरों के निशान थे। बड़े। भारी। भैरव के। वो कुएँ के चारों तरफ़ घूमे थे — कई बार। और फिर वो अंदर गए थे।
मेरी नज़र एक और चीज़ पर पड़ी। कुएँ के ढक्कन के पास, मिट्टी में, कुछ दबा हुआ था। मैंने दीवार फाँदी और करीब गया।
वो एक छोटा सा पीतल का टुकड़ा था। जला हुआ था, पर आकार साफ़ था — ये किसी दीये का हिस्सा था।
मैंने उसे उठाया। गरम था, हल्का सा। और उस पर खुदाई थी — एक पंक्ति, बहुत पुरानी, जो आधी जल चुकी थी। मैंने आँखें सिकोड़कर देखा।
"जो… मिट्टी… सो…" बस इतना बचा था। बाकी जल गया था।
मेरे हाथ में वो पीतल का टुकड़ा था, और मुझे लगा जैसे मैंने कोई बहुत बड़ा सूत्र हाथ में लिया है — और साथ ही, जैसे मैंने कोई बहुत बड़ा दरवाज़ा खोल दिया है जो बंद ही रहना चाहिए था।
मैं पलटा, और सामने मीरा खड़ी थी।
उसके हाथ में किताबों का बैग था, और उसके चेहरे पर वो जिद थी जो हमेशा रहती है — पर आज उसकी आँखों में कुछ और भी था। डर नहीं। कुछ और।
"मैं तुझे यहाँ ढूँढ रही थी," उसने कहा। "टिंकू ने बताया।"
"मीरा—"
"मुझे पता है तू आज रात कुएँ जाने वाला है," उसने मेरी बात काटी। "मैं साथ चलूँगी।"
"नहीं।"
"मैंने पूछा नहीं," उसने कहा, और वो मेरे करीब आई। "मैं बता रही हूँ।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा। उसके हाथ में बैग था, पर उसकी उँगलियाँ काँप रही थीं। वो डर रही थी। पर वो डर रही थी और फिर भी खड़ी थी — मेरे सामने, मेरे बीच में।
"मीरा," मैंने धीरे से कहा, "वहाँ ख़तरा है। भैरव वहाँ—"
"मुझे पता है," उसने कहा। "और तू अकेला जाएगा? तू सोचता है मैं तुझे अकेले जाने दूँगी?" उसने मेरे हाथ में वो पीतल का टुकड़ा देखा। "ये क्या है?"
"ये किसी दीये का टुकड़ा है," मैंने कहा। "और इस पर कुछ लिखा था। आधा जल गया।"
मीरा ने टुकड़ा मेरे हाथ से लिया। उसकी उँगलियाँ ठंडी थीं। उसने उसे आँखों के पास उठाया और जो बचा हुआ खुदा हुआ था, उसे पढ़ने लगी।
"जो… मिट्टी… सो…" वो धीरे से बोली, जैसे शब्दों को ज़ुबान पर रखकर महसूस कर रही हो। "अधूरा है। 'जो मिट्टी सो रही है' — ऐसा कुछ हो सकता है।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा। कभी-कभी मीरा ऐसी बात कह देती थी जिससे लगता था कि उसके अंदर कोई बूढ़ा दिमाग़ बैठा है।
"तुझे कैसे पता?"
"मेरे दादा के पास एक पुरानी किताब थी," उसने कहा, टुकड़ा मुझे लौटाते हुए। "मिट्टी की कहानियाँ। कहते थे, कुछ मिट्टी सोती है — और जब तक सोए, उसे छेड़ना मत। जो उसे जगाता है, वो खुद नहीं सो पाता।"
कुएँ से ठंडी हवा आई। मेरे रोंगटे खड़े हो गए, और ये ठंड से नहीं थे।
"मीरा," मैंने कहा, "तू घर जा। अभी।"
"वीर—"
"मैं सीरियस हूँ।" मेरी आवाज़ खुद मेरे कानों में अजीब लगी — सख़्त, जैसे किसी और की हो। "भैरव जो कर रहा है, वो सिर्फ़ मिट्टी जलाना नहीं है। वो कुछ ऐसा जगा रहा है जो सोया हुआ है। और अगर कालू काका भी उसके पास नहीं जा रहे, तो इसका मतलब—"
"तो इसका मतलब तू भी नहीं जाएगा," उसने काटा। "तू भी उसी कुएँ के पास नहीं जाएगा।"
"मैं पहलवान हूँ।"
"तू बेवकूफ़ है," उसने कहा, और उसकी आवाज़ में वो गुस्सा था जो आँसुओं से फूटता है। "तू सोचता है बीस साल का राज़ तेरे दो हाथों से खुल जाएगा? तू सोचता है भैरव तुझे खड़े-खड़े देखेगा?"
वो सही कह रही थी। यही सबसे बुरा था।
ठीक उसी वक़्त पीछे से एक लालटेन की रोशनी आई। हम दोनों पलटे। मीरा की साँस रुक गई।
कालू काका खड़े थे — हाथ में लालटेन, सफ़ेद दाढ़ी में हवा भर रही थी, और आँखों में ऐसा डर जैसे उन्होंने कोई भूत देख लिया हो। वो सीधे मेरी तरफ़ देख रहे थे, और उनकी नज़र मेरे हाथ में पड़े पीतल के टुकड़े पर अटक गई।
"अंदर क्या है, काका?" मैंने पूछा। "कुएँ में?"
कालू काका ने जवाब नहीं दिया। उन्होंने बस मेरा हाथ पकड़ा और मुझे सीढ़ी से खींचकर ऊपर ले आए। उनकी पकड़ में वो ताकत थी जो बूढ़े आदमी में नहीं होनी चाहिए।
"जब वक़्त आएगा, मैं खुद ले जाऊँगा," उन्होंने कहा, आवाज़ काँप रही थी। "तब तक तू इस कुएँ को भूल जा।"
"तीन दिन बाद मुझे भैरव से लड़ना है," मैंने गुस्से में कहा। "और भैरव रात में इसी कुएँ के रास्ते तहखाने की मिट्टी उठा रहा है। अगर वो मिट्टी उसके हाथ लग गई तो सब खत्म।"
कालू काका का चेहरा पीला पड़ गया। मीरा ने मेरा हाथ पकड़ लिया — उँगलियाँ अब ठंडी नहीं थीं, बस मज़बूत थीं।
"तू जानता है उस मिट्टी में क्या है?" कालू काका ने धीरे से कहा, लगभग फुसफुसाकर। "वो मिट्टी ताकत नहीं देती — वो सच दिखाती है। और जो सच देखने को तैयार नहीं, वो उसमें लेटते ही पागल हो जाता है।"
"तो भैरव क्यों उठा रहा है?" मैंने पूछा।
कालू काका कुछ नहीं बोले। बस लालटेन की लौ काँपती रही, जैसे हवा नहीं, कोई और चीज़ उसे हिला रही हो।
फिर उन्होंने मुझे दीवार के उस पार धकेल दिया।
"घर जा, सो जा।" उनकी आवाज़ में अब हुक्म था। "कल तुझे अखाड़े में रहना है — और मैं चाहता हूँ कि तू वहाँ रहे।"
मीरा और मैं रास्ते में चुप चले। उसने कुछ नहीं पूछा, और मैंने कुछ नहीं कहा। पर घर पहुँचकर, दरवाज़े पर खड़े होकर, मैं पलटा और पीछे देखा।
दूर अखाड़े की दीवार पर एक लालटेन की रोशनी धीरे-धीरे घूम रही थी — जैसे कोई कुएँ के चारों तरफ़ चक्कर लगा रहा हो। मैंने साँस रोक ली। वो रोशनी घूमती रही — एक चक्कर, दो चक्कर।
और फिर अचानक रुक गई।
बिलकुल बीच में। जैसे किसी ने उसे वहीं कील से ठोक दिया हो। और उस अंधेरे में, उस रुकी हुई लौ के पीछे, मुझे लगा — मुझे यकीन था — कि कोई उसकी तरफ़ देखकर मुस्कुरा रहा है।
मेरा हाथ दरवाज़े की कुंडी पर जम गया। कालू काका कुछ छिपा रहे थे। और अब मुझे लगा कि वो मुस्कुराहट भी कुछ छिपा रही है — कोई ऐसा राज़ जो मेरे नाम का इंतज़ार कर रहा था।
॥
वो मुस्कुराहट मेरे दिमाग़ में रात भर बजती रही। करवट बदलता, तो लगता कोई दरवाज़े पर खड़ा है। आँख खोलता, तो छत पर वही अंधेरा। सुबह तीन बजे माँ की चक्की चलने लगी, और मैं उसी आवाज़ में सो गया — जैसे बचपन में सोता था।
सुबह अखाड़े का गेट खुला था। तीन दिन के लिए बंद था न, पर ताला नहीं था। जैसे किसी ने जान-बूझकर खोल छोड़ा हो।
मैं अंदर घुसा। मिट्टी पर ओस थी। किसी ने रात में मिट्टी सींची थी और पैरों से गूंधी थी — उन निशानों से पता चल रहा था कि जूते पहने कोई चला है। भैरव सुबह जूते पहनकर मिट्टी में नहीं उतरता। वो नंगे पैर उतरता है, ताकि उसकी मिट्टी का हिसाब वो खुद रख सके।
तभी पीछे से आवाज़ आई।
"आ गया तू।"
मैं पलटा। भैरव दीवार की छत पर बैठा था, पैर लटकाए। हाथ में चाय का गिलास। सुबह की हवा उसकी तेल लगी मूँछों को हिला रही थी। और आवाज़ में वो गुड़ था — जो चिपक जाता है और छूटता नहीं।
"बेटा, तू अब अखाड़े का हिस्सा है।" उसने चाय का घूँट लिया। "तेरे लिए पीछे वाला कमरा खाली कर दिया है। अंदर रहा कर। सुबह जल्दी उठेगा तो कसरत भी अच्छी होगी।"
मेरे पेट में एक झटका लगा।
ये नज़र में रखने की चाल थी। मैं समझ गया। वो मुझे अपने आँगन में बाँधना चाहता था — जहाँ से मैं निकलूँ, तो उसे पता चले। रात में मैं कुएँ की तरफ़ जाऊँ, तो उसे पता चले। मैं मीरा से मिलूँ, तो उसे पता चले।
पर उसी वक़्त मेरे अंदर एक और आवाज़ उठी। मौका भी तो यही था। अखाड़े में रहूँगा, तो कुएँ के सबसे करीब रहूँगा। भैरव की हर हरकत, हर रात की लालटेन, हर आती-जाती साँस — सब मेरी नाक के सामने होगी।
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