A Dark Secret – Chapter 87
मैं गली के दूसरी तरफ़ खिसका और एक पुराने टायर के पीछे रुका। गाड़ी का दरवाज़ा बंद करने वाला आदमी फाटक की तरफ़ गया। मैंने उसकी चाल सुनी — दायाँ पैर पहले थोड़ा भारी, यानी दायाँ घुटना पुराना। जेब में कुछ था जो चलते वक़्त हल्का खटक रहा था, धातु।
वो फाटक के अंदर गया। टीटू वहीं खड़ा था, जैसे जम गया हो। फिर वो भी अंदर गया।
मैं लौटा। नैना की गाड़ी में बैठते ही उसने पूछा, "क्या मिला?"
"बहुत कुछ।" मैंने कहा।
"तो बताओ।"
"पहले गाड़ी चला।" मैंने कहा। "यहाँ खड़े होकर बात करना ठीक नहीं।"
वो चुपचाप गाड़ी चलाती रही। रास्ते में उसने दो बार मुझे देखा, पर कुछ नहीं पूछा। मैंने शीशे से बाहर देखा और सुना — रात के ट्रक, सड़क के किनारे सोए हुए, ढाबों के बाहर खड़े, अपने-अपने तरीके से साँस लेते हुए।
ढाबे पर पहुँचकर मैंने उसे सब बताया। टीटू का डर। तारीफ़ पहले, फिर डर। बहन का स्कूल। और वो आख़िरी बात — पुरानी चीज़, छोटी चाबी, अलमारी।
नैना ने सब सुना। फिर उसने कहा, "कल मैं साथ चलूँगी।"
"नहीं।"
"अर्जुन, सुन।" उसने कहा, और उसकी आवाज़ में अब वो चीज़ थी जो बात बढ़ाती है। "मैं अंदर नहीं जाऊँगी। मैं बाहर रहूँगी। पर मेरा कैमरा अंदर जाएगा।"
"कैसे?"
"तू अपनी जेब में एक छोटी चीज़ ले जा।" उसने कहा। "सिर्फ़ आवाज़। कोई तस्वीर नहीं। और अगर वो तुझसे कुछ ऐसा कहे जो हम कभी साबित नहीं कर पाएँगे, तो वो आवाज़ हमारे पास होगी।"
मैंने सोचा। फिर मैंने सिर हिलाया।
"ठीक है।" मैंने कहा। "पर एक शर्त। अगर मैं तुझे फ़ोन करूँ और मैं सिर्फ़ एक शब्द बोलूँ — तो तू अंदर आने की कोशिश भी नहीं करेगी। तू सीधे थाने जाएगी और वहाँ जो भी बैठा हो, उसे ये कहेगी कि बाईस नंबर टोल के पीछे एक आदमी ग़ायब है।"
"कौन सा आदमी?"
"कोई भी।" मैंने कहा। "तुझे नाम नहीं बताना। तू बस शोर करना। शोर से इन लोगों को सबसे ज़्यादा डर लगता है।"
वो देर तक मेरी तरफ़ देखती रही, फिर बोली, "तू कितना अजीब है।"
"मुझे पता है।" मैंने कहा।
वो गई। ढाबे की लाइट बुझ गई। रुक्मा दीदी ने बेंच पर चटाई बिछाई और मुझे ट्रक में सोने से मना कर दिया "आज रात गाड़ी के नीचे कोई नहीं आएगा, पर मैं जोखिम नहीं लूँगी" कहकर।
मैं बेंच पर बैठा रहा।
और फिर मैंने वो किया जो मुझे करना चाहिए था — मैंने अपने पापा का औज़ारों का थैला खोला।
वो थैला चाचा ने मुझे दिया था, यह कहकर कि "भईया तेरे पापा का था, तेरे ही काम आएगा।" कैनवास का थैला, जगह-जगह से सिला हुआ, और अंदर से तेल और पुरानी लोहे की महक आती थी।
मैंने एक-एक औज़ार बाहर निकाला और नीम की लाइट के नीचे रखा।
पहला — पाना। दो नंबर का। हैंडल पर तार लिपटा हुआ था, क्योंकि हैंडल कई बार फिसल चुका था और पापा ने उसे तार से बाँध दिया था।
दूसरा — रिंच का सेट। चार। एक गायब था। वो वाला, जो सबसे ज़्यादा इस्तेमाल होता है।
तीसरा — हथौड़ा। छोटा, भारी, और उसके हैंडल पर जले हुए निशान थे, क्योंकि एक बार पापा ने उसे आग के पास रख दिया था और भूल गए थे।
चौथा — एक पुरानी स्क्रू ड्राइवर, जिसकी नोक घिसी हुई थी।
और सबसे नीचे, कपड़े में लिपटा हुआ, एक छोटा सा बेयरिंग पुलर, जिसे पापा ने खुद बनाया था। मैंने उसे हाथ में लिया। उस पर वही घिसाई थी। वही।
मैंने उन सबको वापस रखा और फिर मैंने कॉपी खोली।
मैंने तारीख़ लिखी — सत्ताईस सितंबर। और नीचे लिखा — "आज रात, ग्यारह बजकर चालीस मिनट, टोल के पीछे।"
फिर मैंने एक-एक करके सब लिखा।
टीटू क्या बोला। किस शब्द से बोला। "पुरानी चीज़" — वो नाम नहीं लेता। "छोटी चाबी" — जेब में हाथ। "अलमारी" — देवा के कमरे में, बंद। तारीफ़ पहले, फिर डर। बहन का स्कूल। चार बजे छुट्टी।
मैंने लिखा — "तीन आवाज़ें जो हमेशा याद रखनी हैं: प्लायर की ठक-ठक (कालू), धातु की घिसाई (नट पर र), और हवा का रिसाव (कटी केबल)।"
फिर मैंने अपनी जेब से तीनों चीज़ें निकालीं और लाइट के नीचे रखीं।
दो नट और एक टूटा हुआ टुकड़ा जिस पर "र" खुदा था।
मैंने तीनों को उँगली से घुमाया। तीनों पर एक ही जगह घिसाई थी, जैसे किसी ने बार-बार उन्हें उसी जगह पकड़ा हो। और तीनों की धातु एक जैसी थी — पीतल, पर उसके अंदर कुछ और भी था, क्योंकि जब मैंने उन्हें हल्का टकराया, तो आवाज़ पीतल जैसी नहीं, फ़ौलाद जैसी थी।
एक नट पर मैंने परत उतारी थी। उसके अंदर रघुवीर नाम खुदा था।
मैंने अब सोचा — अगर एक के अंदर नाम है, तो दूसरे के अंदर क्या है?
मैंने दूसरा नट उठाया। उसे पत्थर पर रखा और दूसरे पत्थर से धीरे-धीरे मारा। एक बार नहीं। दस बार। बीस बार। रात के सन्नाटे में वो आवाज़ बहुत तेज़ लग रही थी, इसलिए मैंने अपनी जेब से वो तेल में डूबा रुमाल निकाला और उसे नट पर लपेटकर मारा। आवाज़ दब गई।
तेईसवीं बार में परत उठी।
अंदर फ़ौलाद था। और उस पर खुदा था — एक अक्षर।
र।
मैंने तीसरा टुकड़ा उठाया। उसे देखा। वो आधा था, इसलिए उस पर सिर्फ़ "र" का हिस्सा बचा था।
तीनों एक ही हाथ के थे। यानी कोई एक आदमी इन्हें बना रहा था। कोई एक आदमी इन्हें गाड़ियों में लगा रहा था। और वो आदमी चाहता था कि जो भी इन्हें खोले, वो नाम पढ़े।
मेरे पापा गाड़ियों में अपना नाम नहीं छिपाते थे।
वो अपना नाम छिपाकर नहीं लिखते थे।
वो लिखते थे, ताकि कोई उसे ढूँढ सके।
मैंने कॉपी बंद की और पीछे लेट गया।
आसमान साफ़ था। दूर टोल की लाइट इतनी तेज़ थी कि उसके पीछे तारे दिखने बंद हो गए थे। मुझे लगा अगर मैं आँख बंद कर लूँ, तो मुझे ट्रांसपोर्ट नगरी की हर आवाज़ याद है — किस गली में कौन सा ट्रक रात भर खड़ा रहता है, किस ढाबे का बर्नर कितने बजे बंद होता है, किस नाके पर पहरेदार कब जगता है।
पर आज रात मैंने सिर्फ़ एक आवाज़ सुनी।
वो आवाज़ जो कल दस बजे मेरे सामने बैठेगी और मुझे "बेटा" कहेगी।
मैंने आँखें बंद कीं और मैंने अपने मन में एक-एक करके उन सवालों की लिस्ट बनाई जो मैं पूछूँगा। कम से कम सवाल। क्योंकि मुझे पता था — उस कमरे में जो ज़्यादा बोलेगा, वो हारेगा।
मैंने सिर्फ़ तीन सवाल तय किए।
पहला — मेरे पापा आख़िरी बार इस कमरे में कब आए थे?
दूसरा — उस वक़्त उनके हाथ में क्या था?
तीसरा — और वो चीज़ अब कहाँ है?
फिर मैं सो गया।
भोर में चार बजकर दस मिनट पर मुझे आवाज़ ने उठाया।
नहीं, आवाज़ नहीं। आवाज़ों की कमी ने।
ढाबे के पीछे जो नीम का पेड़ है, उस पर हमेशा कुछ चिड़ियाँ रहती हैं। वो रोज़ चार बजे शुरू होती हैं। आज भी शुरू हुईं, पर उनकी आवाज़ में एक चीज़ कम थी — जैसे कोई नीचे खड़ा हो और उन्हें चुप करा रहा हो।
मैं उठा।
नीम के नीचे कोई नहीं था।
पर ढाबे के दरवाज़े के बाहर, मिट्टी पर, ताज़ा पान की पीक का लाल निशान था। और उसके पास चप्पल की एड़ी का निशान। बस इतना। कोई शब्द नहीं।
मैंने पानी पिया और मुँह धोया। फिर मैं बेंच पर बैठ गया और मैंने अपनी घड़ी देखी — पापा की घड़ी। पाँच मिनट आगे। हमेशा पाँच मिनट आगे। मैंने उसे ठीक नहीं किया। मैंने कभी नहीं किया।
पाँच बजे नैना आई। उसके हाथ में एक छोटी सी काली चीज़ थी — क्लिप वाला माइक, जिसे जेब में लगाया जा सकता था।
"ये सिर्फ़ आवाज़ लेगा।" उसने कहा। "दो घंटे की बैटरी है। तेरी कमीज़ के अंदर, जेब के पास लगा लेना।"
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