Spirit of a Fighter1000 / 1295

Spirit of a Fighter – Chapter 1000

7 min read November 5, 2026

वो उठा और खिड़की की तरफ़ गया। बाहर आँगन में चारपाई पर बैठी तीसरी बहन दिख रही थी — उसकी सफ़ेद चोटी हवा में हिल रही थी।

"पर अब मैं थक गया," ठाकुर ने कहा। "अब तुम सब जान गए। अब तुम मुझे पकड़वा दो। पर पहले गोलू। क्योंकि गोलू को मैंने नहीं उठवाया था — ये नकली ठाकुर का काम है। मेरे साथ कोई खेल रहा है, वीर सिंह। कोई मेरे नाम का इस्तेमाल कर रहा है। और वो कोई भी हो, तुम्हारे और मेरे बीच में खड़ा है।"

मैंने गहरी साँस ली। मेरे हाथ अभी भी काँप रहे थे, पर मेरे पैर जम गए थे।

"गोलू कहाँ है?" मैंने पूछा।

"स्कूल में," ठाकुर ने कहा। "पर उस स्कूल में नहीं जो तुम जानते हो। पुराने स्कूल की इमारत — जहाँ कमला देवी वार्डन थीं। उसके पीछे जो भंडार है, वहाँ। पर वहाँ कोई नहीं जा सकता — बगल में ठाकुर के… मेरे ही आदमी हैं। पर अब वो मेरे नहीं हैं।"

हरनाम ने मेरा हाथ पकड़ लिया। उसकी उँगलियाँ काँप रही थीं।

"तो फिर क्या करेंगे?" उसने पूछा।

टिंकू ने झुककर अपने लड्डू उठाए और उन्हें डिब्बी में वापस रखा। फिर उसने डिब्बी का ढक्कन लगाया और सीधा खड़ा होकर बोला, "मैं जाऊँगा।"

सबने उसकी तरफ़ देखा।

"तू क्या करेगा?" मैंने कहा।

"मैं मिठाई वाला हूँ," टिंकू ने कहा, और उसकी आवाज़ में वो दम था जो मैंने पहले कभी नहीं सुना। "स्कूल के बच्चे मिठाई पसंद करते हैं। मैं अपनी डिब्बी लेकर जाऊँगा। दो आदमी बाहर मिलेंगे तो मैं उनसे कहूँगा — 'ठाकुर साहब ने भेजा है, बच्चों के लिए मिठाई।' और अंदर जाकर देखूँगा कि गोलू कहाँ है।"

"तू मर जाएगा," हरनाम ने कहा।

"मरूँगा तो मिठाई हाथ में रहेगी," टिंकू ने कहा। "कम से कम मेरी मौत का कोई मतलब तो होगा।"

मैंने उसकी तरफ़ देखा। मेरा दिल भर आया। ये वही टिंकू था जो रोज़ सुबह चुपके से खीर लाता था और माँ से झूठ बोलता था कि बिक गई।

"नहीं," मैंने कहा। "तू और मैं दोनों जाएँगे। पर अलग-अलग। तू आगे, मैं पीछे। और मीरा — तुझे ठाकुर के साथ रहना होगा।"

मीरा ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में सवाल था।

"वो हमारे साथ चलेगा," मैंने कहा। "अगर वो भागेगा, तो तू उसे पकड़ लेगी। और अगर वो सच बोल रहा है, तो उसकी जान हमारी ज़िम्मेदारी है।"

ठाकुर ने मेरी तरफ़ देखा और उसकी आँखों में कुछ था जो मैंने पहले नहीं देखा — शायद शुक्रिया।

"तू अपने पापा का बेटा है," उसने कहा।

"मैं अपनी माँ का बेटा हूँ," मैंने कहा। और मेरी आवाज़ फट गई। "और मैं उनसे ये सवाल पूछूँगा। उनकी आँखों में देखकर पूछूँगा।"

डायरी मेरे हाथ में थी और उसका वज़न मेरे पूरे शरीर पर था।

हम बाहर निकले। आँगन में तीसरी बहन अब भी बैठी थी। उसने मेरी तरफ़ देखा और धीरे से बोली, "डायरी मिल गई?"

मैंने सिर हिलाया।

"तो अब तू जान गया," उसने कहा। "अब तू जान गया कि तेरी माँ ने तुझे बचाने के लिए क्या-क्या किया। और अब तू जान गया कि वो बीस साल से चुप क्यों थी।"

"तू क्या जानती है?" मैंने पूछा।

"मैं वो हूँ जिसने तेरी माँ के हाथ में वो शीशी पकड़ाई थी," उसने कहा, और उसकी आवाज़ में कोई शर्म नहीं थी। "मैंने उसे बोला था — 'सरस्वती, अगर तेरा बेटा बचेगा तो तेरा पति मरेगा। और अगर तेरा पति बचेगा तो तेरा बेटा मरेगा।' और उसने बेटा चुना। पर भवानी ने थाली उलट दी।"

मेरे हाथ मुट्ठी में बंधे। "तूने मेरी माँ को ये चुनाव क्यों दिया?"

"क्योंकि ठाकुर ने मुझे बोला था," उसने कहा। "और मैं ठाकुर की बहन हूँ।"

मैं रुक गया। मीरा ने मेरी तरफ़ देखा।

"तू… तू ठाकुर की बहन है?"

"हाँ," वो बोली। "मैं भवानी की पहली बीवी नहीं हूँ। मैं ठाकुर की बहन हूँ — और मैंने ही भवानी को सरस्वती से मिलवाया था। पर भवानी को सरस्वती से प्यार हो गया, और मेरी बात टल गई। उस दिन से मैंने तेरी माँ को नहीं छोड़ा। मैं उसके पीछे-पीछे रही — हल्दी का टीका लगाकर, कपूर की गंध देकर। पर एक बात सच है, वीर सिंह — तेरी माँ ने तुझे कभी नहीं बेचा। उसने सिर्फ़ एक बार झुककर शीशी उठाई थी, और फिर सारी उम्र उस शीशी को अपने सीने में लिए जीती रही।"

मेरी आँखें भर आईं। मैंने पलटकर ठाकुर की तरफ़ देखा और वो अपनी लाठी के सहारे खड़ा था।

"स्कूल चलो," मैंने कहा। "पर पहले माँ।"

"माँ?" ठाकुर ने कहा।

"हाँ। मैं माँ को इस डायरी के बारे में पूछूँगा। पर सिर्फ़ एक सवाल। और फिर मैं तेरे साथ स्कूल चलूँगा।"

हम गाँव की तरफ़ चले। रास्ते में टिंकू ने मेरा हाथ थाम लिया।

"तू ठीक है?" उसने धीरे से पूछा।

"नहीं," मैंने कहा। "पर जब तक माँ से नहीं पूछूँगा, तब तक कुछ नहीं बोलूँगा।"

हमारा घर आया। आँगन में चक्की चल रही थी। माँ बैठी थीं — उनकी पीठ झुकी हुई थी, और उनके हाथ लकड़ी के हत्थे पर थे।

वो मेरी तरफ़ देखकर मुस्कुराईं। "आ गया? खाना रखा है।"

"माँ," मैंने कहा, और मेरी आवाज़ फट गई। "मैंने डायरी पढ़ ली।"

माँ के हाथ रुक गए। चक्की का पहिया धीरे-धीरे घूमता रहा और फिर रुक गया।

उन्होंने अपना सिर उठाया और मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखों में वो शांति थी जो डर के बाद आती है।

"बैठ," उन्होंने कहा, और अपनी चक्की के पास जगह दिखाई। "अब तू बड़ा हो गया है। अब तेरे सवाल का जवाब सुनने का वक़्त है।"

मैं उनके पास बैठ गया। आँगन में हवा चल रही थी और नीम के पत्ते सरसरा रहे थे।

"माँ," मैंने कहा, "क्या तूने उस दिन मेरी थाली में ज़हर डाला था?"

माँ ने मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँख में पानी आया, पर वो रोईं नहीं।

"नहीं," उन्होंने कहा। "मैंने तेरी थाली में नहीं डाला। मैंने अपनी थाली में डाला था। पर भवानी ने थाली बदल दी।"

मैं चुप हो गया। मेरे हाथ मेरे घुटनों पर थे और मैं उन्हें देख रहा था।

"तो डायरी में झूठ है?"

"डायरी में आधा सच है," माँ ने कहा। "भवानी ने लिखा कि मैंने शीशी बनाई। सच है। पर मैंने वो शीशी अपने लिए बनाई थी — उस रात, जब मुझे पता चला कि ठाकुर तुझे उठवाने वाला है। मैंने सोचा — मैं मरूँगी, पर अपने बच्चे को नहीं दूँगी। और भवानी ने वो शीशी देखी और मेरे हाथ से छीन ली। उन्होंने कहा — 'सरस्वती, अगर मरना है तो मैं मरूँगा। तू मेरे बच्चे को पाल।' और फिर उन्होंने मेरी थाली खुद उठा ली।"

माँ का हाथ मेरे सिर पर आया। उनकी उँगलियाँ मेरे बालों में धँस गईं।

"मैंने तुझे कभी नहीं बताया," उन्होंने कहा, "क्योंकि मैं डरती थी कि तू मुझसे नफ़रत करेगा। पर आज तूने पूछ लिया। और सच ये है — मैंने तेरे पापा को नहीं मारा। मैंने सिर्फ़ उन्हें मरने दिया। और ये उससे भी बड़ा गुनाह है।"

मैंने उनका हाथ पकड़ा। उनकी हथेली सख़्त थी, चक्की के हत्थे से बनी हुई, और उनकी उँगलियाँ पतली थीं।

"माँ," मैंने कहा, "तूने मुझे बचाया। और तूने मेरे पापा को नहीं मारा। ठाकुर ने मारा। और ठाकुर अब मेरे साथ है। हम स्कूल जा रहे हैं — गोलू को बचाने।"

माँ ने मेरी तरफ़ देखा, और उनकी आँखों में एक अजीब-सी बात आई।

"तो जा," उन्होंने कहा। "पर एक बात याद रख — ठाकुर पर भरोसा मत करना। वो आज तेरे साथ है, कल तेरे ख़िलाफ़ होगा। वो अपने आप से भी नहीं लड़ सकता।"

मैं उठा। मेरी आँखें सूख गई थीं और मेरे हाथ जम गए थे।

"चलो," मैंने मीरा से कहा। "स्कूल।"

हम निकले। ठाकुर आगे चल रहा था और उसकी लाठी ज़मीन पर टकरा रही थी। टिंकू अपनी डिब्बी लिए पीछे था और हरनाम मेरे बगल में।

रास्ते में मीरा ने धीरे से कहा, "तूने माँ से सिर्फ़ एक सवाल पूछा।"

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