Spirit of a Fighter – Chapter 115
मेरे पैर जड़ हो गए।
भर्ती। तीन दिन बाद मुकाबला। और उससे पहले भर्ती।
मैं भीड़ के किनारे खड़ा रहा। सामने, चबूतरे पर ही, एक आदमी बैठा था — हरनाम। चश्मा, फ़ाइलें, और सामने काग़ज़ों का ढेर। वो नाम लिख रहा था। लोग आ रहे थे, अपने बेटों के नाम बता रहे थे।
और हरनाम हर नाम लिखने से पहले एक बार ऊपर देख रहा था — जैसे किसी की इजाज़त ले रहा हो।
मैंने ऊपर देखा।
चबूतरे के पीछे, नीम के पेड़ की छाया में, भैरव खड़ा था। हाथ बाँधे। चुप। और उसकी आँखें भीड़ पर घूम रही थीं — पर हर चेहरे पर नहीं। बस कुछ चुनिंदा चेहरों पर।
मैंने करीब से देखा। जिनके नाम लिखे जा रहे थे, वो सब दुबले-पतले लड़के थे। छोटे। भूखे। गरीब। और उनके बाप अपने सिर नीचे किए खड़े थे।
मेरी नाक में कुछ आया। बहुत हल्का। पर आया।
गुड़ के जैसी मिठास। पानी में घुली हुई।
वो हरनाम की कलम से आ रही थी।
नहीं। कलम से नहीं। काग़ज़ से। जिन काग़ज़ों पर वो नाम लिख रहा था, उन पर पहले से कुछ लगा हुआ था।
मैं आगे बढ़ा। भीड़ को चीरता हुआ। एक आदमी ने मुझे रोका — "अरे वीर, तू भी नाम लिखवाने आया?" — पर मैंने उसे हाथ से हटाया और आगे बढ़ा।
हरनाम ने मुझे देखा। उसका चेहरा पीला पड़ गया।
"वीर," वो बोला, और उसकी आवाज़ में वो काँप था जो मैंने उसके दफ़्तर में सुना था। "तू—तू इस वक़्त?"
"ये काग़ज़ क्या हैं?" मैंने पूछा।
"फ़ॉर्म हैं। भर्ती के।"
"इन पर क्या लगा है?"
वो रुका।
"कुछ नहीं।"
मैंने एक काग़ज़ उठाया। सूँघा। वो मिठास अब साफ़ थी — गुड़, थोड़ा-सा नमक, और उसके नीचे वो कड़वाहट जो मैं भूल नहीं सकता था। वो कड़वाहट जो पापा की धोती में थी। जो माँ की चूड़ी में थी।
मैंने काग़ज़ नीचे रखा।
"ये काग़ज़ ज़हर में डुबोए हैं," मैंने कहा। ऊँची आवाज़ में। सबको सुनाई देने वाली आवाज़ में।
भीड़ रुक गई। ढोल रुक गया।
"जो इन पर नाम लिखेगा," मैंने आगे कहा, "उसकी उँगली पर ज़हर लगेगा। और जो उँगली मुँह में जाएगी — बस।"
सुक्खी बुआ का पान का बीड़ा मुँह से गिर गया।
"अरे—" वो बोलीं, "अरे मैंने तो सुना है—"
"चुप!" हरनाम चिल्लाया। वो खड़ा हुआ, फ़ाइलें गिरीं। "ये झूठ है! ये लड़का पागल है!"
"तो काग़ज़ सूँघकर दिखा," मैंने कहा। "सबके सामने। नाम लिख, और अपनी उँगली मुँह में डाल।"
हरनाम का हाथ काँपा।
और भीड़ में एक बूढ़ा आदमी आगे आया। झुका हुआ, सफ़ेद दाढ़ी, लाठी। उसने काग़ज़ उठाया, सूँघा, और फिर उसे नीचे पटक दिया।
"इसमें गुड़ की बू है," वो बोला। "और मेरा बेटा तीन साल पहले इसी अखाड़े से गया था। उसके हाथ में भी ये बू थी।"
भीड़ भड़क उठी।
हरनाम पीछे हटा। फ़ाइलें छोड़कर, काग़ज़ छोड़कर, वो भागा। भीड़ ने रास्ता नहीं दिया — तो वो चबूतरे के पीछे से कूदा और नीम के पेड़ की तरफ़ भागा।
पर वहाँ भैरव खड़ा था।
हरनाम उसके पैरों पर गिरा।
"सर," वो रोया, "सर, मैंने कहा था न — ये लड़का ख़तरनाक है। सर, बचाइए।"
भैरव ने उसे नीचे देखा। बहुत देर तक। और फिर उसने वो किया जो मैंने सोचा नहीं था।
उसने हरनाम का हाथ पकड़ा और उसे उठाया।
"उठ," उसने कहा, आवाज़ मीठी। "तू मेरा आदमी है। कोई तुझे कुछ नहीं करेगा।"
और फिर वो भीड़ की तरफ़ मुड़ा।
"ये काग़ज़," उसने ऊँची आवाज़ में कहा, "मैंने ही मँगवाए थे। खुशबू वाले। ताकि नाम लिखने में मन लगे।" वो हँसा। "और ये लड़का — वीर सिंह — ये कल का पहलवान है। इसने मेरी अलमारी जलाई है। इसकी नाक है — सबको बदबू आती है।"
भीड़ हिचकिचाई।
"अगर इसमें ज़हर है," भैरव ने काग़ज़ उठाकर ऊपर किया, "तो मैं खुद इसे मुँह में डालता हूँ।"
और उसने काग़ज़ अपने मुँह के पास किया।
मेरी साँस रुक गई।
वो रुका। मुस्कुराया। और काग़ज़ वापस नीचे रख दिया।
"देखा?" उसने भीड़ से कहा। "डर तो इस लड़के को लगा। मुझे नहीं।"
भीड़ में कुछ लोग हँसे। कुछ चुप रहे। बूढ़ा आदमी अपनी लाठी पर झुका रहा, और उसकी आँखों में पानी था।
भैरव ने हरनाम का कंधा पकड़ा और उसे लेकर अंधेरे में चला गया।
और मैं चबूतरे के नीचे खड़ा रह गया, सबके सामने, और मेरे हाथ में एक काग़ज़ था जिसे मैंने चुपके से उठा लिया था।
मैंने उसे सूँघा। गुड़। नमक। और कड़वाहट।
मैंने उसे जेब में रखा।
घर लौटा तो आधी रात हो चुकी थी। माँ जाग रही थीं। गुड़िया सो रही थी, और उसके हाथों पर हल्दी लगी थी, और वो सोते हुए भी अपनी हथेलियाँ सीने से लगाए थी।
मैंने माँ को सब बताया। भर्ती। काग़ज़। हरनाम का भागना। भैरव का उसे बचाना।
माँ ने सुना। फिर बोलीं —
"भैरव ने हरनाम को नहीं बचाया।"
"तो?"
"उसने भीड़ को दिखाया कि वो अपने आदमी को नहीं छोड़ता।" उन्होंने चूल्हे की राख में लकड़ी डाली। "अब जो भी उसके पास जाएगा, वो सोचेगा — भैरव मेरा साथ देगा।"
मैंने सिर हिलाया।
"और एक बात," माँ ने कहा। "उसने काग़ज़ मुँह में नहीं डाला।"
"मैंने देखा।"
"तो उसे पता है उसमें ज़हर है।" वो मेरी तरफ़ पलटीं। "और अब हमें भी पता है कि उसे पता है। ये हमारा पहला सच्चा सबूत है, वीर।"
मैं उनके सामने बैठ गया।
"माँ, तीन दिन बाद मुकाबला है। और मैं अभी तक तय नहीं कर पाया — अखाड़े में उतरूँ या रात में घुसूँ।"
वो मेरे पास आकर बैठीं।
"तूने आज गुड़िया के हाथ देखे?"
"देखे।"
"और मेरी कमर?"
मैंने उनकी तरफ़ देखा। उन्होंने अपना पल्ला ठीक किया, पर मैंने देख लिया — उनकी कमर एक तरफ़ झुकी हुई थी।
"तू अकेला लड़ेगा," उन्होंने कहा, "तो ये घर भी अकेला लड़ेगा। और ये घर अकेला नहीं लड़ सकता।" उन्होंने मेरा हाथ पकड़ा। "पर अगर तू सबके सामने लड़ेगा — तो सारा गाँव तेरे साथ लड़ेगा। भले वो कुछ न बोले, भले वो डरे — पर वो देखेगा। और जो देखता है, वो बाद में बोलता है।"
मैंने उनका हाथ कसकर पकड़ा।
"तो अखाड़े में?"
"अखाड़े में," वो बोलीं। "पर एक शर्त पर।"
"क्या?"
"जब तक तीन दिन हैं, तू रात में सोएगा।"
मैं हँसा।
"माँ—"
"मैंने कहा।" उनकी आवाज़ में वो गरमी आई जो बहुत कम आती थी। "तीन दिन तू सोएगा। मिट्टी में। जैसे पहलवान सोते हैं। और उस मिट्टी को कालू काका तैयार करेंगे।"
मैंने सिर हिलाया।
"ठीक है।"
मैं उठा और बाहर जाने लगा।
"कहाँ?"
"जेब में एक काग़ज़ है," मैंने कहा। "उसे राख में डाल दूँ। वो मेरे घर में नहीं रहेगा।"
माँ ने मुझे रोका नहीं।
मैं आँगन में गया। चूल्हे की बची आग में काग़ज़ डाला। वो सिकुड़ा, काला हुआ, और जल गया।
पर जलते-जलते, आग की रोशनी में, मुझे उस काग़ज़ पर कुछ दिखा।
कुछ लिखा था। हल्का-सा, पेंसिल से, किनारे पर।
मैंने जल्दी से उसे निकाला। आग बुझा दी हथेली से। मेरी हथेली जल गई, पर मैंने काग़ज़ बचा लिया।
उस पर एक नाम था।
और वो नाम मेरे पापा का नहीं था।
वो नाम था — "जगदीश"।
मेरे गोद लेने वाले पापा का नाम। जो अखाड़े में मरे थे।
काग़ज़ के नीचे एक लाइन थी, बहुत छोटी, बहुत घसीटी हुई —
"जगदीश को भी वही पिलाया। वो भी चुप रहा।"
मैं आँगन में बैठ गया। जली हथेली ज़मीन पर रखी। और आग की आख़िरी रोशनी में मैंने उसे देखा — वो लिखाई। वो हरनाम की नहीं थी।
वो भैरव की थी।
वो खुद लिखता था। हर मौत का हिसाब। हर नाम। अपने हाथ से।
मैंने काग़ज़ सीने से लगाया।
और उसी वक़्त, दूर अखाड़े की तरफ़ से, ढोल फिर बजा।
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