Spirit of a Fighter – Chapter 192
माँ ने ये पी लिया था।
पर इतना कम कि…
"मीरा!" मैंने दरवाज़े की तरफ़ चिल्लाया। "मीरा!"
फाटक पर कोई हिला नहीं।
मेरी साँस रुकी।
तभी पिछले दरवाज़े से तेज़ कदमों की आवाज़ आई, और मीरा अंदर घुसी — बाल बिखरे, कुर्ते पर कीचड़, हाथ में उसका बैग। उसने एक नज़र में सब देख लिया — माँ, कप, मेरा चेहरा।
"कब से?" उसने पूछा, और बैग खोलकर माँ के पास बैठ गई।
"पता नहीं। कप अभी मिला।"
उसने माँ की कलाई पकड़ी। उँगलियाँ नाड़ी पर रखीं। आँखें बंद कर लीं। उसके होंठ हिल रहे थे, जैसे कोई गिनती कर रही हो।
मेरा दिल सीने में ज़ोर-ज़ोर से धड़क रहा था, और मुझे लगा कि कमरे में सब सुन रहे हैं।
फिर मीरा ने आँखें खोलीं।
"घबराओ मत," उसने कहा, और उसकी आवाज़ वैसी थी जैसे कोई गहरे पानी से ऊपर आई हो। "मात्रा कम है। बहुत कम। इसको पहचाना जा सकता है।"
"पहचाना जा सकता है मतलब—"
"मतलब ये कि ये उस पानी जैसा नहीं है जो भैरव पहलवानों को देता है। वो पूरी खुराक होती है — शरीर के अंदर उतरकर उम्र खाती है। ये…" उसने कप की तरफ़ देखा। "ये डराने के लिए दिया गया है। थोड़ा-सा। जितना तड़पाए, मारे नहीं।"
मेरे गले में कुछ अटक गया।
"तो भैरव ने माँ को…"
"डराने के लिए," मीरा ने कहा। "तुझे डराने के लिए। वो चाहता है कि तू काग़ज़ लौटा दे। कि तू टूट जाए।"
वो अपने बैग से एक छोटी पुड़िया निकाली — काग़ज़ में लिपटी, भूरे रंग की। फिर दूसरी — सफ़ेद पुड़िया। उसने दोनों को मिलाया, और माँ के होठों पर उँगली रखकर बूँद-बूँद डालने लगी।
"ये क्या है?" मैंने पूछा।
"अदरक, काली मिर्च, और थोड़ी-सी सोंठ।" उसने बिना रुके कहा। "पेट की गरमी बढ़ाती है। ज़हर को खींचती है। पर ये तभी काम करती है जब मात्रा कम हो। अगर भैरव ने पूरी खुराक दी होती तो…" उसने रुककर मेरी तरफ़ देखा। "…तो हम देर कर चुके होते।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा। उसके हाथ स्थिर थे, पर उसकी आँखों के नीचे काले घेरे थे, और उसकी साँस तेज़ थी — जैसे वो दौड़कर आई हो।
"तू बाहर कहाँ थी?" मैंने पूछा।
"नीम के नीचे। तेरा इंतज़ार कर रही थी।" उसने कहा। "फिर मैंने लालटेन की रोशनी देखी और सोचा कुछ गड़बड़ है। पीछे के रास्ते से आई।"
वो झुकी, और माँ के माथे पर हाथ रखा।
थोड़ी देर बाद माँ की आँखें धीरे से खुलीं।
वो पहले मेरी तरफ़ देखने लगीं। फिर उनकी नज़र मेरे कंधे के पीछे गई — मीरा पर।
और वहाँ रुक गई।
मैंने माँ को पहले कभी ऐसे नहीं देखा था। उनकी आँखों में पानी नहीं था, बस एक अजीब-सी चमक थी — गीली, धीमी, जैसे सुबह की पहली धूप।
उनके होंठ हिले।
"लड़की," उन्होंने कहा, और आवाज़ इतनी धीमी थी कि मुझे कान झुकाना पड़ा। "तेरे हाथों में… औषधि की गंध है।"
मीरा ने सिर हिलाया। उसकी आँखें भर आई थीं, और उसने उन्हें छुपाने की कोशिश नहीं की।
"तूने मेरी जान बचाई," माँ ने कहा।
और फिर कमरे में एक ऐसी चुप्पी आई जो बहुत भारी थी — मैंने अपनी साँस तक रोक ली।
मीरा ने माँ का हाथ पकड़ लिया। दोनों हाथों से। और अपना सिर उस पर रख दिया।
"मैंने कुछ नहीं किया, माँजी," उसने धीरे कहा। "ये तो आपकी दुआ है।"
माँ की आँखों से एक आँसू निकला और कान के पास चला गया। उन्होंने मीरा के सिर पर हाथ रखा। धीरे-धीरे सहलाया।
"माँजी…" वो बोलीं, और मुस्कुराईं। "अभी से? मैंने तो अभी कुछ कहा भी नहीं।"
मीरा ने सिर उठाया। उसका चेहरा लाल था। "वो… मैंने बस…"
"रहने दे," माँ ने कहा, और उनकी आवाज़ में जो था, वो मैंने बीस साल में कभी नहीं सुना — हल्की-सी हँसी। "अच्छा लगा।"
फिर उन्होंने मेरी तरफ़ देखा।
"डर मत, बेटा," वो बोलीं। "मैं इतनी जल्दी नहीं मरने वाली। मुझे तो तेरी जीत देखनी है।"
"माँ—"
"जब तक तू मिट्टी पर खड़ा होगा, मैं चक्की पर बैठूँगी," उन्होंने कहा। और फिर उनकी आवाज़ धीमी हो गई। "पर आज… आज चक्की मत चलाना।"
मैंने उनका हाथ और ज़ोर से पकड़ लिया। मेरे गले में कुछ अटका हुआ था, और मैं एक शब्द भी नहीं बोल पा रहा था।
तभी दरवाज़े पर फिर खटखटाहट हुई।
मैं सीधा खड़ा हो गया।
"मीरा, माँ के पास रह।" मैंने कहा।
मैं दरवाज़े तक गया। हथौड़ा उठाया।
"गुड़िया, बीच में मत आना।"
"मैं तेरे पीछे हूँ," उसने कहा। और उसकी आवाज़ में डर नहीं था। बस ज़िद।
मैंने कुंडी खोली। दरवाज़ा खींचा।
बाहर सिर्फ़ अंधेरा था।
कोई नहीं।
मैं बाहर निकला। आँगन सूनसान था। चक्की का जला हुआ पत्थर, मिट्टी, टूटी चारपाई। और फाटक।
फाटक पर कोई नहीं था।
मैंने चारों तरफ़ देखा। मेरी नाक हवा में फड़की। गंध थी — भैरव की गंध। भारी, तेल जैसी, मूँछों वाली तेल की। पर वो गंध अब भी हवा में थी, ज़मीन पर नहीं। जैसे कोई आया हो, खड़ा रहा हो, और फिर चला गया हो।
और तभी मेरी नज़र ज़मीन पर पड़ी।
दरवाज़े के ठीक सामने, मिट्टी में, टिंकू की वही टूटी मिठाई की डिब्बी रखी थी। वही टिन की डिब्बी, जिस पर हल्की-सी पीली पट्टी चिपकी थी, जो लुट्टन ने कुछ देर पहले ज़मीन पर पटकी थी।
मैं उसे उठाने के लिए झुका।
डिब्बी भारी नहीं थी।
मैंने उसे खोला।
अंदर मिठाई नहीं थी।
अंदर एक काग़ज़ की पर्ची थी, मुड़ी हुई। और उस पर्ची पर, भैरव की मोटी लिखाई में, सिर्फ़ इतना लिखा था —
तीन रात बाद, अखाड़े की मिट्टी में। सिर्फ़ तू और मैं। हारा तो तेरी माँ अगली होगी।
मैंने पर्ची को दोनों हाथों से पकड़ा। मेरी उँगलियाँ काँप रही थीं। मैंने उसे मुट्ठी में भरकर मसल दिया। काग़ज़ चरमराया, और उसकी आवाज़ मेरे कानों में बहुत तेज़ लगी।
मैं पलटा।
गुड़िया दरवाज़े पर खड़ी थी। उसकी आँखें बड़ी थीं। टिंकू उसके पीछे आ गया था, हाथ में एक लाठी — जो उसे कहीं से मिली, पता नहीं। मीरा दरवाज़े के अंदर, आधी रोशनी में खड़ी थी, और उसका चेहरा शांत था — पर उसकी आँखें मुझ पर टिकी थीं।
"क्या लिखा है?" मीरा ने पूछा।
मैंने पर्ची खोली। पढ़कर सुनाया।
टिंकू ने लाठी ज़मीन पर पटक दी। "तीन रात? तीन रात में वो क्या करेगा?"
"तीन रात में वो तहखाने की मिट्टी उठाएगा," मैंने कहा। "कालू काका ने बताया था। वो उस मिट्टी से अपनी ताकत बनाएगा, और फिर मुझे उसी मिट्टी में गाड़ देगा।"
"तो हम उसे रोकेंगे," गुड़िया ने कहा। उसकी आवाज़ में वो ज़िद थी जो माँ की थी।
"नहीं," मैंने कहा।
सब चुप हो गए।
"नहीं?" टिंकू ने कहा। "मतलब तू अकेला लड़ेगा?"
"हाँ।" मैंने उसकी तरफ़ देखा। "यही तो वो चाहता है — मुझे अकेला। इसीलिए उसने माँ को ज़हर दिया। ताकि मैं डर जाऊँ। ताकि मैं भागूँ।"
"तो तू डरा?" मीरा ने पूछा। उसकी आवाज़ में कोई ताना नहीं था। बस सवाल।
मैंने उसकी तरफ़ देखा।
"डरा," मैंने कहा। "पर उसने आग जिस घर में लगाई, वो घर उसका नहीं है।"
मैंने पर्ची को अपनी जेब में रखा और पलटा।
"टिंकू," मैंने कहा। "तू अभी सुक्खी बुआ के घर जा। उसे बोल कि कल सुबह पंचायत के चबूतरे पर सब इकट्ठे हों। हर घर से एक आदमी।"
टिंकू ने सिर हिलाया। पर फिर रुका। "क्यों?"
"क्योंकि तीन रात बाद जो होगा, वो सिर्फ़ मेरा नहीं होगा," मैंने कहा। "अगर मैं हारा, तो भैरव यही करेगा — किसी और की माँ को ज़हर देगा, किसी और के बेटे को कुएँ में बंद करेगा। ये लड़ाई अब मेरी नहीं, इस गाँव की है।"
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