Billionaire Empire System – Chapter 36
रघुवीर दरवाज़े की तरफ़ बढ़ा। फिर अचानक रुका, और पलटकर देखा। उसकी आँखें कुछ देर रवि के चेहरे पर टिकी रहीं, और उसमें वो डर साफ़ दिख रहा था जो शब्दों से बड़ा होता है — वो डर जो आदमी को रात में जगाता है, और सुबह जगाने के बावजूद पीछे नहीं छोड़ता।
"रवि," उसने कहा, "एक बात और।"
"हाँ, सर।"
रघुवीर ने गली की तरफ़ देखा, फिर करीब आकर रवि के कंधे पर हाथ रखा। उसका हाथ भारी था, उम्र से ज़्यादा भारी।
"मेरी सलाह मानो — पीछे मत पड़ो।" उसकी उँगलियाँ रवि के कंधे पर दब गईं। "पापा का सच ढूँढने निकला तो रास्ते में एक दिन अपनी माँ को खो देगा। मैंने देखा है ये। मैंने खुद देखा है।"
रवि चुप रहा। उसने कोई जवाब नहीं दिया।
रघुवीर ने हाथ हटाया और साइकिल की तरफ़ बढ़ा। साइकिल स्टैंड से छुड़ाई, उस पर बैठा, और पैडल मारने ही वाला था कि रुक गया। पलटकर देखा।
"और बेटा…"
"सर?"
रघुवीर का चेहरा अब और अजीब हो गया था। उसके होंठ खुले, फिर बंद हुए, जैसे वो अंदर ही अंदर तय कर रहा हो कि ये बात बताए या नहीं।
"तेरे पापा ने मुझे एक बार कहा था — अगर उन्हें कुछ हो जाए, तो श्मशान के पास वाले बूढ़े को ढूँढना।"
"श्मशान के पास वाले बूढ़े?" रवि ने कहा।
रघुवीर ने सिर हिलाया। "क़ासिम भाई। कोई उन्हें नाम से नहीं बुलाता। पचास साल से वो शहर में हैं और पचास साल से किसी ने उनका पूरा नाम नहीं पूछा। तेरे पापा ने कहा था कि अगर दुनिया में कोई एक आदमी है जो सच जानता है, तो वो वही है।"
वो चला गया। साइकिल की घंटी गली के मोड़ पर एक बार और बजी, फिर दूर हो गई।
लुट्टन ने एक लंबी साँस छोड़ी। "यार, मेरे हाथ पसीने से भर गए हैं।" उसने हथेलियाँ पैंट पर पोंछीं। "श्मशान? तू वहाँ नहीं जाएगा। बिलकुल नहीं जाएगा।"
रवि दराज़ से कपड़े में लिपटी कॉपी और लिफ़ाफ़ा निकाल रहा था।
"ना रे," उसने कहा, "मैं वहाँ जा नहीं रहा।"
लुट्टन के चेहरे पर राहत नहीं आई।
"रवि," उसने कहा और उसकी आवाज़ सीरियस थी, जो कभी नहीं होती। "तू मुझे जानता है ना? मैं बहाने बनाता हूँ, बकवास करता हूँ, लेकिन आज मैं सच बोल रहा हूँ। तेरे पापा इसी सच के पीछे मरे थे। तू भी पीछे पड़ेगा तो माँ को कौन देखेगा? पिंकी को कौन पढ़ाएगा? मुझे?"
रवि रुका। उसने कपड़े में लिपटी कॉपी को सीने से लगाया और लुट्टन की तरफ़ देखा।
"तुझे पता है मुझे सबसे ज़्यादा डर किस बात का है?" रवि ने कहा।
"किस बात का?"
"इस बात का कि एक दिन मैं मरूँगा, और मेरी माँ मेरी तस्वीर के आगे बैठकर वही दीया जलाएगी जो पापा की तस्वीर के आगे जलाती है। और तब वो पूछेगी — 'भगवान, तूने मेरे साथ ये क्यों किया?'" रवि की आवाज़ धीमी हो गई। "मैं ये सवाल अपनी माँ के मुँह से नहीं सुन सकता, लुट्टन। इसीलिए मैं रुक नहीं सकता। सच ढूँढना मेरी शौक़ नहीं है। ये उस सवाल का जवाब है जो माँ आज नहीं पूछ रही। पर पूछेगी।"
लुट्टन ने कुछ नहीं कहा। फिर उसने अपनी जेब में हाथ डाला और वो लॉटरी का टिकट निकालकर चूल्हे के पास रख दिया। "ये तो अब भी बेकार है," उसने बिना हँसे कहा। "तेरी बात सुनकर लगा, मेरा सबसे बड़ा नंबर तो यही है — कि मैं तेरे साथ खड़ा हूँ।"
रवि ने उसकी तरफ़ देखा। और पहली बार उस सुबह, उसके चेहरे पर कुछ ऐसा आया जो मुस्कान जैसा था।
"अबे, फ़िलॉसफ़र बन गया," रवि ने कहा।
"तेरे साथ रहकर और क्या बनूँगा?"
दोपहर तक रवि ने दुकान खोली। ग्राहक आए, चले गए। कोई कुछ नहीं जानता था। गली में सब वैसा ही था — शकुंतला ने दूसरी दुकान के सामने बाल्टी पटकी, बच्चे पतंग उड़ा रहे थे, और सामने वाली छत पर कोई औरत धोती सुखा रही थी।
दोपहर में माँ ने अंदर से आवाज़ दी।
रवि अंदर गया। सीता देवी बिस्तर पर बैठी थीं, पर अब पहले से सीधी। पास में पिंकी बैठी थी और उसकी उँगली पर एक छोटी-सी पट्टी बँधी थी।
"ये क्या है?" रवि ने पूछा।
"कुछ नहीं भैया।" पिंकी ने हाथ पीछे छिपा लिया। "बस…"
"इसने सुबह हलवा बनाने की ज़िद की," माँ ने कहा, और उनकी आवाज़ में वो पुरानी डाँट लौट आई थी जो बीमारी में सो गई थी। "मेरे पास बैठकर। कह रही है — 'माँ, आज भैया के हाथ की चाय के साथ मीठा होना चाहिए।' और फिर तवा छू लिया।"
पिंकी ने मुँह बनाया। "भैया, माँ ने मुझे बच्चों वाली बात कह दी।"
रवि हँसा। फिर उसने धीरे से पिंकी का हाथ पकड़ा और पट्टी देखी। जलन छोटी थी, पर उसकी आँखें कुछ देर वहीं रुक गईं।
"अगली बार मैं बनाऊँगा," उसने कहा। "तू बस खा लेना।"
"पर तेरी चाय में चीनी कम होती है।"
"तो अगली बार ज़्यादा डालूँगा।"
पिंकी मुस्कुराई, और फिर उसने धीरे से कहा, "भैया, तेरी आँखें लाल हैं। तू सोया नहीं?"
रवि ने जवाब देने की जगह माँ की तरफ़ देखा। माँ बिना पलक झपकाए उसे देख रही थीं, और उनकी आँखों में वो पुराना डर धीरे-धीरे फैल रहा था — वो डर जो एक माँ को तब होता है जब वो जानती है कि बेटा कुछ छिपा रहा है।
"कुछ हुआ है," माँ ने कहा। सवाल नहीं, बात। "मुझे बता।"
"बस दुकान में थोड़ी आग लगी थी," रवि ने कहा, जितनी आसानी से कह सकता था उतनी आसानी से। "कुछ नहीं जला। हवलदार आया था, काग़ज़ भर दिया। कोई बात नहीं।"
माँ ने उसकी आँखों में देखा। एक पल के लिए लगा कि वो कुछ और पूछेगी। पर फिर उसने धीरे से कहा, "भगवान भला करे।" और पास रखी रामायण उठा ली।
रवि उठने को हुआ, पर रुक गया। वो बिस्तर के किनारे बैठ गया।
"माँ," उसने कहा, "एक बात पूछूँ?"
"पूछ।"
"पापा के कोई… कोई जानने वाले थे? ऐसे, जिनसे वो कभी-कभी मिलने जाते थे? जिनका ज़िक्र वो घर पर नहीं करते थे?"
सीता देवी का हाथ रामायण के पन्ने पर रुक गया। कमरे में बस पंखे की आवाज़ बची थी, और कुछ देर तक कोई नहीं बोला।
"क्यों पूछ रहा है?" उन्होंने कहा, एकदम धीरे से।
"बस ऐसे ही।"
"रवि।"
उसकी आवाज़ में वो लोहा लौट आया था।
रवि ने कुछ नहीं कहा। उसने सिर झुका लिया।
"तेरे पापा के बहुत लोग जानने वाले थे," माँ ने कहा, और अब वो रामायण बंद कर रही थीं। "पर एक आदमी था… जिसका नाम वो कभी नहीं लेते थे। केवल एक बार, बहुत बीमारी में, बुख़ार में — उन्होंने कहा था, 'क़ासिम भाई से कह देना, बही सुरक्षित है।'" उन्होंने रुककर रवि को देखा। "मैंने उस दिन पूछा था कि क़ासिम भाई कौन हैं। और वो चुप हो गए थे। फिर कभी उस नाम को ज़ुबान पर नहीं लाए।"
रवि की साँस रुक गई।
"और वो बही?" उसने पूछा, आवाज़ दबाकर।
"कौन-सी बही, बेटा? मैं तो बस इतना जानती हूँ कि उस रात वो घर आए, बहुत थके हुए, चाय उठाई —" माँ रुक गईं। उनके हाथ काँपने लगे, जैसे अब भी उस पल को छू रहे हों। "…और फिर अगली सुबह वो नहीं उठे।"
पिंकी ने माँ का हाथ पकड़ लिया।
रवि कुछ देर चुप बैठा रहा। फिर उसने धीरे से कहा, "माँ, मैं एक काम से बाहर जाऊँगा। दो घंटे में लौट आऊँगा।"
माँ ने उसकी तरफ़ देखा। उनकी आँखों में वो सवाल था जो हर माँ की आँखों में होता है — कहाँ जा रहा है, क्यों जा रहा है, क्या वो वही रास्ता है जिससे उसके पति गए थे? पर उन्होंने कुछ नहीं कहा। सिर्फ़ रामायण फिर खोली, और उसके पन्नों पर उँगली रख दी, जैसे कोई सहारा चाहिए हो।
रवि बाहर निकला। लुट्टन दुकान पर खड़ा था, बाँहें बाँधे, चेहरे पर साफ़ लिखा था — तू पागल है।
"तू वहाँ जा रहा है," लुट्टन ने कहा। सवाल नहीं, बात।
"हाँ।"
"अकेला?"
"हाँ।"
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