A Dark Secret – Chapter 88
"और अगर वो मुझे टटोले?"
"नहीं टटोलेगा।" उसने कहा। "जो आदमी तुझे बेटा कहता है, वो तुझे टटोलने नहीं आएगा। वो तुझे बैठाएगा, चाय देगा और सबसे पहले तेरे पापा की तारीफ़ करेगा।"
मैंने वो चीज़ ली और जेब के पास लगा ली।
साढ़े छह बजे जुगनू आया, नंगे पाँव, और उसने दूर से ही कहा, "भाई, आज मैं साथ चलूँगा।"
"नहीं।"
"मैं बाहर रहूँगा।"
"नहीं।"
"पर भाई…"
"जुगनू।" मैंने कहा। "आज तेरा काम ये है कि तू यहाँ बैठकर हर उस गाड़ी का नंबर याद रख जो नौ बजे से ग्यारह बजे के बीच टोल से निकले। हर एक। याद रख सकता है?"
उसने सीना फुलाया।
"भाई, मैं सब याद रखता हूँ।"
"तो यही तेरा काम है।" मैंने कहा। "और एक बात — आज मेरे पीछे मत आना। चाहे कुछ भी हो जाए।"
उसने सिर हिलाया, पर उसकी आँखों में वो बात थी जो कहती थी कि वो नहीं मानेगा।
नौ बजे मैंने अपनी कमीज़ पहनी। सली हुई कमीज़। नीली। और मैंने अपने बालों में हाथ फेरा, और मैंने अपनी जेब में हाथ डाला और वहाँ सब कुछ महसूस किया — तीन नट, तेल में डूबा रुमाल, कॉपी, और रवि की खाली रसीद जिसका एक कोना फटा था।
और ठीक सवा नौ बजे, जब मैं ढाबे से निकलने ही वाला था, टीटू आया।
वो सीधा मेरे पास आया। उसके हाथ में कुछ नहीं था। वो नहीं बोला। वो बस मेरे सामने खड़ा रहा और उसने मेरी तरफ़ देखा, और मैंने उसकी आँखों में वो थकान देखी जो उस रात से भी ज़्यादा बड़ी थी।
"टीटू?"
"मैं रात भर सो नहीं पाया।" उसने कहा।
"क्यों?"
"क्योंकि मुझे कुछ याद आ गया।" उसने कहा। "और मैं सुबह से ये सोच रहा हूँ कि तुम्हें बताऊँ या नहीं।"
"बता।"
उसने मेरा हाथ पकड़ा। उसकी उँगलियाँ ठंडी थीं, और काँप रही थीं।
"तुम्हारे पापा जब आख़िरी बार उस कमरे से निकले थे," उसने धीरे से कहा, "तो वो रुके थे। यहाँ। इसी ढाबे के बाहर। और उन्होंने मुझे चाय पिलाई थी। और मैं उस वक़्त अठारह साल का था और मुझे कुछ समझ नहीं आया था।"
"और?"
"और उन्होंने मुझसे एक बात कही थी।" टीटू ने कहा। "उन्होंने कहा था — बेटा, अगर कभी मेरे बेटे इस शहर में आए, और तू उससे मिले, तो उसे बता देना कि उसका पापा चोर नहीं था।"
मेरा गला सूख गया।
"तूने मुझे कल क्यों नहीं बताया?"
"क्योंकि मुझे डर था।" उसने कहा। "और अब भी है।"
वो मेरा हाथ छोड़ने लगा, फिर रुका, और वो मेरे कान के पास झुक गया।
"एक बात और।" उसने फुसफुसाकर कहा। "अगर वो तुमसे पापा का छिपाया काग़ज़ माँगे, तो मत देना, वरना तुम्हारा नाम भी काग़ज़ पर आ जाएगा।"
॥
टीटू चला गया। मैंने उसकी पीठ देखी जब तक वो ढाबे के मोड़ पर नहीं मुड़ा। फिर मैंने जेब में हाथ डाला और तीनों नट निकालकर हथेली पर रख लिए। पीतल के। तीनों पर वही नाम। वही घिसाई।
पर मैं सीधा टोल की तरफ़ नहीं गया।
रुक्मा दीदी ने मुझे जाते हुए देखा और कुछ नहीं बोली। बस चूल्हे से हाथ उठाकर हवा में हिला दिया, जैसे कह रही हो — जो करना है कर, पर जल्दी लौट।
मैं ढाबे के पीछे से निकला, नीम के पेड़ के पास से गुज़रा जहाँ जुगनू सो रहा था, और उसके बाद वो पुरानी सड़क पकड़ ली जो सीधे सूखी नदी के पुल तक जाती है।
पुराना पुल। आधा से ज़्यादा टूट चुका है। बीच में से पत्थर गिर गए हैं और अब वहाँ सिर्फ़ लोहे की दो पटरियाँ बची हैं जिन पर चलने की हिम्मत किसी में नहीं। नई सड़क पास से निकल गई, और ये पुल अब सिर्फ़ हवा का अड्डा है। हवा, धूल और कुछ नहीं।
मैं किनारे पर बैठ गया। पैर नीचे लटका दिए। नीचे नदी नहीं थी — सूखी रेत, टूटी ईंटें, और एक जगह जली हुई लकड़ी का काला निशान जो बरसों से वैसा ही पड़ा है।
मैंने तीनों नट अपने सामने पत्थर पर रख दिए। एक लाइन में। तीन छोटे पीले टुकड़े, और तीनों पर एक ही अक्षर — र।
बारह साल से ये किसी की जेब में पड़े थे। किसी की मेज़ पर। किसी की अलमारी में। और आज मेरी हथेली पर हैं।
मैंने कहा, "पापा, आपने नाम अंदर क्यों छिपाया?"
हवा ने जवाब नहीं दिया। हवा को जवाब देने की आदत नहीं है।
मैंने अपनी घड़ी देखी। पाँच मिनट आगे। सवा नौ से नौ मिनट कम यानी नौ बजकर छब्बीस मिनट। तो दुनिया के हिसाब से अभी नौ बजकर इक्कीस मिनट हैं। दस बजे की मीटिंग। मेरे पास उनतालीस मिनट हैं, और मेरे पास कुछ नहीं है।
तभी मुझे नीचे की तरफ़, पुल के उस टूटे हिस्से के नीचे, कुछ दिखा।
मैं उतरा। रेत पर पैर रखकर उस जगह तक गया जहाँ पिछली बार वो मिट्टी का कटोरा मिला था — राख वाला कटोरा, जिसके नीचे आधा मिटा नाम वाली पर्ची चिपकी थी।
कटोरा वहीं था। उलटा। पर इस बार अंदर राख नहीं थी।
अंदर सिर्फ़ कालिख थी। ठंडी। बहुत पुरानी नहीं — पर ठंडी।
और कटोरे के पास रेत पर एक चप्पल की एड़ी का निशान था।
निशान सड़क की तरफ़ जा रहा था। नदी की तरफ़ नहीं। सड़क की तरफ़, फिर रुका, फिर मिट गया जहाँ कच्चा रास्ता पक्के रास्ते से मिलता है।
वो आदमी आज नहीं था।
जो आदमी रोज़ शाम को यहाँ घुटने मोड़कर बैठता था, वो आज नहीं था। और उसका कटोरा ठंडा था, यानी वो आज यहाँ आया ज़रूर था — पर बैठा नहीं।
वो उठकर चला गया था। सड़क की तरफ़।
मैं वापस ऊपर चढ़ा और बैठ गया। सोचा, ये भी अजीब है। शहर का हर आदमी आज किसी न किसी की तरफ़ भाग रहा है।
और तभी मेरे कान को वो आवाज़ मिली जो मुझे सबसे ज़्यादा चिढ़ाती है।
छोटी गाड़ी। पुरानी। और उसका एक पहिया हवा कम होने की वजह से बाकी तीन से अलग बोल रहा था — धड़म, धड़म, धड़म, और बीच में एक पतली सी गूँज, जैसे गाड़ी के ऊपर कोई धातु का फ्रेम ढीला हो और हर गड्ढे पर हल्का-सा खनक जाए।
नैना।
वो पुल से पहले ही रुक गई, क्योंकि वो जानती थी कि अगर वो पुल तक लाएगी तो मैं सुन लूँगा। और मैं सुन ही गया। मैंने पीछे देखा।
वो आ रही थी। कंधे पर वही फटा बैग, हाथ में वही काला भारी कैमरा, और चश्मा नाक पर सरका हुआ, जिसे वो उँगली से ऊपर धकेल रही थी, जैसे उसका सारा ध्यान चश्मे पर हो और कुछ भी न हो।
वो मेरे पास आकर खड़ी हो गई। उसने कुछ नहीं पूछा। बस मेरे सामने पत्थर पर रखे तीनों नट देखे, और उसका चेहरा थोड़ा बदल गया।
"तू यहाँ क्यों आया?" उसने पूछा।
"हवा खाने।"
"झूठ।"
"अच्छा, तो तू बता मैं यहाँ क्यों आया।"
"क्योंकि तू डरा हुआ है," उसने कहा, "और तू डर के वक़्त काम की जगह किसी पुरानी जगह पर बैठना पसंद करता है।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा।
"तुझे ये कैसे पता?"
"क्योंकि मेरे पापा भी वही करते थे।" उसने कहा। "मरने से पहले वो हर बड़ी बात से पहले अपनी पुरानी गाड़ी में जाकर बैठ जाते थे। बिना इंजन चलाए। बस बैठे रहते थे।"
वो मेरे पास बैठ गई। पैर लटका दिए। उसने अपना कैमरा गोद में रख लिया और उसकी पट्टी पर हाथ फेरने लगी, जो घिसी हुई थी।
"मैं अकेले नहीं जाऊँगा," मैंने कहा, "अगर तुझे यही कहना है तो।"
"नहीं।" उसने कहा। "मुझे ये नहीं कहना। मुझे ये कहना है कि तू अकेले नहीं जाएगा। बस इतना।"
"इसमें फ़र्क़ क्या है?"
"फ़र्क़ ये है कि तेरे वाले वाक्य में तू अपनी मर्ज़ी बता रहा है," उसने कहा, "और मेरे वाले में मेरी।"
मैं हँस पड़ा। उस वक़्त हँसना ठीक नहीं था, पर हँसी आ गई।
"तू ठीक है, जोशी," मैंने कहा। "तू बुरी जगह पर भी ठीक बोलती है।"
"मैं रिपोर्टर हूँ।" उसने कहा। "मेरी पूरी नौकरी ही बुरी जगह पर ठीक बोलने की है।"
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