Billionaire Empire System61 / 834

Billionaire Empire System – Chapter 61

7 min read November 7, 2026

रात गहरी हुई। इरा चली गई — उसकी ख़ाला के घर जाना था, और वो कल सुबह पाँच बजे आने का वादा करके गई। पिंकी अपनी किताबों में मुँह घुसाकर सो गई, पन्नों के बीच उसका चेहरा। माँ दीये के सामने बैठकर पापा की तस्वीर को देख रही थीं, होंठ हिल रहे थे।

रवि खाट पर लेटा। बुख़ार अब भी था पर हड्डियों में नहीं, बस त्वचा पर। उसने घड़ी जेब से निकाली। काँच के पीछे की सुइयाँ हिल रही थीं — धीरे-धीरे, जैसे कोई सोते हुए में बड़बड़ा रहा हो।

"घड़ी।" उसने फुसफुसाया। "रामदीन वो नाम है जो क़ासिम भाई की बही में था। सही है ना?"

घड़ी से एक छोटी आवाज़ आई। एक शब्द। "हिम्मत।"

रवि हँसा। "बस इतना?"

घड़ी चुप रही।

वो करवट लेने ही वाला था कि फ़ोन जगा। स्क्रीन जली, चमकी, और एक अनजान नंबर से फ़ोटो आई। रवि उठकर बैठ गया। फ़ोटो धुँधली थी, रात में खींची गई। एक बूढ़ा आदमी — सफ़ेद धोती, छड़ी, खाली आँखें, हाथ हवा में उँगली घुमाते हुए। वो किसी मंदिर की सीढ़ी पर बैठा था, और पीछे एक दीवार पर चूने से उभरा हुआ कोई चिह्न।

फ़ोटो के नीचे दो लाइनें थीं।

"इसे ढूँढ रहा है? जल्दी कर। इसे भी सुलझाने वाले हैं।"

रवि की उँगलियाँ स्क्रीन पर जम गईं। उसने फ़ोटो को बड़ा किया। बूढ़े के पीछे की दीवार पर वो चिह्न — एक आधा टूटा हुआ घेरा, और उसके अंदर एक बिंदु। यही चिह्न उसने कहीं देखा था। कहाँ? उसने सोचा — बही के पन्नों पर, क़ासिम भाई की अलमारी की तस्वीर में, उस आदमी के कोट पर जिसका चेहरा ढका हुआ था।

तभी घड़ी बोली। इस बार आवाज़ तेज़ थी, झटके वाली, जैसे किसी की साँस अटक गई हो।

"वो नंबर।"

रवि ने पूछा, "किसका?"

घड़ी ने एक पल रुककर कहा, "उसी का, जो तेरे पापा के साथ उस तस्वीर में खड़ा था।"

रवि का बुख़ार उस पल उतर गया। बदले में कुछ और चढ़ा — ठंडा, कड़वा, जो हड्डियों से नहीं, दिल से निकलता है। उसने माँ की तरफ़ देखा। वो अब भी दीये के सामने थीं, हाथ जुड़े हुए, आँखें बंद। तस्वीर के आगे की लौ काँप रही थी।

रवि ने फ़ोन उठाया और उस अनजान नंबर पर उँगली रखी। छूने ही वाला था कि स्क्रीन फिर जली — उसी नंबर से दूसरा मैसेज।

"कल सुबह छह बजे। पुराने मंदिर के पीछे। अकेले आना। बही मत लाना। और हाँ — जो घड़ी जेब में है, उसे घर पर ही छोड़ना। वरना वो बूढ़ा तुझसे पहले मर जाएगा।"

रवि ने फ़ोन नीचे रख दिया। उसने घड़ी को हथेली में लिया और देर तक देखता रहा। फिर उसने घड़ी को तकिये के नीचे रखा — धीरे से, जैसे कोई बीमार बच्चे को सुला रहा हो।

"माफ़ करना।" उसने फुसफुसाया। "एक दिन के लिए।"

घड़ी की सुइयाँ रुक गईं। फिर एक आवाज़ आई, इतनी धीमी कि रवि लगभग सुन ही नहीं पाया, पर शब्द साफ़ थे —

"जाओ। मैं तेरे साथ हूँ। बस… जल्दी लौटना।"

रवि ने आँखें बंद कर लीं। स्क्रीन अब भी उसके सामने जल रही थी, और उस पर वो बूढ़ा आदमी छड़ी टेकते हुए, किसी की तरफ़ बढ़ता हुआ — जैसे अंधेरे में भी किसी को देख रहा हो, और वो कोई रवि ही था।

॥

"अभी सो जा, बेटा। सुबह जल्दी उठना है।"

माँ की आवाज़ दीये की लौ के साथ काँपी। रवि ने आँखें बंद कर लीं, पर नींद कहाँ थी। फ़ोन उसके सीने पर रखा था, स्क्रीन बंद, पर वो फ़ोटो आँखों के अंदर जल रही थी — सफ़ेद धोती, छड़ी, खाली आँखें, और पीछे की दीवार पर वो आधा टूटा घेरा, अंदर एक बिंदु।

रात भर बुख़ार ने उसे छोड़ा नहीं। कभी वो चारपाई गरम लगती, कभी ठंडी। कभी लगता कि कोई दरवाज़े पर खड़ा है, कभी कि घड़ी तकिये के नीचे से बोल रही है। पर घड़ी चुप थी। जान-बूझकर चुप, जैसे कोई बच्चा रूठकर मुँह फेर लेता है।

अँधेरे में एक बार उसने हाथ बढ़ाकर घड़ी को छुआ। ठंडी धातु। सुइयाँ नहीं हिल रही थीं। उसने कहा, "नाराज़ हो?" कोई जवाब नहीं आया। उसने हाथ खींच लिया। छत की मोटी कड़ी देखने लगा, जिस पर पुरानी बारिश की लकीरें थीं।

पाँच बजे दरवाज़े पर धीरे से खटका हुआ।

रवि उठ बैठा। लुट्टन? नहीं। इरा थी — पुरानी क़मीज़, बाल गीले, कंधे पर वही लैपटॉप बैग, हाथ में एक छोटा टिफ़िन।

"तूने सोया नहीं?" उसने अंदर आते हुए कहा।

"तूने भी नहीं।"

"मैंने सोचा, तू बीमार है, तो कुछ गरम…" उसने टिफ़िन बढ़ाया। "माँ ने बनाया। खिचड़ी। कह रही थीं, बुख़ार में यही ठीक रहता है।"

रवि ने टिफ़िन पकड़ा। हाथ अब भी काँप रहा था, पर पहले से कम। "थैंक्यू।"

"चाय?" इरा ने पूछा।

"मैं बनाता हूँ।"

"बैठ।" उसने उसे चारपाई पर धकेल दिया और केतली की तरफ़ बढ़ गई। "आज एक दिन तेरी दुकान का सारा काम मैं करूँगी। तू बस बता, चीनी कहाँ रखी है।"

रवि हँसा। बुख़ार में हँसी अजीब लगती है — जैसे गले से फटती हुई निकलती हो। "डिब्बे के पीछे, पीली शीशी के बगल में।"

इरा ने केतली चढ़ाई। चूल्हे की आवाज़, पानी की खदबद, और सुबह की पहली चिड़िया — इन तीन आवाज़ों में कमरा भर गया। रवि ने उसे देखा। वो अपनी आस्तीन चढ़ा रही थी, और उसके कलाई पर चूड़ी जैसी एक पतली सफ़ेद लकीर थी।

"वो क्या है?" रवि ने पूछा।

"क्या?"

"कलाई पर।"

इरा ने हाथ देखा और जल्दी से आस्तीन नीचे कर ली। "कुछ नहीं। बचपन में गिर गई थी। बचपन की बात है।"

कुछ देर चुप्पी रही। फिर रवि ने कहा, "मैं आज रामदीन को ढूँढने जा रहा हूँ। तू मत चल। उस मैसेज में साफ़ लिखा था — अकेले आना।"

इरा ने केतली की तरफ़ देखा। "तो जा। मैं नहीं रोकूँगी।" उसने चाय के पत्ते डालते हुए कहा, "बस एक बात — मैं मंदिर के बाहर रहूँगी। अंदर तू जाएगा। अगर तू पंद्रह मिनट में बाहर नहीं आया, तो मैं अंदर आ जाऊँगी। चाहे वहाँ जो हो।"

रवि ने कुछ कहना चाहा, पर इरा ने केतली से चाय कप में डाल दी और आगे बढ़ा दी। "पी। और बहस मत कर। मैंने रात भर सोचा है।"

चाय गरम थी। दालचीनी का पानी अब भी केतली में लगा हुआ था, और उसकी गंध ने उस पुरानी रात को मन में जगा दिया — पापा की आख़िरी रात। रवि ने जल्दी-जल्दी घूँट भरे।

माँ उठ चुकी थीं। वो दरवाज़े पर खड़ी होकर देख रही थीं। इरा को दुकान पर काम करते देखकर उनके चेहरे पर कुछ फैला — लाज? खुशी? ऐसा कुछ, जिसे उन्होंने जल्दी से मुँह फेरकर छिपा दिया।

"माँ, आज मैं जल्दी लौटूँगा, पर…" रवि ने कहा।

"जा।" सीता देवी ने कहा। "मैं तो कह रही थी कल रात से — जो काम दिल से निकले, उसे टालने से बात और बिगड़ती है।" उन्होंने रवि की तरफ़ देखा। "पर सुन — जाने से पहले गमछा सिर पर बाँध लेना। बुख़ार हवा में और न चढ़े।"

इरा ने चाय का कप नीचे रखा और बहुत सहजता से कहा, "मैं बाँध दूँगी, आंटी।"

माँ ने उसे देखा। पहली बार देखा, ऐसे जैसे कोई चीज़ तराज़ू पर रख रही हों। फिर वो हल्की होकर बोलीं, "अच्छा। ठीक है। पर बंधवाने से पहले खिचड़ी खा।"

दुकान का शटर खुला हुआ था — रघुवीर ने ताला खुलवा दिया था, पर मोहर वाला काग़ज़ अभी भी चिपका था। सड़क पर आधी गली आँख मल रही थी, आधी अपनी दुकानों के ताले खोल रही थी। लुट्टन पान की दुकान पर झाड़ू लगा रहा था, होंठों पर पान।

"अरे, बीमार आदमी बाहर निकल आया!" उसने झाड़ू रोककर कहा। "मैंने कहा था ना, खिचड़ी खा।"

"तूने कब कहा?"

"सोचा था। मन में। चल, तू बता — कहाँ जा रहे हो?"

रवि ने इरा की तरफ़ देखा। इरा ने सिर हिलाया — "बता दे। वैसे भी ये जानता ही होगा।"

"पुराने मंदिर के पीछे। एक बूढ़ा रहता है… पंडित रामदीन।"

लुट्टन के हाथ की झाड़ू रुक गई। पान चबाना भी।

"रामदीन?" उसने धीरे से दोहराया। "वो अंधा बूढ़ा जिसके बारे में कहते हैं कि पिछले दस साल से किसी से बोला नहीं?"

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