Spirit of a Fighter – Chapter 1167
ठाकुर जैसे जम गया। उसका चेहरा सफ़ेद पड़ गया — नहीं, पीला, जैसे उसका खून ही सूख गया हो। "क्या?" वो बोला। "क्या बोला तूने?"
"मैंने कहा," टिंकू फिर बोला, और उसकी आवाज़ में वो हँसी थी जो ख़तरे के वक़्त भी नहीं छूटती, "तेरा गुड़ अब कुत्तों के पेट में है। सब। एक डिब्बा भी नहीं बचा।"
ठाकुर ने एक कदम पीछे रखा। फिर दूसरा। और उसका हाथ अपने आप सन्दूक से खिसक गया।
वही मौका था।
मैंने रस्सी खींची। गाँठ खुल गई। माँ के हाथ आज़ाद हुए, और उसने पहला काम यही किया — मेरा चेहरा दोनों हाथों में थाम लिया। उसकी हथेलियों में चूल्हे की गंध थी, और आटे की, और उस खाँसी की जो अब भी उसकी छाती में बैठी थी।
"बेवकूफ," उसने कहा। "बड़ा बेवकूफ है तू।"
"हाँ," मैंने कहा।
"अकेला आया।"
"माँ, मैं अकेला नहीं—"
पर मैं वाक्य पूरा नहीं कर पाया, क्योंकि उसी पल ठाकुर ने सन्दूक उठाया और भागने की कोशिश की — सुरंग की तरफ़, जहाँ से टिंकू आया था। और मैंने देखा कि सुरंग के मुँह पर एक परछाई खड़ी थी।
॥
परछाई हिली नहीं। वो वहीं खड़ी रही, सुरंग के मुँह पर, और ठाकुर सन्दूक लिए उसकी तरफ़ भागा — भागा नहीं, लड़खड़ाया, क्योंकि सन्दूक भारी था और उसके हाथ काँप रहे थे। दीये की लौ फिर काँपी और उस परछाई पर पड़ी।
वो टिंकू था। हाथ में लोहे का डंडा, सिर पर वही टोपी, और चेहरे पर वो हँसी जो इस वक़्त भी नहीं छूटी थी। पर उसके पैर काँप रहे थे, और मैं जानता था कि वो डर रहा है — बहुत डर रहा है — और फिर भी खड़ा था।
"रास्ता बंद है, ठाकुर साहब," टिंकू ने कहा। "अंदर से ताला लगा दिया है मैंने। अब तेरे पास सिर्फ़ यही कमरा है।"
ठाकुर ने सन्दूक नीचे रखा। उसकी साँस फूल रही थी। उसने एक बार मेरी तरफ़ देखा, फिर टिंकू की तरफ़, फिर अपने हाथ में पकड़ी छुरी की तरफ़ — जैसे वो खुद भूल गया हो कि उसके हाथ में क्या है।
"तू?" वो बोला। "तू कौन है?"
"मैं?" टिंकू ने कंधे उचकाए। "मैं तो वही हूँ जिसकी मिठाई तूने कभी नहीं चखी। तेरी क़िस्मत अच्छी थी, वरना आज तक तेरी दुकान का गुड़ तेरे गले में फँसा होता।"
माँ ने कुर्सी पर हल्की सी हरकत की। मैंने उसकी रस्सी खोली थी, पर उसके हाथ अभी भी पीछे बँधे थे — कलाई पर कपड़ा लिपटा था। मैंने वो कपड़ा खींचा। उसकी कलाई पर लाल निशान थे, चमड़ी छिली हुई थी। मेरे हाथ रुक गए उन निशानों पर।
"देख," ठाकुर ने कहा, और उसकी आवाज़ में वो पुरानी मिठास लौट आई थी — वो मिठास जो ज़हर के ऊपर लगाई जाती है। "देख, तेरी माँ को कुछ नहीं हुआ। बाल तक बाँका नहीं। क्योंकि मैं इंसान हूँ, वीर। तेरे जैसा जानवर नहीं जो जलती कोठी में घुसकर बच्चे उठा लाता है और फिर उन्हीं बच्चों को लेकर मेरे खिलाफ़ खड़ा हो जाता है।"
"तूने उसे बाँधा है," मैंने कहा। "कुर्सी से।"
"ताकि वो भागकर अपने बेटे के पास न आए और मेरा काम खराब न करे। ये इंसानियत है। समझता नहीं तू?"
शेराज़ ने उस पल एक कदम आगे बढ़ा। उसका लंगड़ा पैर घसीटता हुआ आया और उसने मेरे और माँ के बीच आकर खड़े होने की कोशिश की। उसके हाथ में भी छुरी थी, छोटी, पर उसकी पकड़ कसी हुई थी — किसी कारीगर की पकड़, जो चाकू से खेलता नहीं, काम करता है।
"पीछे," शेराज़ ने कहा। उसकी आवाज़ में सिर्फ़ थकान थी। "बच्चे, तू मेरे सामने से हट जा। मेरा काम आसान कर दे।"
"तेरा काम?" मैंने कहा। "तेरा काम क्या है, शेराज़? बूढ़ों को डराना? बच्चों को उठाना? या अपनी बेटी को याद करना, जो अभी भी उस बंद कोठी में बैठी है और तेरा नाम पुकारती है?"
उसका हाथ रुका। छुरी की नोक हवा में ठहर गई। उसकी आँखों में कुछ टूटा — सिर्फ़ एक पल के लिए, पर टूटा।
"बेटी," वो धीरे से बोला, जैसे शब्द उसके मुँह से निकलने से डर रहा हो। "वो… वो ठीक है?"
"वो ठीक है," मैंने कहा। "क्योंकि मैंने उसे निकाला। और तूने देखा था ना, जब मैंने उसे खिड़की से नीचे उतारा। तू वहीं था।"
शेराज़ का चेहरा बदला। उसने ठाकुर की तरफ़ देखा — एक लंबा, ठंडा, सवाल भरा देखा। और उसी पल मुझे समझ आया कि शेराज़ भी इस आदमी से डरता है, और उस डर के अंदर एक और चीज़ है — एक हिसाब जो अभी बाकी है।
"शेराज़!" ठाकुर की आवाज़ कड़की। "अपना काम कर। मैंने तुझे इसलिए पाला है?"
"तूने मुझे पाला नहीं," शेराज़ ने कहा, बिना पलटे। "तूने मेरी बेटी को पकड़कर मुझे पालतू बनाया। फर्क है दोनों में।"
कमरे में सन्नाटा छा गया। दीये की लौ भी जैसे ठहर गई। ठाकुर की आँखें छोटी हुईं, फिर फैलीं। उसने छुरी अपनी तरफ़ खींची।
"तो ये तेरा फ़ैसला है?" वो बोला, और उसकी आवाज़ अब मीठी नहीं थी — सूखी थी, फटी हुई। "बीस साल की सेवा के बाद? तू भी उन्हीं में से है? तू भी भवानी के बेटे के पीछे?"
"मैं किसी के पीछे नहीं हूँ," शेराज़ ने कहा। "मैं बस अपनी बेटी के आगे हूँ।" और उसने छुरी नीचे कर दी। धीरे से। जैसे कोई भारी बोझ रखता है।
पर ठाकुर ने वो पल नहीं गँवाया। शेराज़ के कंधे पलटते ही वो मेरी तरफ़ लपका — छुरी सीधी मेरी छाती की तरफ़। मैंने अपनी बाँह उठाई और ब्लेड बाँह पर फिसल गई, काटती हुई। गरम दर्द दौड़ा। मैंने पीछे कदम रखा, पर ठाकुर दूसरी बार आया — और इस बार मैंने उसकी कलाई पकड़ ली। उसकी कलाई पतली थी, हड्डी जैसी। उस आदमी का पूरा डर उसकी हड्डियों में उतर आया था।
हम दोनों ज़मीन पर गिरे। मेरी बाँह से खून टपक रहा था, पर मैंने उसकी कलाई नहीं छोड़ी। उसने मेरे चेहरे पर हाथ मारा। मैंने उसे दबोचा। उसकी छुरी हाथ से छूटकर दूर खिसक गई। और उसी वक़्त माँ की आवाज़ आई — बहुत साफ़, बहुत ऊँची, उस छोटे से कमरे में गूँजती हुई।
"मत कर, बेटा! मत कर!"
पर वो मुझे नहीं रोक रही थी। वो ठाकुर को रोक रही थी। और ठाकुर ने वो सुना। उसने मेरे नीचे से अपना सिर घुमाया और उसकी तरफ़ देखा — और उसकी आँखों में कुछ ऐसा आया जो मैंने पहले कभी नहीं देखा था। डर। सिर्फ़ डर नहीं — पहचान। जैसे वो किसी पुराने दर्पण में अपना चेहरा देख रहा हो।
"तू…" वो हाँफते हुए बोला। "तू अब भी… मेरे लिए…"
"मैं तेरे लिए कुछ नहीं हूँ," माँ ने कहा। उसकी आवाज़ में वो चीज़ नहीं थी जो मैंने सोची थी — कोई नरमी नहीं। सिर्फ़ थकान, बीस साल की थकान। "मैं बस ये नहीं देख सकती कि मेरे बेटे के हाथ खून से रंगें। तू उसके हाथ गंदे मत करवा।"
मैंने ठाकुर को छोड़ दिया। वो ज़मीन पर पड़ा रहा, साँस लेता हुआ। शेराज़ ने आगे बढ़कर उसकी छुरी उठाई और अपनी कमर में खोंस ली। फिर वो मेरी तरफ़ देखकर बोला, "तूने मेरे लिए जगह छोड़ी थी। उस दिन कोठी में। मेरी बेटी के लिए। मैं वो नहीं भूलूँगा।"
"तू मेरी माँ को बाँधने में मदद कर रहा था," मैंने कहा। मेरी आवाज़ कड़वी थी, और मैं उसे मीठा नहीं करना चाहता था।
"हाँ," शेराज़ ने कहा, बिना बहाना बनाए। "और वो मैं हूँ जो अब इसे खोल रहा हूँ। दोनों सच हैं। तेरे हिसाब से देख ले।"
माँ ने कुर्सी से खुद को उठाने की कोशिश की। मैंने हाथ बढ़ाया। उसने मेरा हाथ नहीं पकड़ा — उसने पहले मेरी बाँह देखी, खून देखा, और उसका चेहरा सख़्त हो गया।
"बाँध," उसने कहा। "पहले बाँध।"
"माँ, ये कुछ नहीं है—"
"बाँध, वीर। मैं जानती हूँ क्या है और क्या नहीं है। तू बाँध।"
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