Spirit of a Fighter – Chapter 27
अलमारी की चाबी मैंने अपनी आँखों से मुट्ठी में जाते देखी थी। पर उस रात मैंने उस चाबी के बारे में सोचना बंद कर दिया। सोचता रहा तो दिमाग़ घूमता रहता, और नींद कहीं दूर भाग जाती। मैंने आँखें बंद कीं और अपने कानों को उस कुएँ की तरफ़ भेज दिया।
रात भर वो आवाज़ नहीं आई।
सुबह चार बजे माँ की चक्की की आवाज़ उठी — घर्र, घर्र, घर्र — और मेरी आँखें अपने आप खुल गईं। आदत थी। कितने सालों से यही आवाज़ मेरी सुबह थी। पर आज मैं चक्की की तरफ़ नहीं गया। आज मैंने तख़्त से उतरकर सीधे दीवार पर टँगी अपनी धोती उठाई और गुड़िया की थैली जेब में डाली। वो लाल मिट्टी — जो उसने चुपके से अखाड़े से लाकर भरी थी।
माँ ने मेरी तरफ़ देखा। चक्की चलती रही, पर उनकी आँखें रुक गईं।
"चाय?"
"बाद में, माँ।"
"कहाँ?"
मैं रुक गया। झूठ बोलना आसान था। पर माँ के सामने झूठ बोलने की हिम्मत मुझमें नहीं थी। वो मेरी आँखों में देखकर सब पढ़ लेती थीं।
"कुएँ तक।"
चक्की का हत्था उनके हाथ में रुक गया। एक पल के लिए आँगन में सिर्फ़ सुबह की ठंडी हवा रही। फिर उन्होंने हत्था फिर से पकड़ा और चक्की चलने लगी।
"जा," वो बोलीं। "पर मेरी एक बात सुन ले। वहाँ जो भी है, वो तेरा है। माँगने से नहीं मिलेगा, मिलने पर ही मिलेगा। जल्दबाज़ी मत करना।"
मैंने सिर हिलाया और बाहर निकल गया। आँगन की मिट्टी ठंडी थी, ओस से भीगी। पैर उसमें धँसते गए, और मैंने सोचा — काश मेरी पूरी ज़िंदगी इतनी नरम होती।
गली के मोड़ पर टिंकू खड़ा था। एक हाथ में खीर की कटोरी, दूसरे में चम्मच। टोपी टेढ़ी, आँखें आधी बंद, जैसे अभी उठा हो।
"भाई, सुन।" वो दौड़कर आया। "मैंने सोचा, आज तेरा बड़ा दिन है। तो खीर।"
"टिंकू, अभी नहीं।"
"अभी नहीं तो कब? तू सुबह से ही कुछ नहीं खाता, और फिर अखाड़े में गिर पड़ेगा, और फिर मैं…" उसकी आवाज़ भर आई, "मैं तेरी माँ को क्या मुँह दिखाऊँगा?"
मैं उसकी तरफ़ मुड़ा। उसके हाथ में कटोरी काँप रही थी। उसने सुबह-सुबह उठकर खीर बनाई थी — मेरे लिए। इस आदमी ने अपनी माँ से झूठ बोलकर, अपनी नींद कुर्बान करके, सिर्फ़ इसलिए खीर बनाई थी कि मैं अखाड़े में खाली पेट न उतरूँ।
मैंने कटोरी उसके हाथ से ली और एक साँस में खीर पी गया। गुड़ की मिठास गले से नीचे उतरी और पेट में गर्मी फैल गई।
"अच्छी है," मैंने कहा।
टिंकू की आँखें चमक उठीं। "सच?"
"सच। पर अब मुझे जाने दे।"
"कहाँ?"
"कुएँ तक।"
उसकी मुस्कान एक पल में उतर गई। "भाई, वो जगह…"
"टिंकू।"
"हाँ?"
"खीर अच्छी थी।" मैंने उसके कंधे पर हाथ रखा। "अब वापस जा। और माँ को बता दे — आज मैं जल्दी लौटूँगा।"
वो कुछ कहना चाहता था। मैंने उसे मौक़ा नहीं दिया। मैं मुड़ा और चल पड़ा। पीछे से उसकी आवाज़ आई — "भाई, अगर कुछ हो जाए तो मैं तेरे बिना क्या करूँगा?" — पर मैंने सुना नहीं।
अखाड़े की पिछली दीवार के पास पहुँचते-पहुँचते आसमान में हल्की लाली आ गई थी। कुएँ का ढक्कन पत्थर का था — मोटा, भारी, काई से ढका। मैंने दोनों हाथ उसके किनारे पर रखे और पूरी ताकत लगाई।
ढक्कन हिला तक नहीं।
मैंने दाँत भींचे और फिर खींचा। मेरी बाँहों की नसें उभर आईं, पैरों की एड़ियाँ मिट्टी में धँस गईं, और पसीना मेरे माथे से आँखों में चला आया। तभी मेरा हाथ फिसला। मैं पीठ के बल गिरा और मेरी कोहनी एक पत्थर से जा टकराई।
दर्द पहले नहीं आया। पहले खून आया — गरम, चिपचिपा, कोहनी से बहकर कलाई तक। मैं उठकर बैठा और उसे देखा। ज़्यादा नहीं था। पर दर्द अब आ रहा था, धीरे-धीरे, जैसे कोई अंदर से दरवाज़ा खटखटा रहा हो।
मैंने धोती का कोना फाड़ा, उसे कोहनी पर बाँधा, और फिर उठकर फिर ढक्कन की तरफ़ बढ़ा।
"तू मुझे हराएगा नहीं," मैंने पत्थर से कहा। "आज नहीं।"
इस बार मैंने ताकत नहीं लगाई। मैंने ढक्कन के उस कोने को ढूँढा जो ज़रा उभरा हुआ था, अपनी उँगलियाँ उसके नीचे डालीं, और पूरे शरीर का वज़न एक तरफ़ किया। ढक्कन कराहा — एक लंबी, भारी कराह — और सरक गया।
और तभी वो गंध आई।
मैंने सुना था कि बंद कमरे में मौत की गंध होती है। पर ये मौत की गंध नहीं थी। ये मिट्टी की गंध थी — सड़ी, गीली, सैकड़ों साल पुरानी मिट्टी, जो कभी हवा नहीं लगी। उसमें नमी थी, उसमें उम्र थी, और उसमें कुछ और था — एक हल्की-सी मिठास, जैसे बहुत पुराने गुड़ की, जो अब सिर्फ़ याद बची हो।
गंध मेरी नाक में घुसी और सीधे मेरे सिर के पीछे जा चुभी। मेरी आँखें पानी से भर आईं। मैंने मुँह को अपनी बाँह से ढका और एक पल के लिए झुक गया।
फिर मैंने सीढ़ियों की तरफ़ देखा। पत्थर की सीढ़ियाँ, टूटी, काई से लिपटी, नीचे की तरफ़ जाती हुईं। और नीचे — सिर्फ़ अंधेरा। इतना काला कि लगा कोई चीज़ उसे निगल रही है।
मैंने एक पैर उतारा।
सीढ़ी हिली। मैंने दीवार पकड़ी — गीली, चिकनी, जैसे किसी ने उस पर सालों तक हाथ फेरे हों। मैं दूसरी सीढ़ी पर उतरा, फिर तीसरी। ऊपर का उजाला छोटा होता गया, फिर सिर्फ़ एक चौकोर टुकड़ा बचा — आसमान का। फिर वो भी पीछे छूट गया।
अंधेरा।
असली अंधेरा, जिसमें अपनी ही उँगलियाँ नहीं दिखतीं। मैंने हाथ सामने किया और दीवार टटोली। मेरी उँगलियाँ कुछ चीज़ों से छू गईं — नरम, गीली, फिसलती हुई। काई। मैंने हाथ खींच लिया। मेरी साँसें तेज़ हो गईं, और उस तंग जगह में वो आवाज़ लौटकर मेरे कानों में आई — जैसे कोई मेरी साँसों की नकल कर रहा हो।
फिर मेरा पैर किसी चीज़ पर पड़ा जो सीढ़ी नहीं थी। ज़मीन।
मैं नीचे उतर चुका था।
मैंने आँखें मूँदकर कुछ पल गिने, ताकि आँखें अंधेरे की आदत डाल लें। जब खोलीं, तो कुछ धुँधला-सा दिखने लगा था। एक छोटा कमरा, या कोठरी। दीवारें पत्थर की। और सामने — एक दरवाज़ा।
लोहे का दरवाज़ा।
मैं उसकी तरफ़ बढ़ा। मेरी उँगलियाँ उस पर फेरीं तो जंग की परत मेरे हाथ में लग गई — खुरदरी, भूरी, ठंडी। दरवाज़े पर एक पुराना ताला लटका था, मुट्ठी भर बड़ा। उस पर भी जंग थी, पर उस जंग में एक चीज़ और थी — ताज़ा चिकनाई।
किसी ने हाल में उस ताले में तेल डाला था।
मेरे पेट में एक ठंडी गाँठ बन गई। मैंने हाथ बढ़ाकर ताले को छुआ। वो मेरे छूने से ज़रा भी नहीं हिला। जैसे ये दरवाज़ा सिर्फ़ बंद न हो, जैसे वो किसी और से बंद करवाया गया हो।
और तभी ऊपर से रोशनी पड़ी।
पीली, काँपती रोशनी — लालटेन की। सीढ़ियों पर पैरों की आवाज़ आई, धीमी, भारी। मैंने हाथ पीछे किया और दीवार से चिपक गया।
"बेटा।"
कालू काका की आवाज़। मैंने साँस रोक ली।
वो सीढ़ियों से उतरते आए, और लालटेन की रोशनी में उनका चेहरा आधा उजला था, आधा काला। उन्होंने मुझे देखा, और उनकी आँखों में न गुस्सा था, न हड़बड़ी। बस कुछ था — बहुत थका हुआ, बहुत पुराना।
"तुझे पता था मैं आऊँगा?" मैंने पूछा। मेरी आवाज़ उस कमरे में छोटी लग रही थी।
"पता था," उन्होंने कहा। "तू आज नहीं आता तो कल आता। तेरे पापा भी यहीं तक आए थे।"
वो मेरे पास आए और दरवाज़े की तरफ़ देखा। फिर उन्होंने लालटेन नीचे की और उसका उजाला उस पुराने ताले पर पड़ा।
"ये रास्ता अभी तेरा नहीं, बेटा," उन्होंने धीरे से कहा। "जो दरवाज़ा बीस साल से बंद है, उसे हाथ से नहीं, वक़्त से खोलते हैं।"
"काका, मुझे इंतज़ार करना नहीं आता।"
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