A Dark Secret – Chapter 45
“डिब्बा?” उसने पूछा। नमस्ते नहीं। क्या हाल नहीं। सीधे सवाल।
“जी।”
“उतार।”
मैंने उतारा। मेरी कमर झुकी और मैंने डिब्बा नीचे रखा।
उसने उसे उठाया। अकेले। इतना पतला आदमी और चालीस किलो का डिब्बा — उसने ऐसे उठाया जैसे कोई डिब्बा ही न हो। यही सबसे डरावनी बात थी उस आदमी में।
“रसीद?” मैंने कहा।
वो रुका। फिर मुड़ा। और मुस्कुराया। उसकी मुस्कान में दाँत कम थे और आवाज़ नरम थी, जैसे कोई बच्चे को समझा रहा हो।
“रसीद?”
“हाँ। कल भी मैंने माँगी थी। कल किसी ने नहीं दी। आज भी देनी होगी। माल मैंने ढोया है। मेरी गाड़ी, मेरा डीज़ल। गिनती में मेरा नाम होना चाहिए।”
वो हँसा। हँसी भी हल्की थी, जैसे काग़ज़ फटने की आवाज़।
“यहाँ काग़ज़ नहीं चलते बेटा,” उसने कहा। “यहाँ सिर्फ़ गिनती चलती है। एक, दो, तीन। गाड़ी आई, गाड़ी गई। काग़ज़ किसको दिखाऊँगा? काग़ज़ से माल बढ़ता है क्या?”
“काग़ज़ से उलझन घटती है,” मैंने कहा।
उसने मुझे देखा। इस बार मुस्कान नहीं थी।
“तू नया है,” उसने कहा। “बल्लू के भांजे की तरफ़ से आया है न? फिर बल्लू से ही पूछ लेना। अपनी गिनती बढ़ानी है तो गाड़ी चला, बात मत कर। बात करने वालों की गिनती यहाँ जल्दी पूरी हो जाती है।”
वो डिब्बा उठाकर अंदर गया।
और मैंने उसकी पीठ देखी, फिर गोदाम देखा, फिर अपने कान की तरफ़ ध्यान दिया।
क्योंकि अगर ये शहर मुझे कुछ सिखा रहा था, तो वो यही था — जहाँ काग़ज़ नहीं मिलता, वहाँ आवाज़ ज़रूर मिलती है।
मैंने आँख बंद की।
पहली आवाज़ — लोहे के पल्ले। भारी। जब वो गया, तो अंदर किसी ने पल्ला खींचा। दो लोहे की चादरें रगड़ीं — गर्रर्र — और फिर थप। यानी अंदर एक और दरवाज़ा है, और वो बंद हुआ।
दूसरी आवाज़ — गूँज। अंदर का कमरा खाली है। बहुत खाली। जब वो बोलता है, तो आवाज़ लौटकर आती है। कमरे में सामान कम है।
तीसरी आवाज़ — दूर किसी फ़ोन की घंटी। पुरानी घंटी। वो वाली जो लैंडलाइन बजती है — ट्रिंग, ट्रिंग, ट्रिंग — और फिर किसी ने उठा लिया। उठाने वाले ने कुछ नहीं कहा। बस सुना और रख दिया।
चौथी आवाज़ — पंखा। छत का पुराना पंखा, जिसकी बेयरिंग सूख गई है। टक… टक… टक…
पाँचवीं आवाज़ — जूते। वही पतले आदमी के जूते। एड़ी पहले गिरती है, फिर पंजा। यानी उसका चलना तेज़ है और उसे जल्दी है, हर वक़्त।
छठी आवाज़ — और ये सबसे अजीब थी। काँच। बहुत सारा काँच। जैसे कोई पूरा कमरा शीशे की शीशियों से भरा हो और हवा उनके बीच से गुज़र रही हो। टिं… टिं… टिंग…
वही आवाज़ जो मुझे रास्ते में डिब्बे से आई थी।
मैंने आँख खोली। पसीना मेरी गर्दन पर ठंडा हो रहा था।
“चार सौ उन्नीस,” मैंने धीरे से कहा।
फिर मैं गाड़ी में बैठा और रघुवीर को लेकर सड़क पर आ गया।
रास्ते में मैंने एक बात सोची। कल वाले डिब्बे में पुड़ियाँ थीं। आज वाले में शीशियाँ। दोनों एक ही जगह आ रहे हैं। दोनों एक ही आदमी के हाथ लग रहे हैं। और दोनों को कोई काग़ज़ नहीं चाहिए, क्योंकि काग़ज़ से पकड़ में आ जाते हैं।
मैं टोल की तरफ़ मुड़ा ही था कि सामने से कुछ आया।
पहले आवाज़ आई।
वो घिसाई। वो धातु की रगड़। वो टन-टन।
मैंने तुरंत गाड़ी किनारे लगाई।
सात सफ़ेद ट्रक। एक के पीछे एक। सब एक जैसे। सब पर पीछे वही नीला गोल निशान। और सबकी आवाज़ एक।
मैंने शीशा खोला और सुना।
हर गाड़ी में वही बात। जैसे कोई मशीन एक ही जगह से घिस रही हो। जैसे किसी ने सबमें एक ही ढीला नट छोड़ दिया हो। और वो टन-टन — वो हर गाड़ी में एक ताल पर थी।
सात भाई। एक ही चीख।
मेरा हाथ चाबी पर था। दिल कह रहा था — अर्जुन, पीछे लग जा। दिमाग़ कह रहा था — अर्जुन, बेवकूफ़ी मत कर। पर मैं जानता था कि मैं पीछे नहीं लगूँगा, तो रात भर करवटें बदलता रहूँगा।
मैं पीछे लग गया।
दो किलोमीटर। पाँच किलोमीटर। उनकी रफ़्तार तेज़ नहीं थी। जैसे कोई जान-बूझकर धीरे चल रहा हो। जैसे उन्हें जल्दी न हो, क्योंकि माल ऊपर से आता है और ऊपर वालों को कभी जल्दी नहीं होती।
फिर सड़क चौड़ी हुई और उन सातों ने दाएँ मुड़कर एक बड़े फाटक में घुसना शुरू किया।
फाटक पर बोर्ड था।
मैंने नज़दीक जाकर देखा।
नाम नहीं था।
कोई अक्षर नहीं। कोई कंपनी नहीं। कोई फ़ोन नंबर नहीं।
बस एक नीला गोल। बड़ा, चिकना, साफ़। और उसके नीचे तीन छोटे शब्द — जिनमें सिर्फ़ एक शब्द पढ़ा जा सकता था। बाक़ी दो धूप में ऐसे मिट गए थे जैसे जान-बूझकर मिटाए गए हों।
और बोर्ड के पीछे — काँच।
बहुत काँच।
पूरी इमारत काँच की थी। चार मंज़िल। नीली-हरी चमक। अंदर लोग दिख रहे थे, पर धुँधले। साफ़ कपड़े। कुर्ते नहीं, कोट। छोटे-छोटे काग़ज़ हाथों में।
मेरी गाड़ी उस फाटक के सामने खड़ी थी।
और मुझे अचानक एहसास हुआ कि मैं कैसा दिख रहा हूँ। तेल की कमीज़। धूल के धब्बे। घिसे जूते। हाथों पर काली लकीरें।
मैंने गाड़ी से उतरकर फाटक की तरफ़ बढ़ना शुरू किया ही था कि गार्ड आया।
सफ़ेद शर्ट, कंधे पर रस्सी, हाथ में रजिस्टर।
“कहाँ?”
“अंदर जाना है।”
“किससे मिलना है?”
मैं एक पल रुक गया। अगर मैं कहूँ सात सफ़ेद गाड़ियों का मालिक, तो ये हँसेगा। अगर मैं कहूँ मुझे माल का हिसाब चाहिए, तो ये डर जाएगा। दोनों में मेरा नुक़सान है।
“उन सात गाड़ियों के बारे में पूछना है,” मैंने कहा। “जो अभी अंदर गईं।”
गार्ड ने मेरे कपड़ों पर एक नज़र डाली। फिर मेरे जूतों पर। फिर मेरे हाथों पर। उसने नीचे ज़मीन पर थूका नहीं, पर उसकी आवाज़ ने थूक दिया।
“यहाँ हिसाब वाले लोग आते हैं,” उसने कहा। “मरम्मत वाले नहीं।”
मैं खड़ा रहा।
“मरम्मत वाले गाड़ी चलाते हैं,” मैंने कहा। “और चलाने वाले के बगैर ये हिसाब नहीं बनता।”
वो मुस्कुराया। इस तरह जैसे कोई बच्चा बड़ी बात कह दे और बड़ा बस सिर हिला दे।
“देख भाई,” उसने कहा। “मैं चौबीस घंटे का नौकर हूँ। बारह घंटे यहाँ खड़ा रहता हूँ। मुझे नाम नहीं पता, नंबर नहीं पता, मालिक नहीं पता। रसीद देखकर अंदर जाने देता हूँ। तेरे हाथ में रसीद है?”
“नहीं।”
“तो फिर मेरे काम में दख़ल मत दे। और सुन — अगर तेरे पास अंदर से कोई काग़ज़ है, तो जेब में रख और पलट जा। यहाँ ऐसी चीज़ें न आतीं।”
मैंने सिर हिलाया। पलटा।
पर पलटने से पहले मैंने एक आवाज़ सुनी — फाटक के पीछे, काँच की इमारत के अंदर से। सात गाड़ियों में से एक ने इंजन बंद किया, और उसके बंद होने की आवाज़ दूसरों से मिल गई।
टन।
फिर सन्नाटा।
और उस सन्नाटे में, बहुत दूर, किसी खिड़की से किसी का हँसना आया। ऊपर से। शायद तीसरी मंज़िल से। कमरा वहाँ था जहाँ हँसी गूँजती नहीं, दब जाती है।
मैं गाड़ी की तरफ़ चला।
रास्ते में मेरी नज़र इमारत के किनारे लगे एक छोटे से सफ़ेद पत्थर पर पड़ी। उस पर काले रंग में कुछ लिखा था — किसी लाइन की तरह।
मैं झुका। पढ़ा।
एक तारीख़ थी। सताईस।
बस। और कुछ नहीं।
मैंने गाड़ी स्टार्ट की। मेरे हाथ ठंडे थे और मेरा गला सूख रहा था, पर मैंने खुद से कहा — अर्जुन, अभी रोना नहीं। अभी गिनना है।
गिनती। वही शब्द जो पतले आदमी ने कहा था।
मैं गोदाम की तरफ़ लौटा, क्योंकि उस रास्ते से मुझे टोल का रास्ता छोटा पड़ता था। और जैसे ही गोदाम की गली का मोड़ आया, मैंने ब्रेक दबा दिया। बिना सोचे।
क्योंकि गली में एक गाड़ी खड़ी थी।
फटा मफ़लर।
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