Spirit of a Fighter – Chapter 191
फिर अंदर से आहट आई — दौड़ते पैरों की।
गुड़िया आई। उसकी दोनों चोटियाँ खुली हुई थीं, और उसके हाथ में उसकी स्कूल की कॉपी थी, जिसे उसने सीने से लगाया हुआ था।
"भैया!" वो दौड़कर मेरे पास आई और मेरी कमर से लिपट गई। फिर उसने मेरी तरफ़ देखा, और उसकी आँखें भरी हुई थीं।
"क्या हुआ?" मैंने पूछा।
उसके होंठ काँपे।
"भैया," उसने कहा, और उसकी आवाज़ छोटी हो गई। "माँ ने आज चक्की नहीं चलाई… वो उठ ही नहीं पा रहीं।"
मेरे हाथ ठंडे हो गए।
मैंने गुड़िया को अपने से अलग किया और उसके कंधे पकड़े।
"कहाँ हैं वो?"
"अंदर। चारपाई पर।" गुड़िया का होंठ काँपा। "भैया, वो बोल नहीं रहीं। बस देख रही हैं। और उनकी आँखों से पानी…"
मैं दौड़ा।
दरवाज़े की देहरी पर मेरा पैर अटका, पर मैं रुका नहीं। अंदर अंधेरा था, बस चूल्हे के कोने में एक छोटा-सा दीया जल रहा था जिसकी लौ काँप रही थी।
माँ चारपाई पर थीं।
उनकी आँखें खुली थीं। उनका मुँह थोड़ा खुला था, और उनकी साँस चल रही थी — पर ऐसी कि जैसे हर साँस के लिए उन्हें कोई चीज़ तोड़नी पड़ रही हो।
मैं उनके पास बैठा और उनका हाथ पकड़ा।
उनका हाथ ठंडा था। बहुत ठंडा। जैसे चक्की का लोहा सर्दी की सुबह।
"माँ," मैंने कहा।
उनकी आँखें मेरी तरफ़ घूमीं। बहुत धीरे। और जब वो मुझ पर टिकीं, तो उनमें कुछ ऐसा था जो मुझे डरा गया।
वो मुझे पहचान रही थीं। पर जैसे कोई पहचानता है — किसी दूर की चीज़ को, जिसे देखने के लिए बहुत मेहनत करनी पड़े।
"बेटा," उन्होंने फुसफुसाया।
मेरी छाती फटने लगी।
"माँ, क्या हुआ? किसने कुछ किया? किसी ने कुछ दिया?"
उन्होंने धीरे-धीरे सिर हिलाया — ना में। और फिर उनका हाथ मेरे हाथ में काँपा।
"चक्की…" उन्होंने कहा।
"चक्की?"
"चक्की के नीचे…" उनकी साँस अटकी। "तेरे पापा ने… बीस साल पहले…"
मेरे कान खड़े हो गए।
"क्या, माँ? क्या रखा था पापा ने?"
उनकी आँखें बंद होने लगीं। मैंने उनका हाथ ज़ोर से पकड़ा।
"माँ! माँ, आँखें मत बंद करो! माँ!"
वो फिर खुलीं। और इस बार उनमें कुछ था जो पहले नहीं था — एक साफ़ चमक, एक झटका।
"पानी," उन्होंने कहा। "पानी में…" और फिर उनका हाथ ढीला पड़ गया।
मैंने उनकी कलाई पकड़ी। नाड़ी धीमी थी — बहुत धीमी — पर चल रही थी।
साँस चल रही थी।
मैं वहीं बैठा रहा। मेरे हाथ ठंडे थे, पर मेरी आँखों से आँसू गरम बह रहे थे, और वो मेरी ठुड्डी पर गिरकर सूख रहे थे।
गुड़िया मेरे पीछे खड़ी थी। उसने मेरा कंधा पकड़ा।
"भैया," उसने फुसफुसाया। "माँ ने आज सुबह एक बात कही थी।"
"क्या?"
"उन्होंने कहा — 'गुड़िया, अगर आज मैं चक्की पर न बैठूँ, तो तू भैया को बता देना कि चक्की के नीचे जो है, वो उसका है।'"
मेरी साँस रुकी।
मैंने धीरे से माँ का हाथ चारपाई पर रखा। फिर मैं उठा।
"टिंकू," मैंने कहा, और मेरी आवाज़ अब काँप नहीं रही थी — वो ठंडी थी, साफ़ थी। "माँ के पास बैठ। कोई पानी माँगे तो गरम देना। और अगर कोई बाहर से आए…" मैंने रुककर उसकी तरफ़ देखा। "तो तू भी बाहर नहीं जाएगा।"
टिंकू ने सिर हिलाया। उसके होंठ फटे थे, उसकी कमीज़ फटी थी, पर उसकी आँखें साफ़ थीं।
"कहाँ जा रहा है?" उसने पूछा।
"चक्की के पास," मैंने कहा। "मेरे पापा ने बीस साल पहले वहाँ कुछ छुपाया था। और भैरव ने उसे जलाकर ख़त्म करने की कोशिश की।"
मैं नीचे झुका। माँ की चारपाई के नीचे, उसी जगह जहाँ उनके जूते रखे थे, मेरी गुड़िया की वो लाल मिट्टी की थैली रखी थी। मैंने उसे उठाया। उसका रंग फीका पड़ गया था, पर उस पर माँ के हाथों की गरमाहट अब भी थी।
मैंने उसे अपनी जेब में रखा और दरवाज़े की तरफ़ बढ़ा।
आँगन में चक्की थी। आधी जली हुई। भैरव के आदमियों ने उसे जलाया था — माँ ने बताया था कि चक्की जलाने से ज़हर हवा में फैल गया। पर चक्की का पत्थर अब भी वहीं था। काला, टूटा, पर वहीं।
और उसके नीचे, मिट्टी में, कुछ दबा हुआ था।
मैंने पत्थर के किनारे पर हाथ रखा।
मिट्टी अब भी गरम थी। जैसे किसी ने अभी-अभी उसे छुआ हो।
मेरी उँगलियों में मिट्टी भर गई, और उस मिट्टी से एक गंध उठी — नम, भारी, और बहुत पुरानी। वो गंध मुझे कहीं ले जा रही थी। बीस साल पीछे।
माँ की आवाज़ मेरे कानों में गूँजी — "पानी में…"
मैंने पत्थर को ज़ोर से खींचा।
और तभी पीछे से गुड़िया की आवाज़ आई — छोटी, काँपती हुई।
"भैया… बाहर कोई है।"
मैंने हाथ रोका।
"कौन?"
"पता नहीं। पर उसके पैर की आवाज़…" गुड़िया ने होंठ भींचे। "…आवाज़ भैरव जैसी है।"
मेरे भीतर का ठंडा हिस्सा और ठंडा हो गया।
मैंने मिट्टी से हाथ निकाला और दरवाज़े की तरफ़ देखा।
अंधेरे में, फाटक पर, एक परछाई खड़ी थी।
लंबी। भारी। बिना हिले।
और फिर वो परछाई बोली — आवाज़ मीठी, जैसे गुड़, पर उसमें वो कुछ था जो मेरी रीढ़ के नीचे तक उतर गया।
"वीर बेटा… दरवाज़ा खोल। मैं तेरी माँ से मिलने आया हूँ।"
॥
फाटक पर खड़ी परछाई हिली नहीं। बस खड़ी रही, जैसे दीवार का हिस्सा हो।
मेरे हाथ से मिट्टी झर रही थी। गुड़िया ने मेरी कमीज़ पकड़ ली थी, इतनी ज़ोर से कि उसकी उँगलियाँ सफ़ेद पड़ गई थीं।
"भैया, दरवाज़ा मत खोलो," उसने फुसफुसाया।
"खोलूँगा नहीं," मैंने कहा।
बाहर से फिर आवाज़ आई। वही मीठी, धीमी, जैसे किसी ने शहद में उँगली डुबोकर बोला हो।
"वीर बेटा, मुझे पता है तू अंदर है। तेरी माँ से मिलने आया हूँ। दरवाज़ा नहीं खोलेगा तो मैं खुद खोल लूँगा।"
मेरी मुट्ठी भर गई। मैंने पत्थर के पास पड़ा लोहार का हथौड़ा उठाया। वो भारी था, पर मेरे हाथ में अब भी वज़न नहीं लगा।
"गुड़िया," मैंने धीरे से कहा। "पीछे जा। माँ के पास बैठ। और चुप।"
"पर भैया—"
"गुड़िया।"
वो पीछे हट गई। उसके पैरों की आवाज़ मिट्टी पर दबी रह गई।
मैं दरवाज़े के पास गया। किवाड़े की लकड़ी पर हाथ रखा। लकड़ी ठंडी थी। बाहर से उँगली की आवाज़ आई — कोई किवाड़े पर नाखून चला रहा था। धीरे-धीरे। जैसे गिन रहा हो।
"तेरे पापा जगदीश भी ऐसे ही दरवाज़ा नहीं खोलते थे," परछाई बोली। "आख़िरी रात भी उन्होंने दरवाज़ा नहीं खोला था। फिर मैंने उन्हें मिट्टी में मिला दिया।"
मेरे भीतर कुछ जम गया।
तभी अंदर से एक आवाज़ आई। कमज़ोर। बहुत कमज़ोर।
"वीर…?"
माँ की आवाज़।
मैं पलटा। माँ की आँखें खुली थीं। आधी। वो चारपाई पर सिर उठाने की कोशिश कर रही थीं, और उनका हाथ हवा में फैला था, जैसे मुझे ढूँढ रहा हो।
मैं दरवाज़ा छोड़कर उनके पास भागा।
"माँ—"
"पानी…" उनके होंठ हिले। "वीर, मेरे सीने में… जल रहा है।"
मैंने उनका हाथ पकड़ा। उनकी कलाई पतली थी, हड्डी उभरी हुई। माथा गरम था, पर हथेली ठंडी। और उनकी साँस में वो गंध थी।
वही कड़वी गंध।
पर बहुत हल्की। जैसे पानी में एक बूँद। जितनी भैरव के मटके में थी, उससे कई गुना कम।
मैंने चारों तरफ़ देखा। चूल्हे के पास, ज़मीन पर, एक टूटा हुआ कप पड़ा था। मिट्टी का कप, आधा टूटा, और उसके अंदर बची हुई चाय की पत्ती सूख रही थी।
मैंने कप उठाया। सूँघा।
और वहीं, उसी पल, मेरी गर्दन के पीछे के बाल खड़े हो गए।
वो चाय नहीं थी। चाय के रंग में घुला हुआ वही ज़हर था। वही कड़वाहट, वही धातु जैसी बदबू — जो मैंने भैरव के मटके में पहचानी थी, जो मैंने मुंशीजी की साँस में सुनी थी।
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