Spirit of a Fighter – Chapter 116
एक बार। दो बार। तीन बार।
फिर रुक गया।
और उसके बाद जो आवाज़ आई, वो ढोल की नहीं थी।
वो किसी के हँसने की आवाज़ थी।
धीमी। लंबी। और मुझे लगा — वो मेरे ही आँगन से आ रही है।
मैं पलटा।
दरवाज़े पर कोई नहीं था।
पर दीवार पर, ताज़ी मिट्टी से, एक लाइन लिखी थी —
"तीन दिन में तेरे घर का चूल्हा बुझेगा। देख लेना।"
मैंने अपनी जली हथेली मुट्ठी में भींच ली।
और अंदर से माँ की आवाज़ आई — "वीर? कौन था?"
मैंने काग़ज़ जेब में रखा। मुट्ठी खोली। ज़मीन पर पैर जमाए।
"कोई नहीं, माँ," मैंने कहा। "बस हवा।"
पर मैं झूठ बोल रहा था। और मुझे पता था — माँ को भी पता चल गया।
॥
माँ ने मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखों में वो सवाल था जो वो कभी ज़ोर से नहीं पूछतीं।
"वीर, तू सच बोल।"
मैंने मुट्ठी खोली। जली हथेली पर छाला उभर आया था। मैंने उसे पल्ले से ढक लिया।
"काग़ज़ जल गया, माँ। फिर भी एक नाम बचा लिया।"
"कौन?"
"जगदीश।"
माँ कुछ देर बैठी रहीं। फिर उन्होंने अपनी कमर सीधी की — जैसे कोई बोझ उतार रही हों — और उठकर चूल्हे की तरफ़ चलीं।
"वो काग़ज़ कहाँ है?"
"जेब में।"
"रख।" वो बोलीं। "जलाने के लिए नहीं। दिखाने के लिए।"
मैं चौंका।
"किसको दिखाऊँ?"
"जो उसे पहचाने।" उन्होंने दाल में उबकाई दी। "जगदीश का नाम गाँव में किसी को याद नहीं। उसका नाम सिर्फ़ दो जगह लिखा है — पंचायत के रजिस्टर में, और अखाड़े के उस पुराने बोर्ड पर जो अब भी कमरे की दीवार पर टँगा है। जो उसे पढ़ेगा, वो बताएगा कि उसके नीचे किसका नाम है।"
मैंने सिर ऊपर किया।
"रात बाकी है," मैंने कहा। "मैं सोता हूँ।"
माँ ने मेरी तरफ़ देखा — शक से नहीं, हैरानी से।
"तू सोएगा?"
"तूने कहा था।" मैंने कंधे उठाए। "और सच कहूँ, आज पहली बार नींद आ रही है।"
वो हँसीं। बहुत दिनों बाद हँसीं। और उस हँसी में कुछ था जो मेरे सीने में जाकर बैठ गया — जैसे गरम रोटी पर घी।
पर सोने से पहले मैंने एक काम किया। आँगन की दीवार पर जो लाइन लिखी थी — "तीन दिन में तेरे घर का चूल्हा बुझेगा" — मैंने उसे मिटाया नहीं। मैंने उसके नीचे अपनी उँगली से मिट्टी से चार शब्द लिखे।
"चूल्हा नहीं, आग है।"
गुड़िया दरवाज़े से झाँक रही थी।
"भैया, ये क्या लिखा?"
"जवाब," मैंने कहा।
वो पास आई, मेरी जली हथेली देखी, और कुछ नहीं बोली। बस अपनी कॉपी से एक पन्ना फाड़कर उस पर लपेट दिया। लपेटते वक़्त उसकी उँगलियाँ काँप रही थीं, पर चेहरे पर वो ज़िद थी जो माँ से मिली है।
"कल सुबह मैं भी चलूँगी।"
"कहाँ?"
"अखाड़े।" उसने कॉपी सीने से लगाई। "सुक्खी बुआ ने कहा, आज भर्ती है।"
मैं उसके सामने बैठ गया।
"गुड़िया, वहाँ भैरव होगा।"
"तो?" उसने सीधा आँखों में देखा। "तू भी तो होगा।"
मैंने उसका सिर सहलाया। कुछ नहीं कहा, क्योंकि जो कहना था वो मुँह से नहीं निकला। बस उस रात पहली बार मैं सच में सोया — गहरी नींद, बिना सपने, बिना आवाज़।
सुबह पाँच बजे माँ ने उठाया। हाथ में एक छोटी गठरी थी।
"ये रोटी है।" उन्होंने मेरी कमर पर बाँध दी। "अखाड़े में भूख लगे तो खा लेना। पर एक बात याद रख — वहाँ कोई तुझे खाने को नहीं देगा। तो रोटी संभालकर रखना। जो अपनी रोटी संभालता है, वो अपनी मिट्टी संभालता है।"
गुड़िया ने मेरे बाल ठीक किए। माँ ने माथे पर तिलक लगाया। और मैं निकल पड़ा — फटी धोती, टूटी चप्पल, कंधे पर कोई बोझ नहीं, पर सीने में एक काग़ज़ जो जलते-जलते बचा था।
अखाड़े के बाहर मैंने जो देखा, वो मैंने कभी नहीं देखा था।
लंबी लाइन। पचास से ज़्यादा लड़के। कोई सत्तर का, कोई अठारह का। कोई नंगे पैर, कोई नए जूते पहने जो अभी धूल से नहीं मिले थे। किसी के हाथ में डंडा, किसी के गले में ताबीज़, किसी के हाथ में माँ का दिया कड़ा। सबके सब आगे बढ़ने की जल्दी में, और सबके सब मुँह ऐसा जैसे कुछ खो चुके हों।
मैं सबसे पीछे खड़ा हो गया।
मेरे आगे वाला लड़का पलटा। उसने मुझे ऊपर से नीचे देखा — धोती, चप्पल, ज़मीन पर टिका पैर।
"तू भी भर्ती के लिए?"
"हाँ।"
"तू पहलवान दिखता है?" वो हँसा। पीछे दो लड़के और हँसे।
"नहीं," मैंने कहा। "पर मैं यहाँ हूँ।"
वो मेरे कंधे पर हाथ रखने ही वाला था कि लुट्टन आ गया।
वो लाइन के साथ-साथ चल रहा था, हाथ में कॉपी, कान के पीछे पेंसिल। हर लड़के का नाम पूछता, लिखता, और कुछ न कुछ ज़रूर कहता — "तेरे पापा क्या करते हैं?", "कितनी बार लड़ा है?", "खून में दम है या सिर्फ़ बात?"
जब मेरी बारी आई, उसने ऊपर देखा।
और रुक गया।
"तू?"
मैंने उसकी आँखों में देखा। उसकी साँस में आज भी वो कड़वाहट थी। ज़हर नहीं रुका था उसके शरीर में — बस अब वो छुपाने की कोशिश कर रहा था। पर मैं जानता था — जो एक बार पीता है, उसकी साँस कभी साफ़ नहीं होती।
"तू यहाँ क्यों खड़ा है?" उसने कॉपी बंद कर दी।
"भर्ती के लिए।"
"भर्ती पहलवानों की है।" उसने आवाज़ ऊँची की, ताकि सब सुनें। "भिखारियों की नहीं।"
कुछ लड़के हँसे। पर कुछ नहीं हँसे — वो मेरी तरफ़ देख रहे थे, जैसे अपना ही चेहरा देख रहे हों।
मैंने अपनी चप्पल देखी। फिर उसकी तरफ़ देखा।
"लुट्टन, मेहनत का कोई सर्टिफ़िकेट होता है क्या?"
वो चौंका।
"क्या?"
"सर्टिफ़िकेट।" मैंने धीरे से कहा। "काग़ज़। जो ये बताए कि मैंने कितनी बार मिट्टी में पसीना गिराया। तेरे पास होगा? दिखा दे। मैं भी अपना दिखा दूँगा — बस मेरे पास काग़ज़ नहीं, हथेली है।" मैंने मुट्ठी खोली। छाले दिखे। "ये पढ़ ले।"
लाइन में सन्नाटा छा गया।
लुट्टन का चेहरा लाल हो गया। वो मेरी तरफ़ बढ़ा, मेरा कंधा पकड़ा और धक्का दिया। मैं दो कदम पीछे हटा, पर गिरा नहीं।
"निकल यहाँ से," वो फुसफुसाया। "भैरव सर ने तुझे देखा तो—"
"मैंने देख लिया।"
ये आवाज़ पीछे से आई।
लुट्टन का हाथ मेरे कंधे से अपने आप खिसक गया। उसकी कमर सीधी हुई। चेहरे पर वो मुस्कान आई जो डर से बनती है।
भैरव सिंह अखाड़े के गेट से बाहर आ रहा था। आज वो मैदान की लाल धोती में नहीं था — सफ़ेद कुर्ता-पजामा, गले में वही सोने की चेन, हाथ में तांबे का लोटा। चलते वक़्त उसकी मूँछें हवा में हिल रही थीं, और उसकी आँखें लाइन पर ऐसे फिर रही थीं जैसे कोई गिन रहा हो।
वो सीधा मेरे पास आया।
लाइन के सारे लड़के पीछे हट गए — जैसे रास्ता बन रहा हो।
"वीर सिंह।" उसने मेरा नाम ऐसे लिया जैसे दवा की शीशी पर लिखा हो। "रघुवीर का बेटा।"
मैंने कुछ नहीं कहा।
वो मुस्कुराया। गुड़ जैसी मुस्कान। और फिर उसने अपना हाथ बढ़ाया और मुझे गले लगा लिया।
मेरा पूरा शरीर सख़्त हो गया।
उसका कुर्ता ठंडा था। उसकी चेन मेरी छाती से लगी और उसकी ठंडक मेरे पेट तक चली गई। उसकी मूँछों से तेल की गंध आ रही थी — नारियल का तेल, भारी, और उसके नीचे कुछ और। कुछ जो मैं जानता था। कुछ जो मेरी नाक ने पहचान लिया और मेरे पैरों ने नहीं।
साँप। मुझे लगा किसी साँप ने लिपट लिया। और साँप भी वो जो पहले डसता है, फिर पूँछ हिलाता है।
"ये लड़का," भैरव ने मेरा कंधा पकड़कर मुझे पीछे किया और लाइन की तरफ़ देखा, "रघुवीर का बेटा है। मेरे अखाड़े के सबसे बड़े पहलवान का बेटा।"
लाइन में सन्नाटा था। किसी ने ताली नहीं बजाई। कोई हिला नहीं।
"इसे खास नज़र से रखना।" भैरव ने लुट्टन की तरफ़ देखा। "समझा?"
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