Spirit of a Fighter – Chapter 1082
मोहन ने उसे देखा और उसके चेहरे पर कुछ पलटा। एक छोटी सी चमक, फिर फीकी पड़ गई।
"ये चाबी किसी ताले की नहीं," वो धीरे बोला। "ये तो…"
"ये ताले की नहीं," मैंने कहा। "ये संदूक की है। वही संदूक जो तू बीस साल से छुपा रहा है।"
मोहन की आँखें फैल गईं। उसकी साँस रुकी। वो कुर्सी पर पीछे को झुका, जैसे किसी ने उसके सीने पर हाथ रख दिया हो।
"तू… तूने वो संदूक देखा है?"
"नहीं," मैंने कहा। "पर मुझे पता है कि वो कहाँ है। और अब मैं जानता हूँ कि उसकी चाबी किसके पास है।"
मोहन का चेहरा बदल गया। उसकी आँखों में पहली बार वो डर आया जो मैं उसमें अब तक नहीं देख पाया था। सच्चा डर। जलने का डर नहीं। खुलने का डर।
"वो संदूक मत खोलना," उसने धीरे कहा। उसकी आवाज़ फटी हुई थी। "वीर, सुन। वो संदूक मत खोलना।"
"क्यों?" मैंने पूछा। "उसमें क्या है?"
मोहन ने होंठ भींचे। उसने एक बार आसमान की तरफ़ देखा, जैसे कोई ताकत माँग रहा हो। फिर उसने मेरी आँखों में देखा।
"उसमें जो है," उसने कहा, "वो तेरे पिता का नहीं। तेरा है।"
मेरे रोंगटे खड़े हो गए।
"मेरा?" मैंने कहा। "मेरा क्या?"
मोहन ने अपना सिर नीचे कर लिया। वो फिर से चुप हो गया। उसकी चुप्पी भरी हुई थी। बीस साल की चुप्पी की तरह।
तभी करण ने पुकारा।
"वीर! गाड़ी तैयार है!"
मैंने मोहन को देखा। उसने सिर नहीं उठाया।
"बाद में बताऊँगा," वो बोला। "पहले गाँव जा। गाँव में जो हो रहा है, वो ज़्यादा ज़रूरी है। और…" वो रुका, "और जब लौटे, तो उस संदूक को साथ लेकर आना।"
मैंने चाबी जेब में रखी।
"क्यों?"
"क्योंकि वो संदूक अकेला नहीं है," मोहन ने धीरे कहा। "उसके नीचे एक और तह है। और उसमें…"
वो रुक गया। उसकी आँखें भर आईं।
"उसमें क्या?" मैंने कहा। मेरी आवाज़ तेज़ हो गई।
मोहन ने मेरी तरफ़ देखा। उसके होंठ हिले, पर आवाज़ नहीं निकली। फिर उसने किसी तरह खुद को संभाला।
"उसमें तेरे पिता का आख़िरी काग़ज़ है," उसने कहा। "जो उन्होंने उस रात लिखा था, जब उन्हें पता चला कि वो मरने वाले हैं। और वो काग़ज़ सिर्फ़ तुझे पढ़ना है। किसी और को नहीं। मेरी कसम, वीर। किसी और को नहीं।"
मैं कुछ देर उसे देखता रहा। उसका चेहरा जला हुआ था, उसकी आँखें थकी हुई थीं, पर उसकी आवाज़ में जो काँप था, वो झूठ नहीं था।
"अगर तू झूठ बोल रहा है," मैंने कहा, "तो अगली बार मैं तुझे इस कुर्सी से बाँधकर नहीं छोड़ूँगा।"
"मुझे पता है," मोहन ने कहा। और उसने आँखें बंद कर लीं।
मैं पलटा और गाड़ी की तरफ़ चला। मीरा मेरे साथ थी। टिंकू पहले से गाड़ी पर बैठा था, और उसका झोला उसके घुटनों पर रखा था।
"टिंकू," मैंने कहा। "तू यहाँ रुक। माँ और गुड़िया के पास।"
टिंकू ने मेरी तरफ़ देखा।
"भाई," उसने कहा, "मैं तेरे साथ चलूँगा। मैं वो नहीं करूँगा जो तू सोच रहा है। मैं लाठी नहीं उठाऊँगा। पर अगर वहाँ कोई घायल हो, तो उसके सिर पर पट्टी बाँधने वाला कोई तो हो।"
मैंने उसे देखा। उसका चेहरा गंभीर था। उसकी टोपी कान पर टेढ़ी थी।
"ठीक है," मैंने कहा। "पर मेरे पीछे रहेगा।"
"पीछे क्यों?" टिंकू ने कहा। "मैं तेरे आगे रहूँगा। मैं तेरी ढाल बनूँगा।"
"तू मेरी ढाल नहीं, मेरा भाई है," मैंने कहा। और मैंने उसका कंधा थपथपाया।
टिंकू की आँखें भर आईं। उसने मुँह फेर लिया और अपनी टोपी ठीक की।
हम गाड़ी पर बैठे। करण ने बैलों को हाँका। गाड़ी चली। भट्ठा पीछे छूटने लगा। मैंने पलटकर देखा। माँ और गुड़िया भट्ठे के फाटक पर खड़ी थीं। माँ ने हाथ उठाया। गुड़िया ने दोनों हाथ उठाए और हिलाए।
मैंने भी हाथ उठाया। और फिर गाड़ी ने मोड़ लिया।
रास्ते में करण ने बताया कि उसने गाँव में अपने चार आदमी पहले ही भेज दिए थे। "चबूतरे के पास दो, और तेरे घर के पास दो," उसने कहा। "पर मुझे डर है, वो काफ़ी नहीं होंगे। ठाकुर के आदमी गाँव में घुस चुके हैं, और उनके पास हथियार हैं।"
"कितने?" मैंने पूछा।
"पता नहीं," करण ने कहा। "दस, बीस… कोई ठीक से नहीं बता रहा। गाँव वाले डरे हुए हैं।"
मीरा मेरे बगल में बैठी थी। उसने मेरी तरफ़ देखा।
"क्या सोच रहे हो?" उसने पूछा।
"मैं सोच रहा हूँ," मैंने कहा, "कि मोहन ने मुझे उस संदूक के बारे में क्यों बताया। जब वो बीस साल से चुप था, तो अब क्यों?"
मीरा ने कुछ देर सोचा।
"क्योंकि अब वो डरा हुआ है," उसने कहा। "और डरा हुआ आदमी सच बोलता है।"
"या फिर वो मुझे किसी और जगह भेजना चाहता है," मैंने कहा। "ताकि मैं गाँव से दूर रहूँ।"
मीरा ने मेरा हाथ पकड़ा।
"वीर," उसने कहा, "तू हर बात में जाल ढूँढता है। कभी-कभी चीज़ें जैसी दिखती हैं, वैसी ही होती हैं।"
"और कभी-कभी नहीं होतीं," मैंने कहा।
वो मुस्कुराई। एक छोटी सी मुस्कान।
"तू थक गया है," उसने कहा। "मेरा कंधा ले। थोड़ा आराम कर। गाँव पहुँचने में अभी देर है।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में वो नरमी थी जो मैंने पहली बार देखी थी, जब वो नहर के किनारे आई थी। मैंने कुछ नहीं कहा। मैंने बस उसका कंधा लिया और आँखें बंद कर लीं।
गाड़ी हिल रही थी। बैलों की घंटियाँ बज रही थीं। मीरा की गंध आ रही थी — तुलसी और अदरक, और उसके बालों से आ रही एक हल्की सी धूप की गंध।
मैंने आँखें खोलीं।
"मीरा," मैंने कहा।
"हूँ?"
"तूने मुझसे कभी नहीं पूछा कि मैं कैसे सूँघ लेता हूँ चीज़ें।"
वो रुकी।
"पूछना चाहिए था?" उसने कहा।
"लोग पूछते हैं," मैंने कहा। "और फिर हँसते हैं। गाँव में मुझे कुत्ता कहते थे।"
मीरा ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में कुछ बदला।
"मैं तुझे कुत्ता नहीं कहूँगी," उसने कहा। "मैं तुझे वो कहूँगी जो तू है। वीर सिंह। जो चीज़ें सूँघ लेता है, जो सच देख लेता है, और जो मिट्टी से लड़कर जीतता है।"
मेरा गला भर आया। मैंने मुँह फेर लिया। पर इस बार, मुँह फेरते हुए मैंने अपना हाथ उसकी तरफ़ बढ़ा दिया। और उसने मेरा हाथ थाम लिया।
हम चुपचाप बैठे रहे। गाड़ी चलती रही।
फिर करण ने गाड़ी रोकी।
"वीर," उसकी आवाज़ में खिंचाव था। "देख।"
मैंने आगे देखा। गाँव की तरफ़ जाने वाला रास्ता। वहाँ, दूर, धूल उड़ रही थी। बहुत धूल। और उस धूल के बीच से आवाज़ें आ रही थीं — चीखें, चिल्लाहट, और किसी चीज़ के टूटने की आवाज़।
"ये क्या है?" मीरा ने कहा।
"गाँव," मैंने कहा। मेरी आवाज़ सपाट थी। "वो गाँव है। और वहाँ कुछ बड़ा हो रहा है।"
मैं गाड़ी से कूद गया।
"वीर!" मीरा ने पुकारा।
"तुम गाड़ी से आओ," मैंने कहा। "मैं दौड़कर जा रहा हूँ।"
और मैं दौड़ा।
धूल मेरे चेहरे पर पड़ रही थी। मेरी आँखें जल रही थीं। पर मैं रुका नहीं।
क्योंकि उस धूल के बीच से एक आवाज़ आ रही थी। एक औरत की आवाज़। सुक्खी बुआ की।
"अरे! अरे! रुक जाओ! ये तुम्हारा गाँव है!"
और फिर एक और आवाज़। एक आदमी की। मोटी, भारी।
"ये गाँव हमारा है। और जो भी इस गाँव में भवानी का नाम लेगा, उसका यही हाल होगा।"
मैंने रास्ते का मोड़ लिया।
और मैं ठिठक गया।
गाँव का चबूतरा। उस पर चार मशालें जल रही थीं। और उनके नीचे, धूल में, पाँच आदमी घुटनों पर बैठे थे। उनके हाथ बँधे थे। उनके चेहरे पर खून था। और उनके सामने एक मोटा आदमी खड़ा था, जिसके हाथ में लोहे की छड़ थी।
वो आदमी पलटा।
मैंने उसे पहचान लिया।
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