Spirit of a Fighter – Chapter 142
"काका," मैंने कहा, "यहाँ रोशनी करो।"
काका लालटेन लेकर आए। रोशनी पड़ी तो मैंने देखा — मिट्टी पर पैरों के निशान थे। छोटे, बड़े, बहुत सारे। किसी ने बार-बार इस जगह पर पैर रखा था।
"ये जगह," कालू काका ने धीरे से कहा। उनकी आवाज़ में कुछ और आ गया था। "यहाँ भैरव रुकता था। हर बार जब वो अंदर आता, यहीं रुककर खड़ा होता। मैंने सोचा था… इसे मिट्टी पसंद है।"
रणवीर सिंह ने दीवार का सहारा लेकर खुद को थोड़ा और सीधा किया।
"खोदो," उन्होंने कहा। "अभी।"
टिंकू ने अपनी टोपी उतारी और उसे फेंक दिया। हम दोनों घुटनों के बल बैठ गए। मिट्टी सख्त थी, ऊपर से सूखी, नीचे से गीली। हमने हाथों से खोदना शुरू किया। मेरे नाखूनों में मिट्टी भर गई। टिंकू हाँफने लगा।
"भाई," उसने कहा, "ये मिट्टी तो पत्थर जैसी है—"
"लगा रह है," मैंने कहा। "खोदता रह।"
हम खोदते गए। मेरी उँगलियाँ जलने लगीं। तभी मेरे हाथ में कुछ लगा — लोहा। ठंडा। जंग लगा हुआ।
"मिला!" मैंने कहा।
हमने तेज़ी से मिट्टी हटाई। और फिर वो सामने आया — एक लोहे का संदूक। छोटा-सा, पुराना, ऊपर से जंग लगा हुआ। उसका रंग काला पड़ गया था। ढक्कन पर एक मोटा ताला लगा था।
"ये…" हरनाम उठकर खड़ा हुआ। उसकी आँखें फैल गईं। "ये संदूक तो… ये तो भैरव के कमरे के पीछे वाली कोठरी में था। बीस साल पहले। फिर गायब हो गया। मैंने सोचा था बेच दिया।"
"तो ये यहाँ था," मैंने कहा। मैंने संदूक को हाथ लगाया। जंग मेरे हाथ में चिपक गई।
"ताले में क्या?" मीरा ने पूछा। वो मेरे पास आकर बैठ गई। उसने ताले को छुआ। "ये तो पुराना ताला है। भैरव की अलमारी वाला तो बड़ा है।"
कालू काका ने करीब झुककर देखा। उनकी आँखें सिकुड़ गईं।
"नहीं," उन्होंने कहा। "ये ताला भैरव की अलमारी की चाबी से खुलेगा। वही चाबी, जो उसकी कमर में बंधी रहती है। मैंने बीस साल इस ताले को उसी चाबी से खुलते देखा है।"
"तो चाबी चाहिए," मीरा ने कहा। उसकी आवाज़ में वो ज़िद थी जो मैं अब पहचानने लगा था।
"चाबी भैरव के पास है," टिंकू ने कहा। "और भैरव ये चाबी हमें सौंपने वाला नहीं है। वो तो खुद हमें मारने पर उतरा है।"
सब चुप हो गए।
तभी हरनाम ने अपनी जेब से कुछ निकाला। उसकी आवाज़ बहुत धीमी थी।
"रुको," उसने कहा। "ये मेरे पास है।"
उसके हाथ में एक काग़ज़ था — मुड़ा हुआ, पुराना, पर साफ़।
"ये उस लिफ़ाफ़े के साथ था जो मैंने तुझे दिया था," हरनाम ने मेरी तरफ़ देखकर कहा। "मैंने तुझे सिर्फ़ ऊपर वाला हिस्सा दिया। नीचे वाला हिस्सा नहीं दिया।" उसने काग़ज़ खोला। "ये रघुवीर की लिखाई है। उसने बीस साल पहले लिखा था। और मैंने इसे छुपा लिया था, क्योंकि इसमें भैरव का सबसे बड़ा राज़ था।"
मैंने काग़ज़ लिया। मेरे हाथ काँप रहे थे। काग़ज़ पुराना था, किनारों से फटा हुआ, पर लिखाई साफ़ थी — छोटी, तेज़, किसी ने जल्दी में लिखी थी।
पापा की लिखाई।
मैंने पढ़ा। मेरी आँखों के आगे अक्षर नाच रहे थे।
"ये संदूक…" मैंने धीरे से पढ़ा, "…इसमें सिर्फ़ काग़ज़ नहीं हैं। इसमें वो मिट्टी है जो भैरव ने बीस साल पहले तहखाने से उठाई थी। असली मिट्टी। जो उसने ज़हर से मिला दी थी। और उसी मिट्टी से उसने अपना पहला पहलवान मारा था।"
मैं रुका। मेरी आँखें नीचे की तरफ़ सरकीं।
"और इसमें एक काग़ज़ है," मैंने कहा, "जिस पर भैरव ने हर उस आदमी का नाम लिखा है जिसे उसने खत्म किया। और हर नाम के आगे… उसका असली नाम लिखा है। भवानी सिंह।"
हरनाम ने अपना सिर झुका लिया।
"हाँ," उसने कहा। "भैरव असल में भवानी सिंह है। पर ये संदूक सिर्फ़ भैरव का नहीं है।" उसकी आवाज़ फुसफुसाहट में बदल गई। "इसमें वो काग़ज़ भी है जो रघुवीर ने आख़िरी रात लिखा था। जब वो कुएँ में गिरा था। उसने अपनी जान बचाने के लिए नहीं लिखा। उसने इसलिए लिखा कि अगर उसकी लाश कभी मिले, तो सच भी मिले।"
तहखाने में एक लंबी साँस की आवाज़ आई। माँ थीं। उन्होंने अपना हाथ मुँह पर रख लिया।
मैंने काग़ज़ को उलटा। उसके पीछे भी कुछ लिखा था। मैंने पढ़ा।
"जगदीश सिंह," मैंने पढ़ा। मेरी आवाज़ रुक गई। मैंने फिर पढ़ा। "जगदीश सिंह। उम्र पैंतालीस साल।"
मेरे हाथ ठंडे पड़ गए।
"ये…" मैंने धीरे से कहा, "…ये तो मेरे पापा का नाम है।"
सबने मेरी तरफ़ देखा।
मैंने काग़ज़ को लालटेन के पास लाया। रोशनी उस पर पड़ी। और मैंने वो तारीख़ देखी जो नाम के नीचे लिखी थी।
मेरी साँस रुक गई।
"ये तारीख़…" मैंने कहा। मेरी आवाज़ अपनी नहीं लग रही थी। "…ये तारीख़ तो मेरे पैदा होने की तारीख़ है।"
तहखाने में सन्नाटा छा गया। इतना गहरा कि मुझे अपने दिल की धड़कन सुनाई दे रही थी।
माँ ने पीछे से एक छोटी-सी आवाज़ निकाली। जैसे किसी ने उनके सीने से हवा खींच ली हो।
"जगदीश…" वो फुसफुसाईं।
मैंने पलटकर उनकी तरफ़ देखा। उनका चेहरा पीला पड़ गया था। उनकी आँखों में पानी था, पर वो नीचे नहीं गिर रहा था। जम गया था।
"माँ," मैंने कहा, "ये क्या है?"
माँ ने कुछ नहीं कहा। उन्होंने अपना हाथ मेरी तरफ़ बढ़ाया। काँपता हुआ। फिर उन्होंने मेरा हाथ पकड़ लिया।
"मेरा बेटा," उन्होंने कहा। उनकी आवाज़ फट रही थी। "तेरे पापा जगदीश… वो उस दिन अखाड़े गए थे। तेरे पैदा होने के दिन। वो कह गए थे — 'बेटा होगा तो मैं उसे अखाड़े की मिट्टी में लेटाऊँगा।' और फिर…"
उनकी आवाज़ टूट गई।
"…वो लौटे ही नहीं।"
मेरा सिर घूम गया। मैं वहीं बैठ गया, उसी मिट्टी पर, जिसे मैं अभी खोद रहा था। मेरे हाथ के नीचे मिट्टी थी — ठंडी, गीली, और अब मुझे लग रहा था कि वो मुझे अंदर खींच रही है।
"पर…" मैंने कहा। मेरी आवाज़ किसी और की लग रही थी। "पर माँ, तूने तो कहा था कि जगदीश मेरे पापा थे। जिन्होंने मुझे गोद लिया।"
"हाँ," माँ ने कहा। उनका हाथ मेरे हाथ पर जमा हुआ था। "वो तेरे पापा थे। जिन्होंने तुझे गोद लिया। पर उस दिन… तेरे पैदा होने के दिन जो हुआ…"
उन्होंने एक गहरी साँस ली।
"वो सच सिर्फ़ रघुवीर जानता था," उन्होंने कहा। "और रघुवीर इस काग़ज़ में लिखकर गया है।"
मैंने फिर से काग़ज़ देखा। उस पर तारीख़ के नीचे कुछ और लिखा था — बहुत छोटे अक्षरों में। मैंने उन्हें पढ़ने की कोशिश की।
"जगदीश ने भैरव को मिट्टी में ज़हर डालते देख लिया था," मैंने पढ़ा। मेरी आवाज़ रुक-रुक कर आ रही थी। "उसने भैरव से कहा — 'ये गलत है। मैं रणवीर को बताऊँगा।' और भैरव ने…"
मैं रुक गया। मेरी आँखें जल रही थीं।
"भैरव ने उसी दिन उसे ज़हर दे दिया," मैंने पूरा किया। "और उसकी लाश… उसकी लाश उसने तहखाने की मिट्टी में दबा दी।"
माँ ने मेरा हाथ बहुत ज़ोर से पकड़ लिया।
"मैं उस दिन अखाड़े गई थी," वो बोलीं। उनकी आवाज़ सूखी थी। "वो मुझे अखाड़े में लेटा हुआ मिला। भैरव बोला — 'दिल का दौरा पड़ा।' और मैं… मैं उस वक़्त तेरे साथ थी। तू नया-नया पैदा हुआ था। मैं क्या करती? मैंने चुप रहना चुना।"
उन्होंने रुककर मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखों में वो पानी अब बह रहा था।
"और फिर रघुवीर ने मुझे गोद लेने को कहा," उन्होंने कहा। "क्योंकि रघुवीर जानता था कि भैरव एक दिन तुझे भी खत्म करेगा। और उसने अपनी जान देकर तुझे बचाया।"
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