Spirit of a Fighter – Chapter 279
पर आज उस गंध में कुछ और मिला हुआ था। कुछ तीखा। कुछ जला हुआ। जैसे मिट्टी जल रही हो।
मैं उठ बैठा।
खिड़की से फिर झाँका। लालटेन नहीं थी। रोशनी नहीं थी। पर अखाड़े की दीवार के ऊपर, आसमान की तरफ़, धुआँ उठ रहा था। पतला, धीमा, काला धुआँ — जैसे कोई चूल्हा जल रहा हो। या जैसे कोई मिट्टी जल रही हो।
भैरव मिट्टी जला रहा था।
मेरा दिल एक पल के लिए रुक गया। क्यों जलाएगा कोई उस मिट्टी को जो ताकत देती है?
और फिर मुझे याद आया — कालू काका ने कहा था, "वो मिट्टी सच दिखाती है।" और माँ ने कहा था, "उसके पास पहले से सब कुछ है।"
अगर भैरव के पास पहले से सब कुछ है, तो वो उस मिट्टी से क्या लेना चाहता है? ताकत नहीं। तो क्या? सच? भैरव सच क्यों ढूँढेगा? भैरव तो सच छिपाने वाला आदमी है।
तो वो क्यों जला रहा है?
इसका जवाब मुझे नहीं पता था। और यही सबसे डरावनी बात थी।
मैंने दरवाज़ा खोला और बाहर निकला। मैंने सोचा नहीं था — बस पैर अपने आप चले। गली सूनी थी। मैं दीवार के उस ढीले हिस्से तक गया, हाथ लगाया, और फिर रुक गया।
कालू काका की आवाज़ मेरे कान में थी। "कुएँ के पास अभी मत आना।"
और माँ की आवाज़। "मुझे उस मिट्टी से तेरा ज़्यादा डर है।"
मैंने हाथ नीचे कर लिया।
वो धुआँ अभी भी उठ रहा था। पतला। धीमा। और मैं कुछ नहीं कर सकता था।
मैं घर लौटा, बिस्तर पर लेटा, और आसमान के तारों को देखता रहा। सुबह होने में अभी देर थी, पर मुझे नींद नहीं आ रही थी। मेरे दिमाग़ में एक ही सवाल घूम रहा था — भैरव उस मिट्टी को क्यों जला रहा है?
और फिर, जैसे किसी ने मेरे कान में कहा हो, जवाब आया — धीमा, साफ़, और ठंडा।
क्योंकि वो उस मिट्टी से डरता है।
मैं उठ बैठा।
हाँ। यही तो है। भैरव ताकत से नहीं डरता। वो सच से डरता है। और अगर वो मिट्टी सच दिखाती है — अगर वो हर आदमी को उसका अपना सच दिखाती है — तो भैरव के लिए वो मिट्टी सबसे बड़ा ख़तरा है। क्योंकि भैरव का सच इतना काला है कि अगर वो उसे एक बार देख ले, तो वो खुद ही टूट जाएगा।
इसलिए वो उसे जला रहा है। वो उस मिट्टी को मिटा रहा है, ताकि जो सच उसमें छिपा है, वो कभी किसी को न दिखे।
मेरे होंठों पर एक हल्की सी मुस्कान आई। पहली बार, उस रात में, मुझे लगा कि मेरे पास कुछ है। एक छोटी सी चीज़, पर कुछ है।
भैरव डरता है।
और अगर वो डरता है, तो वो हार सकता है।
सुबह की पहली किरण खिड़की से आई और मेरे चेहरे पर पड़ी। मैंने आँखें खोलीं। आँगन में चक्की की आवाज़ आ रही थी — घर्र, घर्र — माँ उठ चुकी थीं।
मैं उठा, मुँह धोया, और आँगन में गया। माँ चक्की पर बैठी थीं। उन्होंने मेरी तरफ़ देखा और कुछ नहीं कहा, बस एक कटोरी में आटा डालकर मेरी तरफ़ बढ़ा दिया।
"खा," उन्होंने कहा।
मैंने कटोरा लिया। आटा गरम था, और उसमें वो गंध थी जो बचपन से मेरे साथ है — माँ के हाथ की गंध।
"माँ," मैंने कहा, आटा खाते हुए। "रात में भैरव कुएँ पर था।"
माँ के हाथ रुके नहीं। चक्की चलती रही। घर्र, घर्र।
"मैंने देखा," उन्होंने कहा।
"आपने देखा?"
"मैं सो नहीं रही थी।" उन्होंने चक्की रोकी और मेरी तरफ़ देखा। "उसने मिट्टी जलाई।"
मैं हैरान रह गया।
"आपको कैसे पता?"
"गंध से," माँ ने कहा। "जली मिट्टी की गंध सबसे अलग होती है। वो हवा में बहुत देर तक रहती है।" उन्होंने अपनी साड़ी का कोना ठीक किया। "मैंने बीस साल पहले भी वो गंध सूँघी थी। उस रात, जब तेरे पापा नहीं लौटे थे।"
मेरा हाथ रुक गया।
"माँ—"
"उस रात भी अखाड़े में मिट्टी जली थी," माँ ने कहा, और उनकी आवाज़ बहुत धीमी थी, जैसे वो कोई बोझ उठा रही हों। "मैंने सोचा था किसी का चूल्हा जल रहा होगा। पर सुबह तेरे पापा का शरीर मिला, और उनके हाथों में जली हुई मिट्टी थी। जैसे उन्होंने उसे पकड़ने की कोशिश की हो।"
मेरे हाथ काँपने लगे। मैंने कटोरा नीचे रख दिया।
"आपने मुझे ये कभी नहीं बताया।"
"क्या बताती?" माँ ने कहा, और उनकी आवाज़ में पहली बार कुछ ऐसा था जो कड़वा था। "कि तेरे पापा ने आख़िरी वक़्त में जली मिट्टी पकड़ी थी? कि उन्हें पता था कि वो मर रहे हैं, और वो उस मिट्टी को बचाना चाहते थे? ये सुनकर तू क्या करता? तेरा बचपन कैसा होता?"
मैं चुप हो गया।
माँ उठीं, चक्की से हटीं, और मेरे पास आकर बैठ गईं।
"अब सुन," उन्होंने कहा, और उनका हाथ मेरे सिर पर था, ठंडा और भारी। "रात में मैंने सोचा। कालू काका ने कहा कुएँ के पास मत जा। मैंने भी कहा मत जा। पर अब मुझे लगता है कि हम दोनों ग़लत थे।"
मैंने उनकी तरफ़ देखा।
"अगर भैरव उस मिट्टी से डरता है," माँ ने कहा, "तो वो मिट्टी हमारा हथियार है। और हथियार को दुश्मन के हाथ में नहीं छोड़ते।"
"पर कालू काका ने कहा—"
"कालू काका बूढ़े हैं," माँ ने कहा। "और बूढ़े लोग डरते हैं। उन्होंने बीस साल डर में बिताए हैं। मैंने भी बिताए हैं। पर तू नहीं डरेगा। तू उस मिट्टी को भैरव के हाथ से बचाएगा।"
मैंने उनकी तरफ़ देखा। उनकी आँखों में वो पानी नहीं था जो रात में था। अब उनकी आँखों में कुछ और था — वो चीज़ जो मैंने पहले सिर्फ़ एक बार देखी थी, उस दिन जब उन्होंने पुलिस के सामने खड़े होकर अपनी बीस साल की चुप्पी तोड़ी थी।
"माँ," मैंने कहा, "आज रात मैं कुएँ जाऊँगा।"
"जानती थी," उन्होंने कहा, और एक छोटी सी मुस्कान उनके होंठों पर आई। "तभी तो कह रही हूँ।"
दोपहर को टिंकू आया। उसके हाथ में मिठाई की डिब्बी थी, पर उसका चेहरा उतरा हुआ था।
"भाई," उसने कहा, दरवाज़े पर ही खड़े-खड़े, "आज सुबह मैंने अखाड़े के पीछे जाकर देखा। कुएँ के चारों तरफ़ जली हुई मिट्टी पड़ी थी — काली, सख़्त, जैसे कोई चूल्हा जलाया हो। और…" वो रुका।
"और?"
"और कुएँ का ढक्कन हटा हुआ था," टिंकू ने धीरे से कहा। "अंदर से धुआँ निकल रहा था। जैसे नीचे कुछ जल रहा हो।"
मेरे पेट में एक ठंडी सी सनसनी दौड़ी।
"तहखाना," मैंने कहा।
"क्या?"
"वो तहखाने की मिट्टी जला रहा है," मैंने कहा, और मेरी आवाज़ में वो यकीन था जो मुझे खुद पर भी नहीं था। "वो कुएँ के अंदर आग लगा रहा है। वो उस मिट्टी को राख बना रहा है, टिंकू। ताकि जो सच उसमें छिपा है, वो कभी किसी को न मिले।"
टिंकू का चेहरा उतर गया।
"तो अब क्या?" उसने पूछा।
मैंने उसके कंधे पर हाथ रखा।
"अब हम उसे बचाएँगे," मैंने कहा। "आज रात। तीनों।"
"तीनों?"
"तू, मैं, और मीरा।"
टिंकू ने मिठाई की डिब्बी मेरे हाथ में थमाई और एक लंबी साँस ली।
"भाई," उसने कहा, "मैं तो कल से कसरत शुरू करने वाला था। पर लगता है आज रात पहले कुश्ती हो जाएगी।"
मैं हँसा। उस रात में पहली बार, सच में हँसा।
पर मेरे अंदर वो छोटी सी आवाज़ अभी भी थी, जो कह रही थी — कालू काका कुछ छिपा रहे हैं। और जो आदमी बीस साल से तहखाने का राज़ अपने सीने में रखे हो, वो सिर्फ़ डर के मारे चुप नहीं रहता।
वो किसी और वजह से चुप रहता है। और वो वजह आज रात मुझे पता चलेगी।
शाम को मैं अखाड़े के पीछे गया। दीवार के उस ढीले हिस्से से झाँका। कुआँ का ढक्कन हटा था, और उसके चारों तरफ़ काली जली मिट्टी पड़ी थी। कुएँ के अंदर से अब धुआँ नहीं आ रहा था। बस एक गहरी काली सन्नाटा था, जैसे कुएँ ने अपनी ज़ुबान पकड़ ली हो।
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