Spirit of a Fighter – Chapter 1140
"तुम ठीक हो?" उसने पूछा।
"नहीं," मैंने कहा। "पर अब ठीक हो जाऊँगा।"
वो मुस्कुराई। उसकी आँखों में पानी था, पर होंठ हँस रहे थे।
और तभी पीछे से एक आवाज़ आई — माँ की।
"वीर।"
मैं पलटा। वो सीढ़ियों से उतर रही थीं, और उनके पीछे गुड़िया दौड़ रही थी। गुड़िया सीधे मेरे पास आई और मेरे पेट में सिर मारकर चिपक गई।
"भैया," वो बोली, "मैंने कहा था ना, तुम उन सबको पछाड़ दोगे।"
मैंने उसके बाल सहलाए। उसके बालों में अब भी हल्दी की गंध थी।
माँ मेरे पास आईं। उन्होंने मेरा चेहरा दोनों हाथों में पकड़ा और देर तक देखा।
"तू रोया?" उन्होंने पूछा।
"नहीं," मैंने कहा, और नाक साफ़ की।
"झूठा," उन्होंने कहा, और मेरे माथे पर हल्दी का टीका लगा दिया — वो टीका जो उनकी उँगली पर हमेशा रहता था। "अब घर चल। चक्की बंद है, आटा नहीं है, और तूने आज सुबह से कुछ नहीं खाया।"
"माँ," मैंने कहा, "आज चक्की बंद रहने दे।"
वो रुकीं। फिर उन्होंने मेरी तरफ़ देखा, और उनकी आँखों में कुछ बदला।
"आज?" उन्होंने कहा।
"आज हम सब बाहर खाएंगे," मैंने कहा। "टिंकू की मिठाई से शुरू करेंगे।"
टिंकू पीछे से आया, और उसके हाथ में सच में एक डिब्बा था।
"मैंने सोचा था," उसने कहा, और शर्माते हुए अपना सिर खुजाया, "आज का दिन बड़ा है, तो कुछ मीठा हो जाए।"
माँ ने उसे देखा। और फिर उन्होंने कुछ किया जो मैंने पहले कभी नहीं देखा — उन्होंने टिंकू के सिर पर हाथ रखा, और उसका माथा चूम लिया।
टिंकू की आँखें भर आईं। वो कुछ नहीं बोला, बस डिब्बा माँ के हाथ में दे दिया और मुड़कर अपनी आँखें पोंछने लगा।
और मैं वहीं खड़ा सोच रहा था — ये सब जीत तो गए, पर एक बात अभी भी मेरे सीने में चुभ रही थी। मेरे चाचा, गंगाधर, अदालत में था। उसने अभी तक एक शब्द नहीं कहा था। और जब सिपाही ठाकुर को ले जा रहे थे, तब वो हँसा था — धीरे से, जैसे किसी को कुछ पता हो जो सबको नहीं पता।
मैंने मीरा की तरफ़ देखा। उसने भी देखा था।
"वो हँसा क्यों?" मैंने पूछा।
मीरा ने अपना बैग कंधे पर टिकाया।
"मुझे नहीं पता," उसने कहा। "पर मुझे ये भी पता है कि जब कोई बीस साल बाद भी हँसता है, तो उसके पास कुछ बचा होता है।"
मैंने आसमान की तरफ़ देखा। धूप ढल रही थी, और हवा में गुड़ की चाशनी की गंध अब भी थी — पर अब उसमें कुछ और मिला हुआ था। जली हुई मिट्टी की गंध।
मैंने कालू काका की तरफ़ देखा। वो अदालत की सीढ़ियों पर खड़े थे, और उनका चेहरा पीला था।
"कालू काका," मैंने कहा। "क्या हुआ?"
उन्होंने मेरी तरफ़ देखा, और उनकी आवाज़ धीमी थी।
"वो हँसा," उन्होंने कहा, "क्योंकि उसे पता है कि हवेली में अभी भी एक दरवाज़ा बंद है। और उस दरवाज़े की चाबी आज तक किसी को नहीं मिली।"
मेरे हाथ में वो लोहे की छोटी कुंजी थी जो सुबह पोटली में मिली थी। मैंने उसे जेब से निकाला और मुट्ठी में कस लिया।
"तो चलो," मैंने कहा। "आज वो दरवाज़ा खुलेगा।"
॥
मैंने कुंजी को मुट्ठी में कस लिया और सीढ़ियों की तरफ़ बढ़ा, पर मेरे पैर तीसरी सीढ़ी पर ही रुक गए।
क्योंकि माँ ने मेरा हाथ पकड़ लिया था।
"वीर," उन्होंने कहा, और उनकी आवाज़ वैसी ही थी जैसे घर में घुसते वक़्त होती है — न गुस्सा, न डर, बस एक हल्की थकान। "अभी नहीं। तू आज सुबह से खड़ा है। पहले पानी पी।"
"माँ—"
"पानी पी," उन्होंने दोहराया, और मेरा हाथ नहीं छोड़ा।
टिंकू ने तुरंत मटका उठाया और प्याला भरकर मेरी तरफ़ बढ़ाया। उसके हाथ में एक डिब्बा भी था जो वो किसी तरह एक ही हाथ में सँभाले था। मैंने पानी गटगट पिया। ठंडा था, और मेरे गले में जाकर वो एक अजीब तरह से राहत बन गया।
माँ ने मेरा मुँह देखा, फिर अपनी साड़ी के कोने से मेरे होंठ पोंछे।
"चंदा का क्या?" मैंने कहा। "वो भी अंदर है। वो भी—"
"वो हमारे साथ आएगी," माँ ने कहा, और उनकी आवाज़ में वो यकीन था जो मुझे हमेशा हैरान करता था। "पहले तू अपने आप को सँभाल। लड़ने के लिए दम चाहिए, और दम बिना खाने के नहीं आता।"
टिंकू ने डिब्बा आगे बढ़ाया।
"माँ की बात सही है, भाई," उसने कहा। "एक लड्डू खा ले। मैंने इसमें इस बार नमक नहीं डाला, मैंने खुद चखा है।"
मैंने उसे घूरकर देखा, और मेरे मुँह से पहली बार उस दिन एक हँसी निकली — छोटी, फटी हुई, पर असली।
"तू हर बार यही कहता है," मैंने कहा।
"हर बार सच होता है," उसने कहा, और अपनी टोपी ठीक की।
मैंने लड्डू मुँह में रखा। घी की गंध और गुड़ की मिठास एक साथ जीभ पर फैल गई, और मुझे महसूस हुआ कि मैं कितना भूखा था। मैंने दूसरा भी लिया।
माँ ने देखा, और उनके चेहरे पर कोई नरमी आई।
"अब बोल," उन्होंने कहा।
मैंने कुंजी उनके सामने रखी।
"हवेली में एक दरवाज़ा है," मैंने कहा। "बीस साल से बंद। ठाकुर हँसा क्यों, यही सोचकर। उसको पता है कि उसके पीछे क्या है, और मुझे नहीं पता।"
माँ ने कुंजी को देखा, पर उन्होंने उसे छुआ नहीं।
"उस दरवाज़े के पीछे," उन्होंने धीरे से कहा, "तेरे पापा का कमरा है।"
मैं सीधा खड़ा हो गया।
"कमरा?"
"वो कमरा जहाँ वो बैठकर हिसाब लिखते थे, जहाँ उनकी किताबें थीं, जहाँ उनका पहलवानी का सामान था।" माँ ने अपने हाथ देखे। "उस रात के बाद उस कमरे को किसी ने नहीं खोला। तेरे चाचा ने चाबी फेंक दी, ऐसा कहकर। पर तूने जो अलमारी में पोटली में कुंजी पाई… वो उसी दरवाज़े की है।"
"तो चाचा ने चाबी फेंकी नहीं थी," मीरा ने कहा। वो मेरे पीछे खड़ी थी, और उसने अपना बैग कंधे पर ठीक किया। "उसने उसे संभालकर रखा था। किसी के लिए।"
"किसके लिए?" टिंकू ने पूछा।
"उसके लिए जो अगला आए," मीरा ने कहा। "ये जाल पुराना है। हर चीज़ एक-दूसरे से जुड़ी है, और हर चीज़ का एक ही इंतज़ार है — कि कोई उसे खोले।"
कालू काका सीढ़ियों के नीचे खड़े थे। उन्होंने अब तक कुछ नहीं कहा था, पर जब मैंने उनकी तरफ़ देखा, तो वो धीरे से बोले, "बेटा, वो दरवाज़ा खुलेगा, तो हवा बदलेगी। और हवा बदलेगी तो बीस साल का सन्नाटा टूटेगा। तैयार रह।"
उनकी आवाज़ में डर नहीं था। कुछ और था। जैसे कोई बूढ़ा आदमी बरसों बाद अपने ही घर की तरफ़ देख रहा हो।
हम चले। अदालत की सीढ़ियाँ उतरकर सड़क पर आए, और मैंने देखा कि सूरज ढल चुका था। दिन ऐसा लंबा लगा था कि मुझे याद ही नहीं था कि सुबह मैंने क्या पहना था।
अदालत के बाहर भीड़ खड़ी थी। वही गाँव वाले, वही चेहरे, जो कल तक मुझे "ईंट ढोने वाला" कहते थे और आज मेरे लिए रास्ता छोड़ रहे थे। सुक्खी बुआ सबसे आगे थीं, पान का बीड़ा मुँह में दबाए, और उनकी आँखें बड़ी थीं।
"अरे वीर!" वो चिल्लाईं। "अरे मैंने तो सुना है कि तूने ठाकुर को अदालत में ही बैठा दिया! अरे मेरी तो—"
"बुआ," मैंने कहा, और रुका। "आप घर जाइए। आज कुछ नहीं सुनना।"
वो एक पल के लिए चुप हुईं। फिर उन्होंने मेरी तरफ़ ऐसे देखा जैसे पहली बार देख रही हों।
"तू बड़ा हो गया, बेटा," उन्होंने कहा। और उनकी आवाज़ में वो मज़ाक नहीं था जो हमेशा होता था।
हम हवेली की तरफ़ बढ़े। रास्ते में मीरा मेरे साथ-साथ चल रही थी, और उसके कदम मेरे कदमों से थोड़े तेज़ थे।
"तू डर रही है?" मैंने पूछा, बिना उसकी तरफ़ देखे।
"हाँ," उसने कहा, बिना रुके। "तू?"
"बहुत," मैंने कहा।
वो हँसी — वो हँसी जो उसके गुस्से से बिलकुल अलग थी। हल्की, छोटी, जैसे किसी ने दूर से घंटी बजाई हो।
वेबसाइट पर अपनी पसंदीदा कहानियाँ मुफ्त पढ़ें और Story FM App पर उन्हीं कहानियों का शानदार Audio Experience लें।
यह कहानी Story FM app पर ऑडियो में भी सुनें — आगे के एपिसोड सबसे पहले वहीं आते हैं।
Audio mein suno