Billionaire Empire System – Chapter 5
रवि ने घड़ी दोनों हाथों में पकड़ी और आसमान की तरफ़ देखा। आँखें भर आईं, पर इस बार आँसू नहीं थे — कुछ और था। ज़िद।
"पापा," उसने धीरे से कहा, "आपने जो बोया था, वो मैं उगाऊँगा। जो सच आपने छिपाया, वो मैं पूरी दुनिया के सामने रखूँगा।" उसकी आवाज़ सीने से निकली, धीमी पर लोहे जैसी। "और जिसने आपको छीना, उससे एक-एक करके हिसाब लूँगा। चाहे सारा शहर मेरे ख़िलाफ़ हो जाए।"
तभी पीछे मुन्ना भाई की आवाज़ आई, अचानक साफ़ और बिना गुनगुनाहट के — "ये घड़ी तेरे पापा की नहीं थी, रवि। ये उन्हें दी गई थी।" और फिर वो फिर गुनगुनाने लगे, जैसे कुछ कहा ही न हो।
रवि पलटा। मुन्ना भाई प्याली खत्म करके चबूतरे पर लेट चुके थे, आँखें बंद।
वही सवाल सिर में घूम गया — किसने दी थी? और क्यों?
दुकान के अंदर जाने ही वाला था कि बाहर गली में किसी की परछाई रुक गई।
रवि ने सिर उठाया। धूप में एक आदमी खड़ा था — छोटा, मोटा, चमकीली पीली क़मीज़ जिसके बटन खिंचे हुए थे, कलाई में मोटी सोने जैसी घड़ी, और हाथ में जला हुआ सिगरेट। उसके पीछे दो दुबले लड़के खड़े थे, आँखें रवि की दुकान पर घूम रही थीं।
रवि ने उसे पहचान लिया। पूरे इलाक़े में कोई उसे भूल नहीं सकता था। टीवी नरेंद्र।
वो चमकीली, मोटी आवाज़ में गली में गूँजा — "ओ चाय वाले! नज़राने का टाइम हो गया, बेटा।"
उसने सिगरेट ज़मीन पर पटका और रवि की तरफ़ बढ़ा। "पिछले तीन महीने का हिसाब सुन ले। हर दुकान का महीना का दो हज़ार। तेरी दुकान का चार हज़ार, क्योंकि मालिक ने तुझ पर मेहरबानी की है।" उसने जेब से मैली सी परची निकाली। "तीन महीने का बारह हज़ार। आज शाम तक।"
रवि का हाथ जेब में पड़ी घड़ी पर चला गया। तभी कान के अंदर वो आवाज़ फुसफुसाई, बहुत धीमे — "यही है सच बोलने का पहला मौक़ा। पर ध्यान से — टीवी पीछे हटेगा नहीं, वो तेरे पापा के नाम का ज़िक्र करेगा। तैयार रह।"
रवि ने गहरी साँस ली। सामने टीवी नरेंद्र खड़ा था, परची हिला रहा था, और उसकी आँखों में ये भरोसा था कि ये चाय वाला आज भी सिर झुका देगा।
॥
टीवी नरेंद्र ने परची हिलाई और मुँह फेरकर अपने पीछे खड़े दो लड़कों की तरफ़ देखा, जैसे कह रहा हो — देखो, कैसे सिर झुकता है। फिर वो गली में चारों तरफ़ नज़र घुमाकर बोला, "ये गली… ये दुकान… ये ईंट-पत्थर, सब बलवंत सर की ज़मीन पर है। किसी ने तुझे बताया नहीं?"
रवि ने दुकान के पीले साइनबोर्ड को देखा। सुबह की धूप उस पर पड़ रही थी। उसने धीरे से कहा, "इस महीने माँ की दवाई… इंसुलिन के पैसे चले गए। थोड़ा वक़्त दीजिए, सर।"
टीवी हँसा। हँसी मोटी थी, जैसे कोई मोटी रस्सी खींच रहा हो। "माँ-वाँ सब बहाने हैं, बेटा। साहब का पैसा किसी के माँ-बाप का होता है क्या? नहीं। साहब का पैसा साहब का होता है, चाहे बरसात हो या अकाल।" उसने परची रवि के सीने पर रख दी। "पाँच सौ महीना। मैंने तो पहले बारह हज़ार बोला था, पर तेरी दुकान देखकर दिल पसीज गया।" और फिर उसने उँगली गले पर फेरकर काटने का इशारा किया। "या फिर… समझ गया ना?"
पीछे दो लड़के खिलखिला पड़े। एक ने कहा, "सर, इसे देखो, हाथ काँप रहे हैं!"
गली में लोग जमा होने लगे। शकुंतला सिर पर लाल दुपट्टा लिए, गीले हाथ पोंछती हुई दुकान के सहारे खड़ी हो गई। बगल से लुट्टन भी आ गया, मुँह में पान, होंठ लाल। किसी ने धीरे से कहा, "अरे, ये फिर आ गया।" किसी और ने फुसफुसाया, "बेचारा रवि… माँ बीमार, ऊपर से ये।"
टीवी ने भीड़ की तरफ़ देखा और आवाज़ और ऊँची कर दी, "देखो, ये मुझे सर बोलता है!" वो अपनी जेब से रुमाल निकालकर माथा पोंछने लगा, जैसे बहुत मेहनत कर ली हो। "इस उम्र में सर! हम तो खुद किसी के बेटे हैं।"
रवि चुप रहा। उसने घड़ी पर हाथ रखा। जेब में, कपड़े के नीचे, वो ठंडी धातु थी। कान में कोई आवाज़ नहीं आई। सिर्फ़ सन्नाटा।
तभी पीछे चबूतरे पर बैठे मुन्ना भाई ने गुनगुनाना शुरू किया। कोई पुरानी लय थी, जिसके बोल समझ नहीं आते थे। टीवी ने चिढ़कर उनकी तरफ़ देखा, "ये पागल यहाँ से नहीं जाता? सर, इस भिखारी को भी बता दो, साहब की ज़मीन पर बैठने का भी हिसाब होता है!"
रवि ने सुना और उसका जबड़ा कस गया। उसने गहरी साँस ली। धीरे से बोला, "तीन दिन दीजिए, सर। प्लीज। पूरा पैसा नहीं, तो आधा।"
टीवी ने परची झटकी। "आधा?" वो रवि के कंधे पर हाथ रखने के लिए आगे बढ़ा। रवि पीछे हट गया, इतनी ज़ोर से कि उसकी एड़ी लोहे के टेबल से टकरा गई। टक! धातु की आवाज़ गली में गूँजी।
भीड़ में कोई हँसा। शकुंतला ने कहा, "अरे, इतना डरता क्यों है? अभी तो कुछ किया भी नहीं।"
रवि कुछ नहीं बोला। वो दुकान के अंदर चला गया। भीड़ को लगा कि वो पैसा लाने गया है या माफ़ी माँगने। टीवी ने पीछे देखकर अपने लड़कों से कहा, "देखा? डर गया। सब ऐसे ही डरते हैं।"
पर रवि पैसे नहीं लाया। वो अंदर गया, एक साफ़ प्याली उठाई, उसमें गरम चाय डाली, ऊपर से चीनी डाली और ब्रेड का एक मोटा टुकड़ा उसमें डुबोया। फिर वो बाहर आया — सीधे भीड़ के बीच से निकला, टीवी के सामने से गुज़रा, और चबूतरे पर जाकर मुन्ना भाई के आगे बैठ गया।
"ले," उसने प्याली उनके हाथ में रखी। "खा।"
मुन्ना भाई ने प्याली थामी। उनके हाथ काँप रहे थे। उन्होंने चाय को सूँघा, फिर ब्रेड का टुकड़ा उठाया और मुँह में रखा। उनकी आँखों से पानी निकल आया। वो बोले, "पहले कोई मुझे इंसान समझकर चाय देता था। वो भी गया। आज तूने दी।"
रवि का गला भर आया। उसने मुँह फेर लिया।
और ठीक उसी पल उसके कान के अंदर वो आवाज़ आई — "मिशन पूरा। इनाम: दो सौ पॉइंट।"
रवि चौंककर चारों तरफ़ देखने लगा। भीड़ तो थी, पर कोई उसकी तरफ़ ऐसे नहीं देख रहा था। उसकी नज़र जेब में पड़ी घड़ी पर गई — काँच के पीछे कुछ चमका। दो सौ। जुड़ गया।
भीड़ में खुसफुसाहट फैली। शकुंतला ने कहा, "अरे रे, लड़का पागल हो गया है। पैसे की जगह भिखारी को चाय पिला रहा है।"
टीवी नरेंद्र का चेहरा बदल गया। उसे ये नाटक अच्छा नहीं लगा। उसने तीन कदम बढ़ाकर रवि का हाथ पकड़ लिया। पकड़ मज़बूत थी, और रवि की उँगलियाँ उसकी मुट्ठी में दब गईं।
"सुन, चाय वाले," टीवी की आवाज़ अब धीमी थी, चमक गई थी। "कल शाम तक पैसा नहीं आया, तो ये दुकान साहब के आदमी उठा ले जाएँगे। टेबल, बेंच, केतली — पत्थर तक नहीं बचेगा। समझा?" उसने रवि का हाथ छोड़ दिया और क़मीज़ ठीक की। "मैं तो अपना काम कर रहा हूँ, बेटा। तू सोच-समझकर जवाब दे।"
वो पलटा। दो लड़के भी पलटे।
रवि ने राहत की साँस ली। पर टीवी दो कदम चलकर रुका। वो धीरे से मुड़ा, और उसकी आवाज़ में वो सब था जो पहले नहीं था — एक छिपी हुई जल्दी।
"हाँ, एक बात और।" उसने चारों तरफ़ देखा, जैसे कोई सुन न रहा हो। फिर रवि के कान के पास झुककर बोला, "साहब ने तेरे पापा की पुरानी घड़ी के बारे में पूछा था। कहीं दिखे तो बता देना।" उसने रवि के चेहरे पर नज़र गड़ाई। "बता देगा ना?"
रवि का पूरा शरीर ठंडा पड़ गया। उसने अपना चेहरा सख़्त किया और सिर हिलाया। "घड़ी… कौन सी घड़ी?"
टीवी हँसा। "वही जो तेरे पापा हर वक़्त देखते थे।" वो पलटा और चल दिया, और उसकी चमकीली क़मीज़ धूप में दूर तक चमकती रही।
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