Billionaire Empire System – Chapter 46
"तो तुम कह रहे हो," उसने बहुत धीमी आवाज़ में कहा, "कि एक चाय वाले के पास वो चीज़ हो सकती है, जो मैं दस साल से ढूँढ रहा हूँ। और तुम्हें ये पता चलने में पूरी रात लग गई?"
मुश्ताक़ ने हाथ जोड़ लिए। "सर, मैंने अपने आदमी भेजे हैं। हर गली में। अगर चाबी उसके पास है, तो कल दोपहर तक…"
"कल दोपहर!" बलवंत अचानक उठ खड़ा हुआ। कुर्सी पीछे खिसककर दीवार से टकराई — चटाक! कमरे में उसकी गूँज रह गई।
"मुश्ताक़, तुम्हें पता है उस चाबी से क्या खुलता है?"
मुश्ताक़ का गला सूख गया। "सर… वो बही…"
"हाँ, वो बही। जिसमें हर एक नाम है। हर एक हिसाब। मेरे हाथ का हर निशान।" बलवंत ने अपनी उँगली उठाई — उसकी आदत, जब गुस्सा आता था तो आवाज़ नहीं उठती थी, सिर्फ़ उँगली उठती थी। "और तुम हो कि आग लगने के बाद भी उसे ढूँढ नहीं पाए।"
कमरे में सन्नाटा छा गया। बाहर कहीं बगीचे में पानी का पंप चल रहा था, टक-टक-टक, जैसे कोई घड़ी चल रही हो।
फिर बलवंत ने अपना हाथ नीचे किया और अपनी गर्दन तक उँगलियाँ ले गए। उसने सोने की चेन धीरे से उतारी, जो उसके गले में सालों से थी। चेन उसकी हथेली में ठंडी पड़ी थी, और उसका हुक चाँदी की रोशनी में चमका।
उसने मुश्ताक़ का हाथ पकड़ा, उँगलियाँ खोलीं, और चेन उसकी हथेली पर रख दी।
"ये रख।" बलवंत की आवाज़ शांत थी, पर उसमें वो ठंडक थी जो हड्डियों तक उतर जाती है। "जब तक घड़ी और बही, दोनों वापस नहीं आतीं, ये तेरी नहीं है। और मुश्ताक़…"
मुश्ताक़ ने हाथ कसकर भींचा। चेन की गाँठ उसकी हथेली में चुभ रही थी। उसके हाथ काँप रहे थे, और वो अपने बाकी हाथ से अपने दस्ताने को कलाई पर और ऊपर खींचने लगा — पहले बाएँ, फिर दाएँ। जैसे कुछ छिपाना हो।
पर देर हो गई थी। बलवंत की नज़र उसकी कलाई पर पड़ गई, जहाँ दस्ताने के किनारे से एक पुराना जला हुआ निशान झाँक रहा था — गोल, चिकना, किसी केतली के ढक्कन के आकार का।
बलवंत मुस्कुराया। वो मुस्कान नरम थी, और इसीलिए ज़्यादा डरावनी। "अभी भी छिपाता है?"
"सर…"
"चलो, जाओ। और सुनो — उस लड़के की दुकान… उसकी गली… मैं चाहता हूँ कि कल सुबह वहाँ सब कुछ ऐसा हो जैसे कुछ हुआ ही न हो। साफ़-सुथरा। जब तक मैं खुद न आऊँ।"
मुश्ताक़ सिर झुकाकर बाहर निकल गया। दरवाज़ा बंद होते ही बलवंत फिर कुर्सी पर बैठ गया और घड़ी अपने सामने रख ली।
तभी दरवाज़े की दरार में एक साया हिला।
कमलावती राय दरवाज़े से आधी झाँक रही थीं। उनकी साड़ी का पल्लू उँगलियों में लिपटा था, और उनकी आँखों में वो चीज़ थी जो पिछले कई सालों से वहाँ जमी हुई थी — डर, और उस पर पतली-सी चुप्पी।
बलवंत ने उन्हें देखा और उसका चेहरा बदल गया। गुस्सा कहीं पीछे चला गया, और उसकी जगह एक नरमी आ गई, जो असली नहीं थी, पर सालों से पहनी हुई थी।
"कमला, तुम अब तक जाग रही हो?"
"तुम्हारी आवाज़ सुन रही थी," उन्होंने धीरे कहा। उनकी आवाज़ टूट रही थी, जैसे हर शब्द के लिए माफ़ी माँगनी पड़ती हो। "कुछ ठंडा पीने को भेजूँ?"
बलवंत ने हाथ हिलाया। "हाँ, भेजो। नींबू वाला। मेहमान आएँगे, कल।" उसने घड़ी पर नज़र डाली। "और कमला… बेटे से कहना कि वो सुबह यहाँ हो। मुझे उससे बात करनी है।"
कमलावती ने सिर हिलाया और पल्लू खींचकर सीढ़ियों की तरफ़ बढ़ गईं। उनके कदम सीढ़ी पर रखे जाते हुए बहुत हल्के थे — जैसे उन्हें किसी की नींद नहीं तोड़नी हो।
बलवंत ने फ़ोन उठाया। पर उसके हाथ लगने से पहले ही फ़ोन खुद बजने लगा — तेज़, चिड़चिड़ी घंटी।
स्क्रीन पर लिखा था — रोहित।
उसने मुस्कुराते हुए फ़ोन कान पर रखा। "रोहित। तुम्हें देर नहीं होती?"
"पापा, आपको पता है?" रोहित की आवाज़ में वो ठंडी उत्तेजना थी, जो उसे अपने बाप से मिली थी। "सेवा सदन, वो जली दुकान, वो लड़का — आप सब जानते हैं। फिर भी मुझे फ़ोन नहीं किया?"
"मैंने सोचा तुम्हें खुद पता चल जाएगा। तुम्हें तो हर बात अपने आप पता चल जाती है।" बलवंत ने कुर्सी पीछे करके टेबल पर पैर रखे। "बोलो, क्या सलाह है तुम्हारी?"
"सलाह?" रोहित हँसा — ठंडी, छोटी हँसी। "पापा, अब सलाह का वक़्त नहीं है। वो लड़का हमारे दरवाज़े तक आ गया है। एक चाय वाला, पापा! अगर उसने कल सुबह टावर के नीचे कुछ भी बोल दिया, तो अख़बार वाले, चैनल वाले — सब वहाँ होंगे। आपकी प्रतिष्ठा?"
"मेरी प्रतिष्ठा?" बलवंत की आवाज़ में वो ठंडक आ गई जिसकी आदत उसके आदमियों को थी। "बेटा, मेरी प्रतिष्ठा तुम्हारे हाथ में नहीं है। वो मेरे हाथ में है।"
दूसरी तरफ़ एक पल चुप्पी रही। फिर रोहित ने धीरे से कहा, "तो फिर उसे इस्तेमाल कीजिए, पापा। पूरे शहर के सामने निपटाइए। जिस दिन शहर देखेगा कि जो बलवंत के ख़िलाफ़ खड़ा होता है, उसका क्या होता है — उस दिन आपका डर कई गुना बढ़ जाएगा। और डर, पापा… डर ही असली ताक़त है।"
बलवंत ने घड़ी देखी। फिर बाहर खिड़की की तरफ़ देखा, जहाँ रात की आग जैसे किसी दूर की फ़ैक्टरी की चिमनी से उठ रही थी — सिर्फ़ एक पतली लकीर, जो आसमान में मिल जाती थी।
"ठीक है," उसने कहा। "कल टावर के नीचे। ग्यारह बजे। सबको बुलाओ।"
"पापा, वो सुबह दस बजे आने को कह रहा था।"
"मैंने ग्यारह कहा है।" बलवंत ने फ़ोन काट दिया।
वो कुर्सी से उठा और खिड़की तक गया। शीशे पर उसका चेहरा साफ़ दिख रहा था, और उसके पीछे कमरे की पीली रोशनी। उसने शीशे पर उँगली रखी और धीरे से खींची — एक लकीर, जो बाहर के अंधेरे को दो हिस्सों में बाँट देती है।
"एक चीज़ है जो उस लड़के को पता नहीं," उसने खुद से कहा, आवाज़ बहुत धीमी, जैसे कोई राज़ अपनी ही परछाई को बता रहा हो। "उसकी माँ जो चुप है, वो झूठ बोल रही है।"
कमरे में सिर्फ़ पंप की आवाज़ बची थी। टक। टक। टक।
"और वो झूठ कल टूटेगा।"
॥
रवि ने पूरी रात आँख नहीं मींची। छत पर बैठा वो घड़ी को हथेली में दबाए बलवंत की आख़िरी बात सुनता रहा — "उसकी माँ जो चुप है, वो झूठ बोल रही है।" सुबह की पहली किरण आँगन की दीवार पर पड़ी, तो वो उठा। हाथ-मुँह धोया, और नीचे उतरा।
घर के अंदर से तड़के की आवाज़ आ रही थी। सोचा, पिंकी उठ गई होगी। पर जब दरवाज़े पर पहुँचा, तो कदम रुक गए।
चूल्हे के पास माँ बैठी थीं। खुद उठकर। सफ़ेद साड़ी, बाल ठीक से बँधे नहीं, एक हाथ में कड़छी और दूसरे में रामायण की वो छोटी किताब, जो वो हर वक़्त अपने पास रखती थीं। चूल्हे की लौ उनके पीले चेहरे पर काँप रही थी, और आँखों में वो हँसी थी — जो डर को छिपाने के लिए पहनी जाती है।
पिंकी पास में बैठी थी, हाथ में पानी का गिलास और दवाई की पत्ती। "माँ, पहले ये लो। फिर रोटी।"
"अरे, मैं ठीक हूँ।" माँ ने कड़छी चलाई, पर हाथ काँप रहा था। "तू स्कूल जा। मैं तेरे भैया के लिए पराँठा बना रही हूँ।"
रवि दरवाज़े पर खड़ा रहा। कुछ नहीं बोला। सिर्फ़ देखता रहा — माँ के सूखे हाथ, गरम तवे से दूर हटते हुए, जैसे डर रहे हों कि छू न जाएँ। उसका गला भर आया। दस दिन पहले यही हाथ ज़मीन पर गिरे थे, और आज पराँठा बना रहे थे।
पिंकी ने पलटकर देखा। "भैया!" वो उठने लगी, पर रवि ने हाथ से रोका।
वो चुपचाप माँ के सामने बैठ गया। दोनों हाथ जोड़कर। माँ ने नज़र उठाई, तो उनकी कड़छी हवा में रुक गई।
"भूख लगी है?" माँ ने पूछा, आवाज़ में वही पुरानी नरमी।
रवि ने गहरी साँस ली। एक, दो। फिर बोला, "माँ… सेवा सदन क्या है?"
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