Spirit of a Fighter108 / 1295

Spirit of a Fighter – Chapter 108

7 min read November 5, 2026

मैं दौड़ रहा था और मेरे पीछे कालू काका की आवाज़ आ रही थी — "वीर! रुक! अंधेरे में मत जा!" — पर मैं नहीं रुका। नहर की तरफ़ जाती पगडंडी पर पैर ठोकर खा रहे थे, काँटे चुभ रहे थे, पर मुझे दर्द नहीं हो रहा था। सिर्फ़ वो चीख सुनाई दे रही थी, बार-बार, जैसे कोई पानी के नीचे से चिल्ला रहा हो।

नहर का मोड़ आया। चाँद आधा था, रोशनी कम। मैंने आँखें फाड़कर देखा — कोई नहीं। सिर्फ़ पानी की काली धार और बबूल का पेड़।

फिर गंध आई। तेज़। धतूरे की, मिट्टी के तेल की, और… खून की। मैंने सिर घुमाया। पेड़ के उस पार, झाड़ियों के बीच, कुछ सफ़ेद दिखा।

मीरा का कुर्ता।

मैं उधर भागा। वो घुटनों के बल बैठी थी, एक हाथ ज़मीन पर टिका था और दूसरे हाथ से वो अपना सिर पकड़े हुए थी। उसके पास एक आदमी पड़ा था, मुँह के बल, बेसुध। दूसरा भाग चुका था — झाड़ियों में टूटी डालियाँ गवाही दे रही थीं।

"मीरा!" मैंने घुटनों के बल बैठकर उसका कंधा पकड़ा। "मीरा, देखो मेरी तरफ़।"

उसने सिर उठाया। माथे पर चोट थी, बालों में सूखा खून। पर आँखें खुली थीं। खुली और गुस्से से भरी।

"मैं ठीक हूँ," उसने कहा। आवाज़ काँप रही थी, पर शब्द साफ़ थे। "ये दो थे। मैंने एक की आँख में मिर्च डाल दी… दूसरे को पत्थर मारा। पर तीसरा…" उसने पीछे देखा। "तीसरा पीछे था। उसने मेरा मुँह दबाया। मैंने चीख मारी। शायद इसीलिए वो भाग गया।"

"तीसरा कौन?"

"नहीं पहचाना। पर उसके हाथ में ये था।" उसने अपनी कलाई उठाई।

मैंने देखा। उसकी सफ़ेद कलाई पर एक गोल निशान था — लाल, उभरा हुआ, अभी बना हुआ। जैसे किसी ने बहुत ज़ोर से पकड़ा हो। और उस निशान के बीच में एक आकृति छपी थी। छोटी सी। मैं झुका और गौर से देखा।

अंगूठी की छाप।

मेरे पेट में एक ठंडी गांठ बन गई। मैंने मीरा की आँखों में देखा। वो समझ गई थी।

"भैरव," उसने धीरे से कहा।

"तुम पक्की हो?"

"ये अंगूठी मैंने सिर्फ़ एक उँगली पर देखी है।" उसने अपने माथे का खून पोंछा। "और उसकी गंध भी। वो पानी वाली कड़वाहट। मैंने उसे आज ही सुबह सूँघा था — अपनी लैब में।"

तभी पीछे से टिंकू और कालू काका आ पहुँचे। टिंकू के हाथ में लाठी थी और चेहरे पर वो डर था जो वो छुपाने की कोशिश कर रहा था। कालू काका सीधे ज़मीन पर पड़े आदमी के पास गए और उसे करवट दिलाई।

"ये तो बिरजू है," कालू काका ने कहा। "भैरव के तबेले का। घोड़ों को पानी पिलाता है।"

"घोड़ों को भी?" मैंने पूछा।

कालू काका ने मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखों में वो बात थी जो अब मुझे पहचानने लगी थी — कुछ कहने से पहले तौलना।

"घोड़ों को भी," उन्होंने कहा। "पर ये पानी नहीं है, वीर।"

टिंकू ने मीरा को उठाया। उसकी कलाई पर वो निशान देखकर उसका मुँह खुला रह गया पर उसने कुछ नहीं कहा। उसने बस अपनी कमीज़ की बाँह फाड़ी और मीरा के माथे पर बाँधने लगा। मीरा ने हाथ से रोका।

"रहने दो, खून रुक गया है।"

"मैडम, ये खून…" टिंकू ने कहना शुरू किया।

"मीरा," मीरा ने कहा। "मैडम मत कहो।"

टिंकू ने मेरी तरफ़ देखा, जैसे पूछ रहा हो — ये कब से? मैंने नज़रें चुरा लीं।

हम सब नहर के किनारे बैठ गए, झाड़ियों की आड़ में। बिरजू को वहीं छोड़ा — वो अभी बेसुध था, और कालू काका ने कहा कि अगर वो उठा तो सीधा भैरव के पास ही जाएगा, इसलिए हमें उसके होश में आने से पहले निकल जाना चाहिए।

"मीरा," मैंने धीरे से कहा, "तुम इस वक़्त यहाँ क्यों थी? इतनी रात को?"

उसने अपनी जेब से एक लिफ़ाफ़ा निकाला। फटा हुआ, कीचड़ में भीगा, पर साबुत।

"मुझे ये शाम को मिला। मेरे कमरे के दरवाज़े के नीचे से सरका था।" उसने लिफ़ाफ़ा खोला। अंदर एक पर्ची थी — मोटे काग़ज़ पर, बड़े अक्षरों में, जल्दी में लिखी हुई। "इसमें लिखा था कि तुम्हारे पिता की बीमारी का सबूत नहर के मोड़ पर पेड़ के नीचे गड़ा है। रात को अकेले आना।"

"और तुम अकेली आ गईं?" मेरी आवाज़ अपने आप ऊँची हो गई। "तुम्हें समझ नहीं आया कि ये जाल है?"

"समझ आया।" उसने मेरी आँखों में देखा। "पर मैं डरकर अपने पिता की बीमारी का सच ऐसे ही छोड़ दूँ, ये मुझसे नहीं होता।" वो एक पल रुकी, फिर बोली, "और मैंने सोचा, अगर ये सचमुच सच है, तो मुझे अकेले आना ही होगा। तुम अपने घर की आग में जल रहे हो। मैं तुम्हें और नहीं…"

वो रुक गई। वाक्य अधूरा छोड़ दिया। मैंने भी नहीं पूछा।

टिंकू ने बीच में बोला, "अब क्या करें? ये बिरजू होश में आया तो सारा गाँव जान जाएगा।"

"उससे पहले," कालू काका ने कहा, "हमें जानना होगा कि भैरव उस पेड़ के नीचे क्या गाड़ने आया था।" उन्होंने गीली मिट्टी का एक हिस्सा दिखाया जो अब भी ताज़ा खुदा हुआ था। "ये खुदाई अभी हुई है। आधे घंटे से ज़्यादा नहीं हुई।"

मैं उठ खड़ा हुआ। "तो खोदते हैं।"

हमने हाथों से मिट्टी खोदी। टिंकू के पास लाठी थी, उससे हमने मिट्टी ढीली की। दो हाथ गहरे जाने पर लाठी किसी चीज़ से टकराई — खोखली आवाज़। मैंने झुककर देखा। लोहे का एक छोटा डिब्बा था, जंग लगा, पर ताला नया — चमकदार।

"ताला नया है," कालू काका ने कहा। "यानी अंदर कुछ ऐसा है जो पुराना नहीं है।"

मैंने डिब्बा उठाया। भारी था। मैंने उसे दोनों हाथों से पकड़कर हिलाया — अंदर कुछ खड़खड़ाया।

"तोड़ें?" टिंकू ने पूछा।

"नहीं।" मैंने डिब्बा सीने से लगाया। "ये सबूत है। तोड़ा तो बात नहीं बनेगी।"

"तो ताला तोड़ें, डिब्बा नहीं," कालू काका ने कहा और अपनी कमर से एक पतली सी चीज़ निकाली — कील जैसी, पर मुड़ी हुई। "मैंने ये उस दिन से रखी है जब से मैंने भैरव को पहली बार अलमारी खोलते देखा था।"

उन्होंने ताले में कील डाली, घुमाई, और एक हल्की 'टक' हुई। ताला खुल गया।

मैंने डिब्बा खोला।

अंदर काग़ज़ों का एक गट्ठर था। छोटे-छोटे पन्ने, तह किए हुए, बार-बार खोले-बंद किए गए। उन पर लिखाई एक जैसी थी — काँपती, तेज़, बिना रुके लिखी हुई। मैंने पहला पन्ना खोला।

"ये तो…" मीरा ने मेरे कंधे के ऊपर से देखा। उसकी आवाज़ बदल गई। "ये मेरे पिता की लिखाई है।"

मैंने पढ़ा। ऊपर तारीख़ थी — कोई बीस साल पहले की। और नीचे:

"आज भैरव ने मुझे तीसरी बार पानी पिलाया। मैंने मना किया तो हँसा और बोला — भैया, ये तो तुम्हारे ही हाथ का बनाया है। मैंने अपने हाथ से ये पानी नहीं बनाया। पर मैंने रघुवीर को बनाते ज़रूर देखा है। और अब मेरे पैर सुन्न हो रहे हैं…"

मेरी आँखें रुक गईं। मैंने अगला पन्ना खोला।

"आज मैंने कालू से पूछा कि रघुवीर कहाँ है। कालू ने मुँह फेर लिया। भैरव कहता है रघुवीर गाँव छोड़कर गया है। झूठ। रघुवीर मुझे छोड़कर नहीं जाएगा। वो मुझे ये पानी बनाना सिखाने वाला था। भैरव ने उससे पहले ही…"

पन्ना वहीं खत्म। आख़िरी शब्द अधूरा। जैसे लिखते-लिखते हाथ काँप गया हो।

मीरा की साँस रुक गई थी। मैंने उसकी तरफ़ देखा। वो काग़ज़ को दोनों हाथों से पकड़े हुए थी, और उसकी उँगलियाँ सफ़ेद पड़ गई थीं।

"मेरे पिता जानते थे," उसने फुसफुसाया। "वो सब जानते थे। और मुझसे कुछ नहीं कहा।"

"वो तुम्हें बचा रहे थे," कालू काका ने धीरे से कहा।

"मुझे बचाने के लिए?" मीरा ने सिर उठाया। उसकी आँखों में पानी था, पर आवाज़ में आग। "बीस साल से वो अपने पैरों में ज़हर लिए बैठे हैं और मुझे सिर्फ़ ये बताया कि वो बीमार हैं? मैं उनकी बेटी हूँ। मुझे हक़ है जानने का।"

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