A Dark Secret62 / 536

A Dark Secret – Chapter 62

7 min read November 6, 2026

मूँछों वाले आदमी का चेहरा बदल गया। वो इंजन के पास आया, कुछ सुना, फिर हँसा। ऐसी हँसी जिसमें दो दिन की थकान थी।

"अरे, ये तो चल गई।"

"चलेगी।" मैंने कहा। "पर दो दिन तक रोज़ सुबह चलाने से पहले पाँच मिनट खड़ी रखना, बिना गैस दिए। लाइन खुद साफ़ हो जाएगी। और वो फ्यूल पंप की झिल्ली बदल दे — वो अब भी थकी हुई है।"

मैंने झिल्ली और दो ताँबे की वॉशर उसके हाथ में रख दी। एक वॉशर उसी वक़्त मैंने गाड़ी में लगा दी थी, दूसरी जेब में रह गई।

उसने जेब से पैसे निकाले। देखे, गिने, और तीन सौ रुपये मेरी हथेली पर रख दिए।

"तीन सौ।" उसने कहा। "कम है, पर अभी इतना ही है।"

"ठीक है।" मैंने कहा।

"नाम क्या है तेरा?"

"अर्जुन।"

उसने सिर हिलाया, जैसे नाम याद रखने की कोशिश कर रहा हो। फिर वो गाड़ी की तरफ़ मुड़ा और मैंने उसे पुकारा।

"सुन।"

वो रुका।

"तेरी गाड़ी की आवाज़ बदल गई है। अब वो पहले जैसी नहीं है। अगर कभी कोई और इसे चलाए और ये तुझे वैसी ही लगे — तो समझ लेना, उसने कुछ बदला है।"

वो समझा नहीं। पर बूढ़े ने समझा। बूढ़े ने जूट की बोरी से टिन का डिब्बा निकाला, जिसमें दो सूखी रोटियाँ थीं, और मेरी तरफ़ बढ़ाया।

"ले। तेरे हाथ का काम देख लिया।"

"भूख नहीं है।" मैंने कहा।

"तो रख ले। भूल जाने के लिए।"

मैंने रोटी ले ली। भूख नहीं थी, पर लेने से इनकार करना ठीक नहीं लगा।

मैंने वहीं, पीपल की छाँव में बैठकर तीन सौ के हिसाब बिठाए। सबसे पहले कॉपी निकाली, पन्ना खोला, और पेंसिल से लिखा — आज, बाईपास, हरी गाड़ी, डीज़ल लाइन की हवा, ढाई घंटे, तीन सौ।

फिर मैंने बाँटा।

अस्सी रुपये डीज़ल के। गाड़ी में तेल आधा रह गया था, और मुझे रघुवीर को सुबह के लिए तैयार रखना था।

अस्सी रुपये कबीर के हिस्से के। वो पुर्ज़ों की दुकान चलाता है, और मैंने पुर्ज़े उसी से लिए थे। बाक़ी पैसे उसके खाते में लिखे जाने थे, पर ये अस्सी अलग थे — कल दोनों की बात हुई थी कि जो काम मैं उसके पुर्ज़ों से करूँगा, उसमें से उसका हिस्सा जाएगा। उसने मुझे मजबूर नहीं किया था। मैंने खुद कहा था। आदमी को अपनी बात पर टिकना चाहिए, वरना साझा क्या करना।

और बीस रुपये जुगनू के। उसका हिस्सा यही था। वो नापता है, गिनता है, याद रखता है, और बदले में कुछ माँगता नहीं। मुझे उसके हाथ में बीस रुपये रखने थे, क्योंकि बीस रुपये में ढाबे पर दो पूरी और एक प्याज़ मिलती है, और ग्यारह साल का लड़का इतना ही चाहता है।

तीन सौ में से एक सौ अस्सी गए। बचे एक सौ बीस।

उसमें से मैंने चालीस रुपये अलग रखे — रुक्मा दीदी का चाय का उधार। चार दिन से मैं वहाँ चार कटोरे पी चुका था, दस-दस के हिसाब से, और दीदी ने कभी कुछ लिखा नहीं। उसकी कॉपी में शहर के आधे लोगों का हिसाब लिखा है, पर मेरा नाम नहीं लिखा। वो मुझे उस कॉपी में नहीं डालना चाहती थी।

बचे अस्सी। वही मेरा। पाँच मिनट आगे की घड़ी, दो तेल रुमाल, सिली कॉपी, और अस्सी रुपये। ठीक है। आज के दिन का यही भाव है।

मैंने पैसे जेब में रखे। फिर ऊपर देखा। पीपल के पत्तों में से धूप छनकर आ रही थी और मुझे लगा कि थका हुआ होना भी एक काम है, जो पूरा होने पर हल्का लगता है।

शाम चार बजे मैं रातरानी ढाबे पहुँचा। ढाबे के पीछे नीम के नीचे उलटा ढोल पड़ा था, और उस पर जुगनू बैठा था। मैंने उसके हाथ में बीस रुपये रखे। उसने एक पल पैसे देखे, फिर मुँह उठाकर मुझे देखा।

"ये किसका?"

"तेरा। चार सौ उन्नीस का हिसाब रखा था तूने, नाके का समय याद रखा था, मुड़ा कोना उठाकर लाया था। इसमें तेरा हिस्सा है।"

"मैंने तो कुछ माँगा नहीं था।"

"इसीलिए मिल रहा है।"

उसने पैसे मुट्ठी में दबा लिए और दौड़कर अपनी माँ के पास चला गया। मैंने देखा, उसकी एड़ी में अब भी वही पुरानी चोट का निशान था, और पाँव नंगे थे। सोचा, अगले महीने उसे चप्पल दिलाऊँगा। नाम नहीं लूँगा, बस दिलाऊँगा।

दीदी चूल्हे पर रोटी बना रही थी। मैंने चालीस रुपये मेज़ पर रखे।

"चाय का हिसाब।"

"क्या हिसाब?" उसने हाथ नहीं रोका।

"चार कटोरे।"

"मैंने तुझसे चाय के पैसे नहीं माँगे थे।"

"इसलिए रख रहा हूँ।"

वो एक पल रुकी। फिर तौलिया से हाथ पोंछकर मेज़ पर पैसे उठाए, अपनी कॉपी खोली, और उसमें कुछ लिखा। मैंने गर्दन तानकर देखा, पर वो मुझे दिखाने के लिए नहीं लिख रही थी।

"सात बेंच हैं।" उसने कहा। "कल सुबह आठ बजे। लकड़ी वाला सात बजे आएगा। तू उसके साथ बैठ। उसकी लकड़ी ठीक है, पर उसके हाथ में हिसाब नहीं है। जो भी बने, तू हिसाब रखना।"

"जी दीदी।"

उसने एक कटोरा चाय मेरी तरफ़ बढ़ाया। "और पी।"

मैं कटोरा लेकर बेंच पर बैठ गया। तभी ढाबे के मोड़ पर एक गाड़ी रुकी, और उसकी आवाज़ से ही मैं जान गया कि कौन है। मरून गाड़ी, आगे का बंपर अब भी टेढ़ा, और इंजन में वो हल्का-सा हकलाना जो ठीक करने पर भी थोड़ा बचा रह गया था।

बल्लू उतरा। एड़ी में दरार अभी भरी नहीं थी, इसलिए वो आधा लंगड़ाता हुआ चलता था। मुँह में पान था और आँखों में वो बात जिसका नाम मैं नहीं जानता था।

वो सीधा मेरी बेंच पर आया, मेरे बगल में बैठा, और इतनी देर तक कुछ नहीं बोला कि मैंने सोचा वो मुझसे कुछ माँगने आया है।

"दीदी।" उसने आवाज़ दी। "इसके साथ दो रोटी। मेरा हिसाब है।"

फिर मेरी तरफ़ मुड़ा।

"तूने मेरे आदमी की गाड़ी ठीक की।"

"हाँ।"

"वो कह रहा था कि तूने उससे तीन सौ लिए और लाइन की हवा निकाल दी, और उसके बाद गाड़ी पहले जैसी हो गई।"

"हो जाएगी।"

"वो ये भी कह रहा था कि तूने उसे कोई ऊपरी बात नहीं बताई, कोई ताबीज़ नहीं बेचा, कोई खोटा पुर्ज़ा नहीं लगाया। जबकि वो तीन दिन से तीन मैकेनिकों को देख चुका था, जो आधा काम करते थे और पूरे पैसे लेते थे।"

मैंने चाय का घूँट लिया।

"तो?"

"तो अब बता।" उसने कहा। "क्या चाहिए?"

मैंने कटोरा नीचे रखा और उसकी तरफ़ देखा। ढाबे की लालटेन उसके चेहरे पर ऐसी रोशनी डाल रही थी जिसमें आदमी की असली उमर दिखती है।

"तेरी जुबान।" मैंने कहा। "बस एक बार सच बोल दे।"

बल्लू हँसा। पर उसकी हँसी में डर था। ऐसा डर जो आदमी के पेट में बैठ जाता है और हँसी से बाहर नहीं आता।

"मैं मोती पर आज नहीं बोलूँगा।" उसने धीरे से कहा। "जिस दिन वो फिर चलेगी, उस दिन सब बोलूँगा। आज मोती पड़ी हुई है, और पड़ी हुई गाड़ी भी अपना हिसाब नहीं छोड़ती। उसे पहले चलना है।"

"कब?"

"जब वो चले।" उसने कहा। "बस इतना जान ले — मैंने जो सुना, वो सच है, और मैं जिससे डरता हूँ, वो भी सच है। इन दोनों के बीच मुझे एक मौक़ा चाहिए। एक दिन का।"

"एक दिन नहीं।" मैंने कहा। "जब तक तू तैयार हो।"

वो मेरी तरफ़ देखता रहा। फिर उसने सिर हिलाया और रोटी तोड़ने लगा, और उसके हाथ काँप रहे थे, और उसने छिपाने की कोशिश नहीं की। यही उसमें अच्छी बात थी। वो डरता था, पर डर को डर नहीं कहता था।

रात दस बजे मैं रघुवीर के पास पहुँचा। गाड़ी ढाबे से पीछे खड़ी थी, उसी सूनी जगह पर जहाँ सिर्फ़ मैं खड़ा करता हूँ, जहाँ पान की पीक वाला लाल निशान भी अब नहीं था।

मैंने लालटेन जलाई और सीट के नीचे हाथ डाला। वहाँ मेरी एक पुरानी कॉपी रखी थी, दो पेचकस, और एक टिन का बक्सा, जिसमें छोटे पुर्ज़े पड़े रहते थे।

मेरा हाथ किसी चीज़ पर लगा। काग़ज़। मुलायम, मोटा काग़ज़।

मैंने निकाला। पीला लिफ़ाफ़ा था। बंद, पर सीला हुआ नहीं। बस मोड़ा हुआ। उसका रंग ऐसा पीला था जैसे कोई पुराने काग़ज़ को धूप में रखकर भूल गया हो।

वेबसाइट पर अपनी पसंदीदा कहानियाँ मुफ्त पढ़ें और Story FM App पर उन्हीं कहानियों का शानदार Audio Experience लें।

यह कहानी Story FM app पर ऑडियो में भी सुनें — आगे के एपिसोड सबसे पहले वहीं आते हैं।

Audio mein suno

Apni raay likho