A Dark Secret – Chapter 300
रात के ग्यारह बजे मेरी ड्यूटी शुरू होती है। अस्पताल के इमरजेंसी वार्ड के बाहर वही पुराना स्ट्रेचर खड़ा था, जिसका पहिया हमेशा बाईं तरफ़ खींचता है। मैंने वर्दी की जेब टटोली — नोटबुक थी, पेंसिल थी, और रिया की तस्वीर डैशबोर्ड पर चिपकी थी। रोज़ की तरह।
पहली कॉल आधी रात से पहले आई। शांति विहार, मकान नंबर चार सौ नौ। एक बूढ़े आदमी को साँस नहीं आ रही। मैंने गाड़ी स्टार्ट की और सीट बेल्ट खींची।
शांति विहार जाने के लिए पड़ाव वाली गली से होकर जाना पड़ता है। वह गली जो नई कॉलोनी को पुराने बाज़ार से जोड़ती है। पिछले महीने उस गली में एक औरत रहती थी। रीना। चाय की दुकान चलाती थी, छोटी सी। उसकी आवाज़ ऊँची थी, हँसती थी तो गली के नुक्कड़ तक सुनाई देती थी। अब उसके घर के बाहर नाम का पट्टा नहीं है। सिर्फ़ कीलों के चार निशान हैं जहाँ पट्टा लगा था। दीवार पर धूल जमी है और पट्टे की जगह चौकोर साफ़ है।
मैंने गाड़ी रोकी नहीं। मरीज़ पहले। यही सीखा है इस नौकरी में।
पर जैसे ही गाड़ी उस घर के सामने से गुज़री, खिड़की से एक महक आई। स्याही की। थोड़ी फँसी हुई, थोड़ी मीठी। जैसे पुराने कागज़ पर गोंद लगी हो। मैंने खिड़की बंद कर दी और एक्सीलेटर दबा दिया।
शांति विहार में बूढ़े आदमी का परिवार पहले से दरवाज़े पर खड़ा था। उसकी बेटी रो रही थी, दामाद फोन पर किसी को बुला रहा था। मैंने स्ट्रेचर खोला, बूढ़े को उठाया। वज़न ज़्यादा नहीं था, हड्डियाँ ही हड्डियाँ। ऑक्सीजन लगाई और गाड़ी में डाला।
रास्ते में बूढ़े की बेटी पीछे बैठी थी, बूढ़े का सिर उसकी गोद में था। अचानक उसने पूछा, "दीदी, पड़ाव वाली गली में जो चाय की दुकान चलाती थी, उसका नाम क्या था?"
मैंने रियरव्यू मिरर में देखा। मेरा दिमाग़ खाली हो गया। मुँह खोला, पर नाम नहीं आया। कुछ सेकंड रुकी। फिर बोली, "पता नहीं। कभी गई नहीं उधर।"
झूठ। मैं महीने में चार बार उस गली से गुज़रती हूँ। उस औरत की चाय भी पी है। पर उस वक़्त नाम याद नहीं आया। बिल्कुल नहीं।
अस्पताल पहुँचकर हमने बूढ़े को इमरजेंसी में डाला। डॉक्टर ने देखा, नर्सें दौड़ीं। मैं बाहर आकर स्ट्रेचर को कोने में खींच रही थी कि वह पहिया फिर बाईं तरफ़ मुड़ गया। मैंने ज़ोर लगाया, तभी नज़र ड्यूटी रजिस्टर पर पड़ी जो काउंटर पर खुला रखा था।
पुराने रजिस्टर में नाम लिखे थे। आज के पन्ने पर। पर वहाँ कुछ अजीब था। एक नाम था — "रीना, पड़ाव गली"। मैंने आँखें मलीं। वह नाम वहाँ नहीं होना चाहिए था। आज की ड्यूटी में उस गली से कोई कॉल नहीं आया था। पर नाम वहाँ लिखा था, किसी पुरानी स्याही से, जैसे कोई जानबूझकर जोड़ गया हो।
मैंने पूछा काउंटर पर बैठी नर्स से, "यह नाम किसने लिखा?"
उसने देखा और सिर हिलाया। "कौन सा नाम? यहाँ तो कुछ नहीं है।"
मैंने देखा। वह लाइन खाली थी। साफ़। जैसे कभी थी ही नहीं।
मैं कुछ देर वहीं खड़ी रही। फिर अपनी जेब से नोटबुक निकाली और लिखा — "रीना, पड़ाव गली, चाय की दुकान।" पेंसिल से, मोटे अक्षरों में। मुझे नहीं पता था क्यों लिख रही हूँ। पर लिखा।
रात भर मैं बेचैन रही। दो और कॉल आए। एक बच्चे को बुखार था, एक बूढ़ी औरत गिर गई थी। काम में ध्यान नहीं लग रहा था। बार-बार उस गली की महक याद आ रही थी। स्याही और गोंद।
सुबह पाँच बजे मैंने गाड़ी अस्पताल के बाहर खड़ी की। बेंच पर एक बूढ़ा आदमी बैठा था। अड़सठ के आसपास, सफ़ेद बाल, भूरी जैकेट, जेब से पान मसाला की खुशबू। झुका हुआ बैठा था, जैसे कोई उसका इंतज़ार कर रहा हो।
मैं गाड़ी से उतरी। उसने सिर उठाया।
"तू मीरा है?"
मैं रुक गई। "आप कौन?"
"रामदीन।" उसने जेब से पान निकाला। "पहले इस अस्पताल की एम्बुलेंस चलाता था। अब कोई काम नहीं देता। पर बैठा रहता हूँ।"
मैं उसके पास बैठ गई। क्यों, पता नहीं। शायद थकान थी, शायद उसकी आवाज़ में कुछ था जो रुकने को कह रहा था।
"पड़ाव वाली गली से आई थी रात को?" उसने पूछा, आसमान देखते हुए।
"हाँ। मरीज़ था।"
"वहाँ से गुज़रते वक़्त कुछ अजीब लगा?"
मैंने उसकी तरफ़ देखा। "आपको कैसे पता?"
उसने जवाब नहीं दिया। पान चबाया। फिर धीरे से बोला, "कुछ नाम हवा में रहते हैं। गाड़ी में नहीं।"
"मतलब?"
"मतलब, जो नाम तेरे कागज़ में नहीं, वो तेरे दिमाग़ में रहता है। पर ज़रूरी नहीं कि वो तेरा हो।"
मैं समझी नहीं। पूछना चाहा, पर वह उठ खड़ा हुआ। जेब से एक और पान निकाला और बोला, "सुबह की ड्यूटी में जाने से पहले रजिस्टर देख लेना। तेरा पन्ना।"
वह चला गया। धीरे-धीरे, झुककर। मैं उसे देखती रही जब तक वह गेट से बाहर नहीं निकला।
मैं अंदर गई। ड्यूटी रजिस्टर उठाया। पहला पन्ना। जहाँ रात की ड्यूटी वालों के नाम होते हैं। मेरा नाम।
वहाँ नहीं था।
सुबह आते वक़्त मैंने अपना नाम खुद लिखा था। ड्यूटी पर हाज़िरी। पर अब उस लाइन में सिर्फ़ खाली जगह थी। मेरा नाम गायब। जैसे कभी था ही नहीं।
मैंने उँगली उस जगह पर फेरी। कागज़ सूखा था। पर महक आ रही थी। स्याही और गोंद की।
मैं वहीं खड़ी रही। बाहर आसमान सफ़ेद हो रहा था। और मेरे हाथ में वह रजिस्टर था जिसमें मेरा नाम नहीं था।
मुझे उस वक़्त नहीं पता था कि यह सिर्फ़ शुरुआत थी।
मैंने रजिस्टर बंद कर दिया। हाथ काँप रहे थे। मैंने एक लंबी साँस ली और खुद से कहा — मीरा, तू दो साल से इस एम्बुलेंस में है। नींद नहीं आई है। बस इसीलिए ये सब हो रहा है।
पर पैर वहीं जमे थे।
तभी पीछे से आवाज़ आई, "मीरा?" सुपरवाइज़र चड्ढा जी थे। हाथ में चाय का कप। "तू अभी तक गई नहीं? तेरी ड्यूटी खत्म हो गई।"
मैंने रजिस्टर उनकी तरफ़ बढ़ाया। "सर, यहाँ मेरा नाम था। सुबह लिखा था। अब नहीं है।"
उन्होंने रजिस्टर देखा। पन्ना पलटा। फिर मेरी तरफ़ ऐसे देखा जैसे मैंने कोई मज़ाक किया हो। "तो लिख दे ना। कलम रखी है।"
"सर, मैंने लिखा था। सच में।"
"मीरा।" उन्होंने चाय की चुस्की ली। "तुझे पता है, रात की ड्यूटी में कितने लोग ऐसे होते हैं जो रजिस्टर में अपना नाम छोड़ ही नहीं पाते। बच्चा, तीन कॉल, दो मरीज़, एक मौत। दिमाग़ थक जाता है। जा, सो जा।"
मैंने कुछ नहीं कहा। चड्ढा जी की बात में दम था। शायद मैंने लिखा ही नहीं था। शायद मैंने सोचा था कि लिखा है।
मैं बाहर आई। रामदीन वाली बेंच खाली थी। मैं घर गई, पाँच घंटे सोई, और शाम को फिर ड्यूटी पर आई।
ड्यूटी रजिस्टर पर नज़र डाली। आज के पन्ने पर मेरा नाम लिखा था। साफ़, नीली स्याही से। सुप्रिया, ड्यूटी क्लर्क, ने लिखा था। मैंने छोड़ दिया। होता है।
रात नौ बजे पहली कॉल आई। पड़ाव वाली गली। दोबारा।
मेरा हाथ रिसीवर पर जम गया।
"मीरा? सुन रही है? बोल ना।"
मैंने गला साफ़ किया। "हाँ, बोलिए।"
"एक बूढ़ी औरत, फ्लैट नंबर तीन, पड़ाव गली। दो दिन से कोई खबर नहीं। मकान मालिक ने दरवाज़ा खटखटाया, अंदर से आवाज़ नहीं आई। पता नहीं ज़िंदा है या नहीं।"
मैं गाड़ी में बैठी। सहकर्मी सलीम बगल में बैठा। मैंने गाड़ी स्टार्ट की।
पड़ाव वाली गली में घुसते ही मुझे वही महक आई। स्याही और गोंद। इस बार मैंने अनदेखा नहीं किया। मैंने धीमे से गाड़ी रोकी। बाहर देखा।
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