A Dark Secret – Chapter 53
"पचास हज़ार," मैंने दोहराया। "मेरी गाड़ी की कीमत दो हज़ार आठ सौ है, बनवारी जी। मैंने चार सौ अग्रिम दिए हैं, दो हज़ार चार सौ बाकी हैं। इसका मतलब मुझे पूरी गाड़ी से भी ज़्यादा मिल रहा है।"
"गिनती की बात नहीं है भाई।"
"गिनती की ही बात है," मैंने कहा। "मेरे यहाँ हर चीज़ गिनती की है।"
उसने रूमाल निकाला और माथा पोंछा। पसीना सिर्फ़ गर्मी का नहीं था। लू बाहर थी, पर हम छत के नीचे बैठे थे और उसकी कमीज़ के काँधे पहले से गीले थे।
फिर वो झुका।
"बस एक बात है, भाई। एक छोटी सी बात।"
"बोलिए।"
"दस बजे वाले कमरे में जो सुना, उसे भूल जा।"
मैंने उसे देखा। वो अपने गिलास को दोनों हाथों से पकड़े था, जैसे गिलास किनारा हो और वो गिर न जाए।
"आपको कैसे पता कि मैंने कुछ सुना?"
उसकी उँगलियाँ गिलास पर सफ़ेद पड़ गईं।
"भाई साहब… भाई साहब ने बताया।"
"भाई साहब ने बताया कि मैंने सुना, या भाई साहब ने अंदाज़ा लगाया कि मैं सुनूँगा?"
वो चुप।
मैंने गड्डी की तरफ़ हाथ बढ़ाया। उसकी आँखों में एक पल के लिए राहत आई। फिर मैंने गड्डी उठाई, उसे वापस उसकी तरफ़ सरका दिया, और उसके ऊपर से अपना गिलास उठाकर आख़िरी घूँट लिया।
"मेरी मज़दूरी साफ़ है, बनवारी जी," मैंने कहा। "दागदार पैसा मेरे औज़ार के साथ नहीं रहता। औज़ार में ज़ंग लग जाती है, और ज़ंग लगा औज़ार अगली बार किसी की जान ले लेता है।"
"तू मज़ाक कर रहा है।"
"मैं मज़ाक नहीं कर रहा। मैं हिसाब कर रहा हूँ।"
उसने गिलास रखा और दोनों हाथ जोड़ लिए। जोड़े हुए हाथों में भी कंपन था। मैंने देखा — उसकी बाईं कलाई पर एक पुरानी घड़ी थी जिसका पट्टा दो जगह से सिला हुआ था, और पट्टे के नीचे चमड़ा साफ़ दिख रहा था, जैसे घड़ी दस साल से एक ही जगह बैठी हो।
"बेटा," वो बोला। और आवाज़ बदल गई। वो अब मुनीम नहीं था, वो अब एक बूढ़ा आदमी था जो मेज़ पर बैठा था। "मैं तुझे धमकाने नहीं आया। मैं तो खुद डरा हुआ आया हूँ।"
मैं चुप रहा।
"मैं ग्यारह साल से बाईस नंबर टोल का हिसाब जोड़ता हूँ। ग्यारह साल। मैंने एक बार भी किसी का नाम नहीं लिखा। सिर्फ़ जोड़ा है। जमा, खर्च, बाकी। जोड़ना सीखा है, नाम लिखना नहीं।"
"तो नाम कौन लिखता है?"
उसने मुँह खोला, फिर बंद कर दिया।
"बनवारी जी, नाम कौन लिखता है?"
"जो लिखता है, वो कभी खुद नहीं आता," उसने कहा। "काग़ज़ आते हैं। बंद लिफ़ाफ़े में। मैं सिर्फ़ जोड़ता हूँ।"
"और अलमारी?"
मैंने ये शब्द ऐसे फेंका जैसे कोई पत्थर फेंकता है — बिना ताककर, बस देखने के लिए कि कहाँ गिरता है।
और जहाँ गिरा, वहाँ सन्नाटा हुआ।
उसका चेहरा नहीं बदला। पर उसकी आवाज़ बदल गई। जब भी वो अलमारी की तरफ़ आता, आवाज़ नीचे चली जाती, जैसे कोई गली में मुड़ जाए।
"वो अलमारी…" वो रुका। "वो मेरी नहीं है।"
"मैंने कब कहा कि आपकी है?"
उसने रूमाल फिर निकाला। इस बार उसने चेहरा नहीं पोंछा, बस रूमाल हाथ में पकड़कर घुमाता रहा।
"देख भाई," वो बोला, और आवाज़ में अब चापलूसी नहीं थी, थकान थी। "मैं पचास का हूँ। मेरी नौकरी इसी हिसाब से चलती है। मुझे नहीं पता कि उस अलमारी में क्या है। मुझे नहीं जानना। जो नहीं जानता, वो सो जाता है।"
"आप सोते हैं?"
वो हँसा। छोटी, सूखी हँसी। "कल रात से नहीं।"
मैंने कुछ देर उसे देखा। सच में देखा। पहली बार उस दिन मैंने उसे मुनीम नहीं, आदमी की तरह देखा। कमीज़ के कॉलर पर पसीने की सफ़ेद लकीरें थीं। चप्पल की एड़ी घिसी हुई थी। उसकी जेब से एक पुराना चश्मा आधा बाहर निकला हुआ था जिसका एक काँच चटका था।
"बनवारी जी, आप ये पैसे लेकर आए, ये आपकी मर्ज़ी थी या हुक्म?"
"हुक्म," वो बोला, बिना रुके। "और मैंने हाँ कह दिया। क्योंकि अगर मैं ना कहता, तो वो किसी और को भेजते। और जो किसी और को भेजते, वो…"
वो रुक गया।
"वो क्या?"
"वो पैसे लेकर नहीं आता। वो सीधे काग़ज़ लेकर आता है।"
मेरे हाथ ठंडे हो गए। मैंने सुना था ये बात पहले भी, किसी और मुँह से, किसी और शाम को। बूढ़े लाठी वाले की आवाज़ मेरे कान में बजी — जो रसीदें नहीं छपवाता, वो रसीदें बाँटता है।
मैंने गड्डी की तरफ़ देखा। गड्डी के चारों तरफ़ सफ़ेद धागा लपेटा हुआ था। और धागे की गाँठ के नीचे एक छोटा मुड़ा हुआ काग़ज़ दबा था।
"वो क्या है?"
उसकी नज़र वहीं गई। और उसका चेहरा बदल गया। उसने झटके से गड्डी उठाई और अपनी तरफ़ खींच ली। काग़ज़ उसकी उँगलियों से छूटकर चारपाई पर गिरा और हवा से खुल गया।
मैंने पढ़ लिया।
ऊपर कोने में बाईस नंबर टोल की मोहर। नीचे तारीख़ — सत्ताईस सितंबर। और उसके नीचे नाम की जगह खाली। रकम की जगह खाली। पर मोहर लगी हुई थी। रसीद पहले से छपी हुई थी, बस उसमें नाम भरना बाकी था।
और उस काग़ज़ का नीचे वाला दायाँ कोना मुड़ा हुआ था।
उसने काग़ज़ उठाया और जेब में ठूँस दिया। उसके हाथ इतनी जल्दी कर रहे थे कि एक पल को मुझे लगा वो मुझे भी जेब में ठूँस देगा।
"ये मेरा है," वो बोला।
"तो ले जाइए," मैंने कहा।
वो रुका। मेरी आवाज़ में कोई गुस्सा नहीं था। शायद इसीलिए वो रुका।
"तुझे पूछना नहीं है कि इसमें नाम किसका आएगा?"
"पूछूँगा," मैंने कहा। "पर आपसे नहीं। आप वो आदमी नहीं हैं जो नाम भरता है। आप वो आदमी हैं जो जोड़ता है। और जोड़ने वाले से नाम नहीं पूछते, बनवारी जी। जोड़ने वाले से जोड़ माँगते हैं।"
उसने मुझे देखा। इस बार देखने में कुछ और था। कुछ ऐसा जो मैंने उस शहर में बहुत कम देखा था।
फिर उसने गड्डी उठाई, और जैसे ही उठी, रुक्मा दीदी वहाँ से गुज़रीं।
वो मेरी थाली लेने आई थीं। उन्होंने मुनीम की तरफ़ नहीं देखा। गड्डी की तरफ़ नहीं देखा। कुछ नहीं बोलीं। बस मेरी थाली में दो रोटी रखीं, ऊपर से दाल डाली, और गरम तवे की खुशबू छोड़कर चली गईं।
जाते वक़्त उन्होंने एक बात कही, जो मुनीम के लिए नहीं, मेरे लिए थी।
"जो पैसा गिनकर नहीं आता, वो पैसा आदमी का दाम भी गिन लेता है।"
बनवारी ने गड्डी अपनी बगल में दबाई और खड़ा हो गया।
"मैं चलता हूँ।"
"चाय पूरी कर लीजिए।"
"नहीं भाई, मैं…" उसने बाहर देखा, गली के मोड़ की तरफ़, जैसे वहाँ कोई खड़ा हो और वो उसे दिख न रहा हो। "मुझे देर हो रही है।"
वो दो कदम चला। फिर रुका।
और मुझे लगा था कि अब सब ख़त्म।
वो मुड़ा। उसका चेहरा अब कुछ और था। अब वो डरा हुआ नहीं था। अब वो शर्मिंदा था।
"अर्जुन भाई, एक बात और।"
"बोलिए।"
"भाई साहब ने कहा था कि ये लड़का पैसे नहीं लेगा।" उसने मेरी तरफ़ नहीं देखा। वो अपनी चप्पल देख रहा था। "मैंने कहा था, नहीं साहब, पचास हज़ार किसी को भी तोड़ देते हैं। उन्होंने कहा, ये नहीं टूटेगा।"
मेरा गला सूख गया।
"और फिर उन्होंने कहा — इसलिए मैंने इसके लिए कुछ और भेजा है।"
"क्या भेजा है?"
उसने सिर हिलाया। "मुझे नहीं पता।" और ये वो झूठ था जो उसने उस पूरी दोपहर में सबसे साफ़ बोला। "मुझे सच में नहीं पता। मैं सिर्फ़ इतना जानता हूँ कि जो चीज़ वो भेजते हैं, वो पैसों में नहीं होती।"
वो चला गया।
मैं चारपाई पर बैठा रहा। थाली में रोटी ठंडी हो रही थी और मेरी जेब में पाँच सौ चालीस रुपये थे और मेरे सामने पचास हज़ार का अपमान रखा हुआ था जो वो उठा ले गया था।
मैंने रोटी तोड़ी। एक टुकड़ा मुँह में डाला। निगल नहीं पाया।
कुछ और भेजा है।
मेरे दिमाग़ में तीन चीज़ें एक साथ आईं। मेरी गाड़ी। मेरा काग़ज़। और मेरा नाम।
मैं उठने ही वाला था कि जुगनू फिर आया।
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