Billionaire Empire System – Chapter 94
लुट्टन ने रवि की तरफ़ देखा। "यार, तूने झूठ बोला।"
रवि ने कोई जवाब नहीं दिया। वो बेंच पर बैठ गया, और उसके हाथ दोनों तरफ़ मेज़ पर टिके हुए काँप रहे थे।
"तूने क्यों नहीं कहा?" लुट्टन ने धीरे से पूछा। "मैं कह ही रहा था।"
"क्योंकि तू कह रहा था," रवि ने कहा, आवाज़ बहुत धीमी। "और मैं नहीं कह सका। उसकी आँखें देखीं? उसे लगा — दस साल बाद उसे हवा मिली है। मैं वो हवा उसी वक़्त छीन नहीं सका।"
लुट्टन चुप हो गया। फिर उसने पान का पत्ता मुँह में रखा और बैठ गया रवि के सामने।
"तो अब क्या?" उसने पूछा।
"पता नहीं।" रवि ने सिर उठाया। "पर अगर ये काग़ज़ झूठे हैं, तो सच कहीं है। और मुझे वो सच उसके सामने रखना है — उसके टूटे हुए सबूत की जगह।"
दोपहर में लुट्टन दुकान छोड़कर अपनी पान की दुकान पर चला गया, पर वो दिन दोनों के लिए अजीब था। रवि चाय बनाता रहा, ग्राहकों से बात करता रहा, पर हर बार जब कोई हँसता, उसे लगता जैसे वो हँसी किसी और की है।
शाम को, जब दुकान बंद करने की तैयारी थी, दुकान के सामने से एक आदमी गुज़रा। काला कुर्ता, हाथ में छोटा थैला, और वो चलते हुए रुककर रवि की तरफ़ देखा। एक पल के लिए।
रवि बर्तन पोंछ रहा था। उसने बर्तन रखा और सीधा उस आदमी को देखने लगा। न कोई डर, न कोई बचाव।
"ओए," रवि ने कहा, आवाज़ ठंडी और धीमी। "इधर आ।"
आदमी रुका। उसका चेहरा पहचानने वाला नहीं था — मुश्ताक़ का आदमी था, पर उसका नाम नहीं जानता था रवि। वो दुकान की तरफ़ नहीं बढ़ा, सिर्फ़ खड़ा रहा।
रवि ने पोंछा मेज़ पर रखा और दुकान के बाहर आ गया। आदमी एक कदम पीछे हटा।
"मत डर," रवि ने कहा। "जा और अपने साहब को बोल — कल मैं खुद आऊँगा। बिना बुलाए। लिख लेना, भूल मत जाना।"
आदमी एक पल रुका, फिर सिर हिलाया, फिर तेज़ कदमों से चला गया।
रवि वापस दुकान में आया। शटर गिराया। फिर पीछे की कोठरी में गया, ओटले पर बैठा, और घड़ी जेब से निकालकर हथेली पर रखी।
पंद्रह मिनट तक वो कुछ नहीं बोला। उसकी उँगली धीरे-धीरे घड़ी के काँच पर फिरती रही।
फिर उसने कहा, "अगर ये सबूत झूठा है, तो सच कहाँ है?"
घड़ी में एक झुरझुरी सी हुई। सुइयाँ थोड़ी घूमीं, और आवाज़ आई — छोटी, शांत।
"सच उसी आदमी के पास है जिसने ये झूठ बनवाया।"
रवि ने आँखें बंद कीं।
"और वो आदमी," घड़ी ने कहा, "कल तुझसे मिलने आ रहा है।"
रवि ने आँखें खोलीं। उसकी जीभ तालू से चिपक रही थी।
"कौन?" उसने पूछा। "बलवंत?"
घड़ी चुप रही। बस उसकी सुई एक बार हिली, और फिर स्थिर हो गई। रवि ने काँपते हाथ से उसे जेब में रखा, और उसी वक़्त बाहर गली में किसी का फ़ोन बजा। किसी ने फ़ोन उठाया, कोई हँसा, दरवाज़ा बंद हुआ।
रवि कोने में पड़े पुराने कैलेंडर की तरफ़ देखने लगा। कल की तारीख़ तक उसने कभी इस तरह नहीं सोचा था — कि एक दिन आएगा जब वो खुद किसी बड़े आदमी के सामने खड़ा होगा, बिना बुलाए, और उस आदमी के हाथ से सच छीनकर लाएगा।
बाहर शटर पर किसी ने हल्की सी थपकी दी। एक। दो। फिर कोई बोला — आवाज़ दबी हुई, पर साफ़ — "रवि भैया… मैं रघु हूँ। दूध वाला। बाहर आओ। जल्दी।"
रवि उठ खड़ा हुआ। रघु इतनी रात तक दुकान पर कभी नहीं आया था। और उसकी आवाज़ हकलाती हुई थी — उस आवाज़ में डर था, बहुत सारा डर।
रवि ने शटर आधा उठाया। बाहर अंधेरे में रघु खड़ा था, फटी चप्पलें, बाल बिखरे, और उसके हाथ में एक काला थैला था।
"भैया," रघु ने हाँफते हुए कहा, "मुझे शमशेर साहब ने भेजा है। कह रहे हैं — सबूत का सच जानना है तो अभी चलो।"
रवि ने थैले की तरफ़ देखा।
"और ये क्या है?"
रघु ने थैला आगे बढ़ाते हुए कहा, "ये वो काग़ज़ हैं जो असली हैं, भैया। बलवंत के पास अब ये नहीं हैं। अब सिर्फ़ ये हैं — और शमशेर साहब कह रहे हैं, ये सिर्फ़ तुम्हें देंगे। पर एक शर्त पर।"
रवि ने थैला नहीं छुआ।
"क्या शर्त?"
रघु ने नीचे देखा, फिर धीरे से बोला, "कह रहे हैं — घड़ी मेरे हवाले कर दो।"
॥
रघु का हाथ थैले पर काँप रहा था, और उसके होंठ खुले रह गए थे, जैसे उसने खुद अपनी बात सुनी हो और डर गया हो।
रवि ने एक पल उस थैले को देखा। फिर धीरे से सिर हिलाया।
"घड़ी नहीं जाएगी, रघु।"
"भैया, सुन तो लो पहले—"
"सुन लिया।" रवि ने शटर थोड़ा और उठाया और बाहर आ गया। रात की हवा में नमी थी, दूर कहीं बादल गरज रहे थे। "जा, शमशेर साहब को बोल — काग़ज़ अगर असली हैं, तो किसी शर्त के बिना आएँगे। और अगर शर्त लगानी है, तो वो काग़ज़ उन्हीं के पास रहें। मुझे झूठा सबूत नहीं चाहिए, रघु। मुझे सच चाहिए।"
रघु ने थैला सीने से लगाया, जैसे वो भी अब उसके लिए बोझ बन गया हो। "पर भैया, अगर साहब नाराज़ हो गए तो—"
"तो क्या?" रवि ने उसकी आँखों में देखा। "मेरी बहन उनके गोदाम में बँधी थी, रघु। फिर भी मैं गया था। और लौटकर आया हूँ। तेरे साहब को इतना तो पता है — जो डरकर झुक जाता है, उसे फिर से झुकाया जा सकता है। तो जा। ये बात पहुँचा दे।"
रघु ने एक बार पीछे देखा, फिर तेज़ कदमों से अंधेरे में ग़ायब हो गया।
रवि देर तक वहीं खड़ा रहा। हवा में पहली बूँद उसकी कलाई पर गिरी। उसने आसमान की तरफ़ देखा और अंदर जाकर शटर गिरा दिया।
सुबह नौ बजे इरा आई। उसके बाल भीगे हुए थे, लैपटॉप बैग कंधे पर टँगा था, और आँखों में वो शांत गुस्सा था जो अब रवि पहचानने लगा था।
वो सीधी चार नंबर मेज़ पर बैठ गई और काग़ज़ों का बंडल मेज़ पर रख दिया। "मैंने रात भर इन्हें पढ़ा है, रवि। तीन बार। हर पन्ने पर मेरे अब्बू की लिखाई है, हिसाब है, नाम हैं, मोहर है। यही वो चीज़ है जिसके लिए अब्बू मरे थे।"
रवि ने चाय का कप उसके सामने रखा। फिर बैठ गया। उसने काग़ज़ों की तरफ़ हाथ बढ़ाया, एक पन्ना उठाया और उसे नाक के पास ले गया।
"इरा, मैं तुझे एक बात कहूँगा। तू गुस्सा हो जाएगी, पर कहूँगा।"
"कहो।"
"ये स्याही नई है।"
इरा का हाथ चाय के कप पर जम गया। "क्या?"
"मैं दुकान पर रोज़ हिसाब लिखता हूँ।" रवि ने पन्ना उसकी तरफ़ सरकाया। "नई स्याही की गंध तेज़ होती है, तेल जैसी। और देख — यहाँ कोने पर ज़रा भी भूरा नहीं पड़ा। दस साल पुराना काग़ज़ ऐसा नहीं दिखता, इरा। दस साल पुराना काग़ज़ पीला पड़ जाता है, कोना मुड़ जाता है, उँगली लगाने से रेत जैसी आवाज़ आती है। ये सिर्फ़ चार-पाँच महीने पुराना है। किसी ने इसे नया लिखवाया है।"
इरा ने पन्ना छीना। उसके हाथ काँप रहे थे।
"तो तुम कहना चाहते हो कि ये सब मैंने…" उसकी आवाज़ टूटी, फिर तेज़ हुई। "तुम्हें क्या लगता है, मैं अपने अब्बू की मौत के साथ खेल रही हूँ? तुम क्या जानते हो मेरे पापा के बारे में? तुम क्या जानते हो, रवि?"
"इरा—"
"नहीं, तुम सुनो!" वो खड़ी हो गई, कुर्सी पीछे खिसक गई, धातु की आवाज़ गली में गई। "तुम तो चाय वाले हो! पूरी ज़िंदगी उबलती केतली के पीछे खड़े रहे हो! तुम्हारे लिए ये काग़ज़ कुछ नहीं हैं — काग़ज़, बस। किसी के हाथ काँपते हैं, किसी की नींद उड़ती है, किसी के पापा रात में फ़ोन पर धमकी सुनते हैं — ये सब तुमने देखा नहीं। तुमने सिर्फ़ चाय बेची है!"
रवि ने कुछ नहीं कहा।
उसके चेहरे पर न कोई झटका था, न गुस्सा। उसने बस एक गहरी साँस ली — धीरे, पूरी — और हाथ मेज़ पर रख दिए।
इरा ने काग़ज़ समेटे। जल्दी-जल्दी, अस्त-व्यस्त। एक पन्ना फ़र्श पर गिरा, उसने झुककर उठाया, और फिर बिना पीछे देखे वो बाहर चली गई।
तभी बाहर बारिश टूट पड़ी।
रवि बैठा रहा। उसने केतली उठाई, कप मेज़ पर रखा, और इरा का छोड़ा हुआ कप देखा — चाय ठंडी हो रही थी, ऊपर एक पतली परत जम रही थी। वो कप उठाकर पीछे की कोठरी में रख आया, जैसे उस चाय का दुकान पर रहना ठीक न हो।
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