A Dark Secret – Chapter 299
ये वो आवाज़ है जो ट्रक तब करता है जब उसके अंदर कोई पुर्ज़ा अपनी जगह से ज़रा सा सरक जाता है। इसे सुनने के लिए कान नहीं, धैर्य चाहिए। क्योंकि ये आवाज़ हॉर्न के नीचे दबी रहती है, इंजन के शोर में घुल जाती है, और जब तक कोई उसे पहचान न ले, वो चीखती नहीं, बस रेंगती है।
मैंने सुना — पीले ट्रक के आगे के पहिये के पास, जहाँ कल मैंने ताँबे की चपटी वॉशर बदली थी, अब वहाँ सन्नाटा है। साफ़ सन्नाटा। घिसाई खत्म।
दूसरा आया — हवा का रिसाव।
वो पतली, सीटी जैसी आवाज़, जो इंजन के कोने से निकलती है जब कोई नट ढीला रह जाए। रिसाव की आवाज़ बहुत ईमानदार होती है। वो कहती नहीं — "मैं हूँ"। वो बस फुसफुसाती है — "मैं आ रही हूँ।"
मैंने सुना। कोई फुसफुसाहट नहीं। नट कसा हुआ है। पीतल का वो नट, जो मुझे इंजन के कोने में ढीला मिला था और जिसके अंदर से निकला था फ़ौलाद का वो दूसरा नट, जिस पर पापा का नाम खुदा था — वो अब अपनी जगह पर है, और वो अपनी जगह पर कसा हुआ अच्छा लगता है।
और फिर तीसरा।
तीसरा वो हिस्सा है जो बाक़ी सबको सिर्फ़ शोर लगता है।
ये सबसे मुश्किल है। इसे समझाना मुश्किल है। जब कोई ट्रक हँसता है — हाँ, ट्रक हँसते हैं — तो उसकी हँसी अंदर से आती है, इंजन के चारों कोनों से, एक साथ। और जब वो खाँसता है, तो खाँसी आगे के हिस्से से आती है, और उसमें एक झटका होता है, जैसे किसी ने गला साफ़ किया हो।
मेरा बूढ़ा शेर अब न हँसता है, न खाँसता है।
वो बस चलता है।
और उसका चलना — उसका चलना इतना साफ़ है कि मैंने आँखें बंद करके ही देख लिया। धातु अपनी जगह। हवा अपनी जगह। इंजन अपनी जगह। कोई टें-टें नहीं। कोई घरघराहट नहीं। कोई ठक-ठक नहीं।
बस एक धीमी, गहरी, भरोसेमंद साँस।
जैसे कोई बूढ़ा आदमी सुबह उठकर कहे — हाँ, आज ठीक हूँ।
मैंने आँखें खोलीं।
नीचे सड़क पर रोशनी आ चुकी थी। टोल की बत्तियाँ अब पीली नहीं, सफ़ेद लग रही थीं। कहीं दूर किसी ने अपनी गाड़ी स्टार्ट की और उसकी आवाज़ सुबह के सन्नाटे में ऐसे गिरी जैसे पानी में पत्थर।
मैंने पीछे मुड़कर देखा।
कबीर खड़ा था, ट्रक के पिछले हिस्से के पास। उसने अपनी कॉपी खोली थी और उसमें कुछ लिख रहा था। पेंसिल की आवाज़ आ रही थी — हल्की, जल्दी, बिना रुके।
"क्या लिख रहा है?" मैंने कहा।
उसने सिर उठाया।
"हिसाब," उसने कहा। "कल की मरम्मत, आज की चाय, कल का डीज़ल। सब।"
"क्यों?"
"क्योंकि तू भूल जाएगा।"
मैं हँसा।
"ठीक है," मैंने कहा। "लिखता रह।"
और मैंने अपनी कलाई पर फिर से देखा।
पाँच मिनट आगे।
मैंने अपनी जेब से रुमाल निकाला — वो तेल में डूबा रुमाल, जो अब दो हैं, एक मेरा और एक वो जो चाचा की जेब से निकला था। मैंने उससे अपनी उँगलियाँ पोंछीं। उँगलियों पर काली लकीरें अब भी हैं, साबुन से भी नहीं जातीं। मैंने उन्हें देखा और मुझे अच्छा लगा।
ये लकीरें मेरी डिग्री हैं। देवा के वकील ने अदालत में मुझे मज़दूर कहकर हँसा था, और मैंने कहा था — जी साहब, मज़दूर ही हूँ, और यही मेरी सबसे बड़ी डिग्री है।
उस दिन वो वकील हँसा था। आज वो नहीं हँसता।
नीचे से आवाज़ आई।
"अर्जुन!"
नैना थी। उसने सिर ऊपर किया।
"क्या?"
"तू ऊपर बैठकर क्या करता है? सच बता।"
मैं थोड़ा हिला। लोहे की पट्टी ठंडी थी और उसकी ठंडक पैरों से ऊपर चढ़ रही थी।
"सुनता हूँ," मैंने कहा।
"क्या सुनता है?"
"पहले धातु की घिसाई।"
वो खड़ी रही।
"फिर हवा का रिसाव।"
वो हिली नहीं।
"और फिर वो आवाज़," मैंने कहा, "जो बाक़ी सबको सिर्फ़ शोर लगती है।"
नैना ने अपना चश्मा ऊपर धकेला।
"अब क्या सुन रहा है?"
मैं मुस्कुराया।
"अब कुछ नहीं," मैंने कहा। "अब सब ठीक है।"
वो थोड़ी देर मेरी तरफ़ देखती रही। फिर उसने सिर हिलाया, जैसे उसे कुछ समझ आ गया हो, और वो लौट गई।
मैंने कटोरा उठाया। चाय ठंडी हो चुकी थी। मैंने फिर भी पी ली। ठंडी चाय का भी अपना स्वाद होता है — अदरक अब भी मुँह में रहता है, बस ज़ोर से नहीं।
नीचे हॉर्न फिर बजे।
पहला बल्लू का। फिर रवि का। फिर सोनू का, जो नींद में ही हॉर्न पर हाथ रखकर सो गया है।
मैंने आँखें बंद कीं और उन आवाज़ों के बीच अपनी गाड़ी की आवाज़ खोजी।
और वो थी। नीचे, मेरे पैरों के नीचे, धीरे-धीरे साँस ले रही थी — जैसे कोई बूढ़ा शेर जो सो रहा हो पर जिसका दिल जाग रहा हो।
बूढ़ा शेर।
पापा ने इस गाड़ी को कभी नहीं देखा। उन्होंने इसे नहीं चलाया। पर उनका नाम इस पर है — मैंने खुद सफ़ेद रंग से लिखा था, उस पुराने चबे हुए ब्रश से, जिसके बाल किसी ने कुतरे जैसे थे। दो दिन लगे थे उन अक्षरों को ठीक से बनाने में। पहले दिन "र" टेढ़ा हो गया था। मैंने पूरा मिटाया और फिर से लिखा।
अब वो लिखा हुआ है, और छह महीने की धूल के बाद भी साफ़ दिखता है।
मैंने नीचे देखा।
जुगनू कार्टन के पास बैठा था और अपनी उँगली से उस पर कुछ बना रहा था। शायद कोई घर। शायद कोई गाड़ी। वो जब भी फ़ुर्सत में होता है, काग़ज़ पर गाड़ियाँ बनाता है। उसकी गाड़ियों के पहिये हमेशा बड़े होते हैं और खिड़कियाँ हमेशा छोटी। मैंने उससे एक बार पूछा था, क्यों? उसने कहा — बड़े पहिये वाली गाड़ी कहीं भी जा सकती है।
मैंने उसकी तरफ़ देखा और मुझे लगा कि इस बच्चे ने मुझसे ज़्यादा सीख लिया है।
तभी रुक्मा दीदी ने नीचे से आवाज़ दी।
"अर्जुन, एक बात सुन।"
"बोल दीदी।"
"तेरी चाय की एंट्री मैंने आज से कॉपी में डाल दी है।"
"क्यों?"
"क्योंकि तेरा ट्रांसपोर्ट अब सिर्फ़ तेरा नहीं है। उसमें कबीर का पैसा है, मेरी चाय है, और इस बच्चे के काग़ज़ हैं।" उन्होंने जुगनू की तरफ़ इशारा किया। "जो चीज़ कई लोगों की हो, उसका हिसाब भी कई लोगों के सामने होना चाहिए।"
मैंने सिर हिलाया।
"ठीक है दीदी। जो तू कहे।"
वो मुस्कुराईं और अपने ट्रे उठाकर ढाबे की तरफ़ चल दीं। दस कदम चलकर वो रुकीं और बिना मुड़े बोलीं, "और सुन — आज शाम को बात करनी है। उस आवाज़ की। मुझे कुछ याद आ रहा है, पर पक्का नहीं।"
मेरा दिल एक बार ज़ोर से धड़का।
"क्या याद आ रहा है?"
"अभी नहीं," उन्होंने कहा और चल दीं।
मैंने उनके जाने को देखा और फिर आसमान की तरफ़ देखा।
सुबह पूरी खुल चुकी थी। कोहरा हल्का हो रहा था। दूर टोल पर गाड़ियों की लाइन बन रही थी, और उनकी आवाज़ें मिलकर एक लंबी, धीमी, चलती हुई नदी जैसी लग रही थीं।
मैंने कटोरा नीचे रखा।
मैंने अपनी हथेली ट्रक की छत पर रखी। लोहा ठंडा था, पर उसमें हल्की गरमाहट भी थी — नीचे से, इंजन से, धीरे-धीरे ऊपर आती हुई।
और मैंने धीरे से कहा।
"पापा।"
आवाज़ काँपी, पर रुकी नहीं।
"सुन रहे हो?"
नीचे सोनू ने फिर हॉर्न मारा। बल्लू ने कुछ चिल्लाया। जुगनू ने कार्टन उठाया और उसे ऊपर करके हिलाया, जैसे झंडा हिला रहा हो।
"अब ये आवाज़ बिलकुल ठीक है।"
कुछ नहीं हुआ।
कोई जवाब नहीं आया।
बस इंजन की आवाज़ थी — धीमी, गहरी, भरोसेमंद — और वो धीरे-धीरे दूर जाने लगी।
या शायद मैं उससे दूर जा रहा था।
हवा में तेल की महक थी और चाय की। दोनों मिलकर वो गंध बनाती हैं जो सिर्फ़ ट्रांसपोर्ट नगरी में होती है — जहाँ रात कभी सोती नहीं, बस आवाज़ बदल लेती है।
मैंने पापा की घड़ी फिर देखी।
पाँच मिनट आगे।
मैं हँसा।
"चलो," मैंने खुद से कहा, "देर हो रही है।"
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