Spirit of a Fighter – Chapter 109
वो उठ खड़ी हुई, काग़ज़ों का गट्ठर सीने से लगाकर। फिर मेरी तरफ़ मुड़ी।
"वीर। मेरे पिता के पास कोई सबूत है। शायद यही काग़ज़। शायद कुछ और। मुझे उनसे पूछना है।"
"अभी नहीं," मैंने कहा। "भैरव ने तुम पर हाथ उठाया है। अगर वो जान गया कि तुम्हारे पास ये काग़ज़ हैं, तो…"
"तो क्या?" उसने मेरी आँखों में देखा। "वो मुझे मार देगा? वो मेरे पिता को बीस साल से मार रहा है। रोज़, एक-एक घूँट में। मेरे पास खोने को कुछ नहीं बचा, वीर।"
उसकी आवाज़ में वो काँपन था जो गुस्से से नहीं, डर से आता है। और मैंने पहली बार देखा कि वो कितनी थकी हुई है। माथे पर सूखा खून, आँखों के नीचे काला, हाथ में कसकर पकड़ा हुआ काग़ज़।
मैं कुछ कहने ही वाला था कि कालू काका ने अचानक हाथ उठाया। "चुप।"
हम सब चुप हो गए। मैंने कान लगाए। दूर से — नहीं, पास से — जूतों की आवाज़। भारी जूते। धीरे-धीरे आते हुए। और साथ में लालटेन की रोशनी की हल्की सी लकीर पानी पर नाच रही थी।
"भैरव," कालू काका ने फुसफुसाया। "वो लौट रहा है। बिरजू को यहीं छोड़ा था, उसे ढूँढने आया है।"
"कहाँ जाएँ?" टिंकू ने पूछा। उसकी आवाज़ फट रही थी।
मैंने चारों तरफ़ देखा। नहर के किनारे झाड़ियाँ, पीछे खुला मैदान, और दाईं तरफ़… अखाड़े की पुरानी दीवार। उसी दीवार के नीचे, जहाँ पिछले हफ़्ते मैंने छेद देखा था, अब एक और चीज़ थी — पत्थर की सीढ़ियाँ जो पानी की तरफ़ जाती थीं और फिर नीचे अंधेरे में गायब हो जाती थीं। कुएँ की पुरानी सीढ़ियाँ। जो भैरव ने तुड़वा दी थीं, पर सब नहीं — ये हिस्सा बचा रह गया था।
"वहाँ," मैंने इशारा किया।
हम भागे। टिंकू ने मीरा का हाथ पकड़ा, कालू काका ने डिब्बा उठाया, और मैं सबसे आगे। सीढ़ियाँ फिसलन भरी थीं — काई लगी थी, पानी टपक रहा था। पर हम उतरे। जैसे ही आख़िरी सीढ़ी पर पहुँचे, ऊपर से लालटेन की रोशनी आई और सीढ़ियों पर फैल गई।
हम दब गए। दीवार से चिपक गए।
और तभी मुझे एहसास हुआ कि मैं किसके साथ सटा बैठा हूँ। मीरा। उसका कंधा मेरी बाँह से लगा था, और उसकी साँस मेरे कान के पास गरम गरम आ रही थी। मैंने सिर ज़रा सा घुमाया। इतनी जगह में वो मेरे बिलकुल पास थी, और अंधेरे में सिर्फ़ उसकी आँखें दिख रही थीं।
ऊपर जूतों की आवाज़ रुकी।
"बिरजू!" भैरव की आवाज़ आई। गुड़ जैसी मीठी, पर उसमें वो खींचाव था जो किसी चीज़ को दबाने की कोशिश में आता है। "बिरजू, कहाँ है तू?"
फिर रुकी। फिर कराहट — बिरजू होश में आ रहा था।
"सर…" बिरजू की आवाज़ आई, टूटी हुई। "सर, वो लड़की… उसने मिर्च… और वो लड़का आ गया…"
"कौन लड़का?" भैरव की आवाज़ में वो मिठास गायब हो गई। सिर्फ़ ठंडक बची।
"वही… वही मिट्टी सूंघने वाला…"
एक पल का सन्नाटा। फिर भैरव हँसा। वो हँसी सीढ़ियों से नीचे उतरकर मेरे सीने में लगी।
"तो वो आ गया," भैरव ने कहा। "अच्छा किया। मैं चाहता ही था कि वो आए।"
मीरा की साँस तेज़ हुई। उसका हाथ मेरी कलाई की तरफ़ बढ़ा — और फिर मैंने महसूस किया। उसकी उँगलियाँ मेरी कलाई पर थीं। ठंडी। काँपती हुई। पर पकड़ मज़बूत थी। जैसे किसी ने अँधेरे में रस्सी पकड़ी हो।
मेरी धड़कन कानों में गूँजने लगी। इतनी ज़ोर से कि मुझे लगा ऊपर तक सुनाई देगी। मैंने अपनी दूसरी हथेली उसके हाथ पर रखी। बस इतना कहना था — मैं हूँ। वो समझ गई, क्योंकि उसकी उँगलियाँ थोड़ी ढीली पड़ीं, पर हाथ नहीं छोड़ा।
ऊपर भैरव फ़ोन पर बात करने लगा। मैंने साँस रोकी।
"हाँ, मैं हूँ।" उसकी आवाज़ बदल गई थी — अब वो व्यापारी था, मालिक था। "सुन, अगले महीने वाला जो पहलवान है — शहर से आ रहा है, चौबीस साल का, नया है। उसे भी वही पानी पिलाना है। पहली खुराक हल्की रखना, दूसरी में तेज़। हिसाब लगा लो।"
मेरी मुट्ठी अपने आप कस गई। नाखून हथेली में धँस गए।
"पैसा?" भैरव हँसा। "पैसा तो तब आएगा जब वो जीतेगा। और जीतेगा तो बड़ा मुकाबला। और बड़े मुकाबले के बाद…" उसने एक पल रुककर कहा, "बाद की बात तो तुम जानते हो। वैसे ही जैसे पिछले ग्यारह के साथ हुआ।"
ग्यारह। मेरे सामने माँ का चेहरा आया। पापा का चेहरा। लुट्टन की आँखें, जो आज मिट्टी में गिरी थीं।
मैं हिला। बस थोड़ा सा। पर मीरा ने महसूस किया। उसने मेरी कलाई पर अपनी उँगलियाँ और कस लीं — इतनी ज़ोर से कि नाखून मेरी त्वचा में लगे। और उस स्पर्श में एक ही बात थी, बिना शब्दों के: रुको। अभी नहीं।
ऊपर भैरव का फ़ोन कटा।
फिर सीढ़ियों की तरफ़ क़दम बढ़े।
मेरी साँस रुक गई। मीरा की भी। कालू काका ने डिब्बा अपने पेट से चिपका लिया, जैसे कोई बच्चा हो। टिंकू ने लाठी उठाई, पर उसका हाथ काँप रहा था।
भैरव की परछाईं सीढ़ियों पर आई। फिर वो रुका। ठीक ऊपर। मैंने उसके जूतों की नोक देखी — चमड़े की, धूल से भरी।
और फिर एक आवाज़ आई। लोहे की। भारी। जैसे कोई ढक्कन उठा रहा हो।
कुएँ का ढक्कन।
वो ऊपर ही था, सीढ़ियों के मुँह पर, और उसने हाथ बढ़ाकर ढक्कन को हिलाया। मैंने ऊपर देखा — आधा चाँद, और उसकी परछाईं जो ढक्कन पर पड़ रही थी।
"अरे, ये ढक्कन तो अब भी ढीला है," भैरव बड़बड़ाया। "मैंने कहा था पत्थर रख दो।"
वो झुका। मैंने उसकी साँस सुनी — भारी, धीमी। वो ढक्कन को और खोलने लगा।
मीरा का हाथ मेरी कलाई पर जम गया। मैंने अपनी आँखें बंद कर लीं। अगर वो नीचे झाँकेगा, तो अंधेरे में भी हमारी सफ़ेद आँखें दिखेंगी। मैंने सोचा — क्या करूँ? कूदूँ? धक्का दूँ? ऊपर जाकर उससे भिड़ूँ?
और तभी — सीढ़ी के ऊपरी हिस्से से एक चूहा फिसला। छोटा, तेज़। वो भैरव के हाथ के पास से गुज़रा, सीढ़ी से टकराया और नीचे पानी में गिरा। 'छप' की आवाज़ हुई।
भैरव चौंका। पीछे हटा।
"बकवास," वो बड़बड़ाया। "चूहे।"
उसने ढक्कन वापस रखा। पत्थर खींचकर ऊपर रखा। और फिर हँसा — एक छोटी, ठंडी हँसी। "ये कुआँ भी अब सिर्फ़ चूहों का है।" उसके जूते पलटे।
मैंने साँस छोड़ी। पूरी साँस, जो कब से रुकी हुई थी। मेरे बगल में मीरा ने भी साँस छोड़ी, और उसकी साँस के साथ एक छोटी सी आवाज़ निकली — जैसे किसी ने रोने को दबा लिया हो। उसका हाथ अभी भी मेरी कलाई पर था, पर अब उसकी पकड़ ढीली थी, और उँगलियाँ काँप रही थीं।
"चले गए," कालू काका ने फुसफुसाया। "पर हमें कुछ देर और रुकना होगा। वो अक्सर लौटकर देखता है।"
हम बैठे रहे। मैंने सीढ़ी की ठंडी सतह को अपनी पीठ से लगाया। मीरा अभी भी मेरे पास थी, और अब जब ख़तरा टला था, तो उसकी गंध मुझे और साफ़ लग रही थी — तुलसी, अदरक, और उसके बालों से आती हुई कुछ मीठी सी गंध, जैसे सूखी घास पर पड़ी धूप। वो गंध जो घर जैसी होती है।
"मेरी कलाई छोड़ दो," उसने धीरे से कहा। "उँगलियाँ सुन्न हो गई हैं।"
मैंने हाथ हटाया। उसने अपनी कलाई मली, फिर मेरी तरफ़ देखा।
"तुम्हारा हाथ काँप रहा है," उसने कहा।
"नहीं है।"
"है। देखो।" उसने मेरी तरफ़ हाथ बढ़ाया — और अपनी उँगली मेरी उँगली पर रख दी। मेरी उँगली काँप रही थी। सच में।
"ठंड है," मैंने कहा।
"झूठ," उसने कहा। पर हल्के से। फिर उसने अपना हाथ नहीं हटाया। हम दोनों वैसे ही बैठे रहे — उसकी उँगली मेरी उँगली पर, और बीच में सिर्फ़ अंधेरा।
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