Billionaire Empire System – Chapter 82
रवि और इरा पास खिसक आए।
"शमशेर अब अकेला नहीं है।" उन्होंने कहा। "जिस साहब के लिए उसने ये काम किया था, वो आज बलवंत राय है। शमशेर ने उसे ट्रस्ट के पैसे से शहर का सबसे बड़ा बिल्डर बनाया। और बदले में जो मिला… वो तू अब देख रहा है। लेकिन बेटा," उन्होंने उँगली उठाई, "शमशेर की आदत है — वो अपने काम खुद नहीं करता। वो सामने आता है, मीठी बातें करता है, और पीछे मुश्ताक़ को खड़ा रखता है। तेरी बहन का अपहरण, झोपड़ी पर आना — ये सब शमशेर के इशारे पर हुआ। बलवंत तो बस फ़ोन पर हुक्म देता है। असली दिमाग़ शमशेर का है।"
"तो वो क्यों नहीं सामने आता?" इरा ने पूछा। "अगर वो इतना ताक़तवर है…"
क़ासिम भाई ने एक कोना मुँह बनाया, जैसे किसी पुरानी बात को याद कर रहे हों। "क्योंकि वो इंसानों से नहीं लड़ता, बेटी। वो उनके अंदर से लड़ता है। तेरे पापा को उसने दोस्ती से हराया। मुझे डर से हराया। और अब तुझे… वो रवि से हराना चाहता है, बेटे। वो तेरे अंदर के रवि को।"
रवि ने कुछ नहीं कहा।
"एक बात याद रख।" क़ासिम भाई ने उसका कंधा थामा। "शमशेर कभी सीधा हमला नहीं करेगा। जिस दिन वो सीधा हमला करे, समझ लेना — वो डर गया है।"
देर रात वो झोपड़ी से निकले। आसमान पर बादल थे, और श्मशान की तरफ़ से ठंडी हवा आ रही थी। इरा कुछ कदम चली, फिर रुकी और रवि की तरफ़ मुड़ी।
"तू ठीक है?"
रवि ने साँस ली। "नहीं।" उसने साफ़ कहा। "पर शायद यही ठीक होने की शुरुआत है।"
इरा मुस्कुराई। थोड़ी-सी, थकी हुई। "मैं अब घर जाऊँ?"
रवि ने सिर हिलाया। "मैं छोड़ आता हूँ।"
"नहीं।" उसने कहा, और पहली बार उसकी आवाज़ में ज़िद के साथ कुछ नरमी थी। "तू घर जा। माँ और पिंकी अकेली हैं। मैं सुबह आ जाऊँगी।" वो मुड़ी, दो कदम चली, फिर पलटी। "रवि।"
"हाँ?"
"आज तूने क़ासिम भाई को जो कहा — वो सही कहा।" उसकी आवाज़ धीमी थी। "और मैं… मैं ये देख रही थी। तू कैसे झुकता है, कैसे बोलता है। तू अपने पापा जैसा है।"
और वो चली गई। रवि कुछ देर वहीं खड़ा रहा, श्मशान की हवा में, और उसे लगा उसके सीने में कोई गर्म चीज़ पसर रही है।
घर पहुँचा तो दरवाज़ा बंद था। उसने चाबी निकाली, अंदर आया। माँ की खाँसी नहीं आ रही थी — दो दिन से नहीं आई थी। ये छोटी बात थी, पर रवि के दिल में जगह बना गई।
वो पीछे की कोठरी में गया, घड़ी मेज़ पर रखी, और बिस्तर पर बैठकर फ़ोन देखा।
एक मैसेज था। अनजान नंबर। अक्षर छोटे, साफ़, ठंडे।
"घड़ी अच्छे से छिपा। अब वो खेल शुरू हुआ है जिसमें सिर्फ़ एक जीतेगा। पापा का दोस्त बनकर आया था, अब बेटे से मिलने आएगा।"
रवि ने मैसेज पढ़ा। दो बार। तीन बार। उसकी उँगलियाँ फ़ोन पर जम गईं। उसने पलटकर घड़ी देखी — सुइयाँ स्थिर।
और ठीक उसी पल, घड़ी से एक आवाज़ आई, इतनी धीमी कि रवि को लगा वो सपना देख रहा है।
"रवि।" घड़ी ने कहा। "अब तू अकेला नहीं लड़ेगा।"
रवि ने घड़ी उठाई। उसके हाथ काँप रहे थे, पर पहली बार वो काँपना डर से नहीं था।
रवि ने मैसेज वाला नंबर खोला — और उसने देखा, उसी नंबर से पहले भी एक मैसेज आया था। महीना भर पुराना। तारीख़ वो दिन थी जब उसे पहली बार बलवंत ने गली में रोका था।
उस मैसेज में सिर्फ़ एक लाइन थी — "चाय ठंडी न हो जाए, बेटा।"
रवि ने फ़ोन नीचे रख दिया और उसका चेहरा ठंडा हो गया। शमशेर महीने भर से उसके पीछे था। हर कदम पर। हर उस जगह पर, जहाँ रवि ने सोचा था कि वो अकेला है।
वो खिड़की के पास गया और बाहर देखा। गली सूनी थी। पर नीचे, बिजली के खंभे के पास, एक सफ़ेद गाड़ी खड़ी थी। इंजन बंद। लाइट बंद।
रवि ने गाड़ी को देखा। सफ़ेद रंग। बारिश में भीगा हुआ, धुँधला। शीशे पर कुछ लिखा था — नहीं, लिखा नहीं, बस कोहरा जमा था। गाड़ी के अंदर कोई नहीं दिख रहा था। पर इंजन बंद होने का मतलब सिर्फ़ एक था — कोई अंदर बैठा है, इंतज़ार कर रहा है।
रवि की उँगलियाँ खिड़की की सलाखों पर कस गईं। उसने वो नंबर दोबारा खोला। "चाय ठंडी न हो जाए, बेटा।" उस दिन बलवंत ने गली में रोका था, परची हिलाई थी, माँ का नाम लिया था। और उसी शाम शमशेर ने उसे मैसेज भेजा था — जैसे वो वहीं खड़ा हो, सब देख रहा हो।
उसने पीछे मुड़कर देखा। माँ की कोठरी का दरवाज़ा बंद था। पिंकी सो रही थी। रवि ने अपना जूता पहना, दबे पाँव सीढ़ियों से नीचे उतरा, और गली के कोने से निकलकर खंभे के पीछे आ गया।
गाड़ी का शीशा धीरे से नीचे उतरा।
अंदर एक बूढ़ा आदमी बैठा था। बाल सफ़ेद, पर कपड़े — महँगे। हाथ में एक छड़ी, जिसका सिरा चाँदी का था। उसने रवि को देखा और हल्की-सी मुस्कान बिखेर दी, जैसे कोई पुराना रिश्तेदार मिलने आया हो।
"रवि।" उसकी आवाज़ गर्म थी, मीठी, जैसे गुड़ की चाय। "तू बड़ा हो गया। बिलकुल बलवंत जैसा।" उसने छड़ी से इशारा किया। "अंदर आ जा। बाहर बारिश है।"
रवि ने एक कदम भी नहीं बढ़ाया। "आप शमशेर हैं।"
बूढ़े ने छड़ी को घुमाया, जैसे कोई बच्चा खिलौना घुमाता है। "शमशेर।" उसने कहा, जैसे नाम ही नया हो। "तेरे पापा ने भी पहली बार मुझे ऐसे ही पुकारा था। पूरा नाम लेकर। डर के मारे।" उसने सिर हिलाया। "और फिर मैंने उन्हें चाय पिलाई, और वो मेरे हो गए।"
रवि का हाथ जेब में गया। ठंडी धातु वहीं थी। "क़ासिम भाई ने कहा था — तुम सीधा हमला नहीं करते।"
शमशेर हँसा। हँसी खोखली थी, जैसे किसी खाली बर्तन में पत्थर गिरा हो। "क़ासिम।" उसने कहा, और उसकी आवाज़ में पहली बार कुछ कड़वाहट आई। "वो मेरे अपने घर का है। मेरी बहन का सुहाग। और आज वो तेरे साथ बैठकर मेरी बातें करता है।" उसने छड़ी से गली की तरफ़ इशारा किया। "ये गली। ये झोपड़ी। तेरे पापा। सब मेरा है, रवि। तू बस ये भूल गया है।"
रवि ने गाड़ी के शीशे पर हाथ रखा। ठंडा शीशा। उसने धीरे से कहा, "मेरे पापा का चश्मा। वो वीडियो। ज़मीन पर पड़ा था।"
शमशेर की मुस्कान एक पल के लिए टूटी। फिर वापस आ गई। "चश्मा।" उसने कहा, जैसे कोई पुरानी बात याद कर रहा हो। "तेरे पापा बहुत ईमानदार थे। हद से ज़्यादा। उस दिन उन्होंने काग़ज़ात माँगे थे। मैंने कहा, भाई, ये तेरा ही घर है। किस हिसाब की किताब?" उसने कंधे उचकाए। "उन्होंने नहीं माना। बलवंत ने फ़ोन किया। और फिर…" उसने छड़ी से हवा में एक लकीर खींची, जैसे किसी चीज़ को मिटा रहा हो। "बाकी तू जानता है। या शायद नहीं जानता।"
रवि का गला सूख गया। "तुमने मेरे पापा को…"
"मैंने कुछ नहीं किया।" शमशेर ने काट दिया। "मैंने बस चाय पिलाई थी। हाथ बलवंत के थे।" उसने रवि की तरफ़ झुककर देखा, और उसकी आँखों में एक अजीब सी भूख थी। "पर आज मैं खुद आया हूँ। जानता है क्यों?" वो रुका। "क्योंकि तेरे पास वो घड़ी है। और वो घड़ी… मेरी है।"
रवि ने पीछे कदम रखा। बारिश की एक बूँद उसकी गर्दन पर गिरी और बह गई। "घड़ी तुम्हारी नहीं है।"
शमशेर ने छड़ी को खिड़की से बाहर निकाला और उसका सिरा रवि की छाती पर रख दिया। हल्का-सा। "अभी नहीं।" उसने कहा। "पर जिस दिन तू ये घड़ी अपनी मर्ज़ी से इस्तेमाल करेगा, उस दिन तू मेरा हो जाएगा। तेरे पापा की तरह।" उसने छड़ी वापस खींची और शीशा ऊपर चढ़ाने लगा। "चाय की पेशकश अभी भी है, बेटा। सोच ले।"
वेबसाइट पर अपनी पसंदीदा कहानियाँ मुफ्त पढ़ें और Story FM App पर उन्हीं कहानियों का शानदार Audio Experience लें।
यह कहानी Story FM app पर ऑडियो में भी सुनें — आगे के एपिसोड सबसे पहले वहीं आते हैं।
Audio mein suno