Billionaire Empire System10 / 834

Billionaire Empire System – Chapter 10

6 min read November 7, 2026

सुबह चार बजे केतली की सीटी बजी और रवि को लगा जैसे किसी ने उसके सिर पर हथौड़ा मार दिया हो। वो उठा, मुँह धोया, और अनायास उसके कदम पापा की अलमारी की तरफ़ बढ़ गए। ऊपर वाले खाने में, पुरानी किताबों के बीच, वो कॉपी पड़ी थी — वही आधी जली कॉपी जो उसे पहले मिली थी। उसने उसे निकाला। जले किनारे उँगली में कालिख छोड़ गए। स्याही कहीं उड़ गई थी, कहीं धुँधली पड़ गई थी, पर जहाँ-जहाँ लिखा था, वो पढ़ा जा सकता था।

पहले पन्ने पर, ऊपर कोने में, पापा की सीधी-सादी लिखाई — "सेवा सदन ट्रस्ट — हिसाब खाता।"

उसके नीचे खाने थे। तारीख़ें। नाम। रक़में। रवि ने उँगली चलाई। "बाबूलाल — चार हज़ार।" "शकुंतला देवी — नौ सौ।" "रमज़ान अली — दो हज़ार पाँच सौ।" नाम ऐसे, जैसे पूरे मोहल्ले की एक लिस्ट हो। आधे पन्ने जले हुए थे, आधे पर पानी के छींटों से स्याही फैल गई थी। आख़िरी पन्ने पर एक बड़ी रक़म थी, जिसके आगे सिर्फ़ दो अक्षर बचे थे — "ज़ार…" — बाकी जल गया था।

और रक़म के नीचे, पापा की लिखाई में, एक लाइन थी। छोटी। दबी हुई स्याही से। जैसे लिखते वक़्त हाथ काँप रहा हो।

"सब कुछ ऊपर गया। मेरे हाथ से गया। माफ़ करना।"

रवि की साँस अटक गई।

वो कॉपी लेकर बैठ गया। बैठा ही रहा। सुबह का उजाला छत की खिड़की से झाँकने लगा, फिर तेज़ हो गया, फिर ढलने लगा। बीच में पिंकी आई, कुछ बोली, वो सुनता रह गया। माँ ने दवाई माँगी, वो उठकर दे आया। पर उसका दिमाग़ सिर्फ़ उस एक लाइन पर अटका था।

"सब कुछ ऊपर गया।"

क्या ऊपर गया? कहाँ गया? और कौन ले गया?

दोपहर को उसने मोबाइल निकाला। इरा का नंबर स्क्रीन पर था — कल रात उसने दिया था। उँगली नंबर पर टिकी रही। फिर भीतर से एक आवाज़ आई — क्या कहूँगा? कि मेरे पापा की कॉपी में तुम्हारे पापा का नाम है? कि किसी ने सब कुछ ले लिया और हमें सिर्फ़ आधा जला हिसाब छोड़ गया? उसने काट दिया।

फिर उसे याद आया — मुन्ना भाई। कल सुबह पीछे वाली गली में मिलने को कहा था। और रवि उससे मिलने नहीं गया था, रात भर की उलझन में भूल गया।

वो शाम को निकला। पीछे वाली गली में, पुरानी नाली के किनारे, मुन्ना भाई अपनी जगह पर बैठे थे, तुलसी की माला हिला रहे थे। पास में एक टूटी बाल्टी पड़ी थी जिसमें बारिश का पानी भरा था।

"आज तो तू आया ही नहीं," मुन्ना भाई ने बिना ऊपर देखे कहा। "मैं सोचूँ, लड़का रूठ गया क्या।"

"माफ़ कर दो भाई," रवि बैठ गया। "रात भर जागता रहा।"

"जागना अच्छा है।" मुन्ना भाई ने माला घुमाई। "सोया हुआ आदमी ख़तरे को नहीं देखता। जागता हुआ देखता है। पर उससे दुश्मन भी जाग जाते हैं।"

रवि ने कुछ नहीं कहा। एक पल चुप रहे। फिर मुन्ना भाई ने धीरे से, ऐसे जैसे कोई बोझ उतार रहे हों, कहा — "अब ख़तरा करीब है।"

"क्या?"

"उस रात, तेरे पापा की मौत वाली रात।" मुन्ना भाई ने आँखें बंद कर लीं। "मैं यहीं सोया था। दुकान के बाहर। आधी रात के बाद एक गाड़ी आई थी। सफ़ेद सूट वाला आदमी उतरा था। पैर की आवाज़ भारी थी, जैसे पत्थर गिर रहे हों। उसने तेरे पापा से कहा था — 'साहब याद कर रहे हैं।'" मुन्ना भाई की आवाज़ सूख गई। "फिर तेरे पापा ने घड़ी उतारी, टेबल पर रखी, मुझे देखा, और… चले गए।"

रवि का हाथ बाल्टी के किनारे पर कस गया।

"सफ़ेद सूट वाला?" उसने धीरे से पूछा।

"बड़ा आदमी।" मुन्ना भाई ने आँखें खोलीं। "उसके पीछे दो और थे। बात नहीं की, बस खड़े रहे।" उसने रवि की तरफ़ देखा, और उनकी आँखों में पहली बार कुछ साफ़ दिखा — डर। पुराना, दबा हुआ डर। "मैंने कुछ नहीं देखा, बेटा। मैं सोया था। समझा?"

"भाई साहब —"

"मैं सोया था!" मुन्ना भाई की आवाज़ एकदम से चढ़ गई, फिर गिर गई। उन्होंने बाल्टी में हाथ डुबोया, पानी से मुँह धोया, और काँपती आवाज़ में गुनगुनाने लगे, जैसे अपनी ही आवाज़ से खुद को छिपा रहे हों।

रवि उठा। जाते-जाते रुका और पूछा, "वो घड़ी… उस रात के बाद कौन ले गया?"

मुन्ना भाई गुनगुनाते रहे। जवाब नहीं आया।

रवि दुकान पर लौटा। शाम ढल रही थी। उसने शटर आधा ही गिराया था, टेबल पर कॉपी रखी थी, और बैठा सोच रहा था कि इरा को क्या कहूँ, कब कहूँ, या कहूँ भी या नहीं — कि शटर के नीचे से आवाज़ आई।

"रवि?"

वो एक ठंडी आवाज़ थी, फिर भी रवि को लगा जैसे किसी ने अंदर के अँधेरे में लालटेन जला दी हो।

इरा आई थी। कंधे पर वही पुराना बैग, स्कूटी के नीचे खड़ी, बाल हवा से उलझे हुए।

"मैं रुक सकती हूँ?" उसने पूछा।

रवि ने शटर उठा दिया। "आ जाइए।"

वो अंदर आई, बैग उतारा, और सीधे टेबल पर रखी कॉपी पर नज़र टिका दी। एक पल के लिए वो वहीं जम गई।

"क्या हुआ?" रवि ने पूछा।

"मुझे पता है।" उसने धीरे से कहा। "तुम्हारे पापा के सामान में कुछ था। मुझे ये महसूस हुआ था कल रात — तुम्हारी आँखें जब सलाम ख़ान का नाम सुना तब कुछ और कह रही थीं।" वो आगे बढ़ी। "दिखाओ मुझे।"

रवि ने कुछ नहीं कहा। उसने बस कॉपी की तरफ़ हाथ बढ़ाया।

इरा ने कॉपी खोली। पहला पन्ना। पापा की लिखाई। उसकी उँगली चली — "सेवा सदन ट्रस्ट।" फिर दूसरे पन्ने पर। नाम, रक़में, तारीख़ें। फिर आख़िरी पन्ना। वो लाइन — "सब कुछ ऊपर गया।"

इरा का चेहरा पीला पड़ गया।

वो पीछे हटी, मेज़ को पकड़ लिया। उसके हाथ काँप रहे थे। होठों पर कुछ आया पर आवाज़ नहीं निकली। रवि ने उसे देखा — इस लड़की को उसने अब तक सिर्फ़ सख़्त देखा था, सवाल पूछते, जवाब पर जवाब देते। ऐसी नहीं देखा था।

"ये…" इरा ने उँगली उस लाइन पर रखी, "ये मेरे पापा की लिखाई है।"

रवि को लगा जैसे गली में सारी हवा रुक गई।

"क्या?"

"मैं इसे पहचानती हूँ।" उसकी आवाज़ टूट रही थी, पर वो खुद को संभाल रही थी — किसी मेहनत से, बड़ी मेहनत से। "मेरे पापा की 'ब' ऐसे ही बनती थी। आख़िर में थोड़ी ऊपर उठती हुई। और 'स' — देखो — जैसे आधा अधूरा। मैंने इन पन्नों को देखा है।" उसने कॉपी उठाई और अपनी छाती से लगा ली। "ये मेरे पापा की कॉपी है। ये उनका हिसाब था।"

रवि चुप खड़ा रहा। उसे कुछ कहना था पर शब्द नहीं मिल रहे थे।

"तो मतलब…" इरा ने कॉपी नीचे की और उसकी आँखों में देखा, "…तुम्हारे पापा और मेरे पापा, दोनों एक ही हिसाब रखते थे।"

"दोनों एक ही ट्रस्ट में थे," रवि ने धीरे से कहा।

"और दोनों…" इरा ने कहना चाहा, पर रुक गई।

"दोनों एक ही तरह मरे।" रवि ने उसकी बात पूरी की।

कुछ देर दोनों चुप बैठे रहे। अंदर सिर्फ़ केतली की धीमी फुसफुसाहट थी, दूर कहीं रेडियो पर कोई पुराना गाना बज रहा था। चाय मेज़ पर रखी ठंडी हो रही थी — दोनों में से किसी ने हाथ नहीं बढ़ाया।

"मैं तुम्हें कुछ बताना चाहता हूँ," रवि ने आख़िर कहा। उसने गहरी साँस ली — वो आदत जो उसे खुद पता नहीं थी। "मेरे पापा की मौत के दिन दुकान पर सिर्फ़ दालचीनी की महक आ रही थी।" उसने आँखें मूँद लीं। "हमने कभी दालचीनी नहीं खरीदी थी। पता नहीं कहाँ से आई थी।"

इरा ने उसकी तरफ़ देखा, चुप।

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