A Dark Secret – Chapter 3
वो मुस्कुराया और बोला, "अर्जुन, तेरे चाचा ने तुझे याद किया है। अंदर आ जा।"
मैंने चाची की तरफ़ देखा। वो काँप रही थी।
मैंने बैग की तरफ़ देखा। तार अब भी लटक रहा था।
फिर मैंने उस आदमी की आँखों में देखा, और चाची की तरफ़ मुड़कर धीरे से कहा, "चाची, चाचा ने ये तार किसके लिए काटा था, ये मुझे पता है। अब सिर्फ़ ये बताओ — उन्होंने किसके डर से काटा था?"
चाची का चेहरा सफ़ेद पड़ गया।
॥
दरवाज़े पर खड़े आदमी ने चौखट पर हाथ रख दिया, जैसे घर पर मोहर लगा रहा हो।
"अंदर आ जा," उसने दोबारा कहा। इस बार आवाज़ थोड़ी धीमी, थोड़ी मीठी। "तेरे चाचा ने बुलाया है।"
मैंने जेब से हाथ बाहर निकाले। बिना जल्दी किए। जल्दी दिखाना ही सबसे बड़ी गलती होती है, ये मुझे पापा ने सिखाया था। जब कोई तुम्हें डराने आए, तो तुम बस इतना करो कि वो समझ जाए — तुम्हारी साँस उसकी तरफ़ से तेज़ नहीं चल रही।
"चाचा कहाँ हैं?" मैंने पूछा।
"थाने में। पूछताछ चल रही है।"
"क्यों?"
"कल रात उन्होंने एक ट्रक का काम किया था। वो पलट गया। अब पुलिस पूछेगी नहीं तो क्या करेगी।" उसने वैसे ही कहा, जैसे पूछताछ एक मौसम हो, बारिश की तरह, जो अपने आप आता है और चला जाता है।
मैंने उसका चेहरा देखा। भौंह पर कटा निशान बहुत पुराना था, पर साफ़ ऊपर उठा हुआ, जैसे किसी ने चाकू से नहीं, बस नाखून से खींचकर बनाया हो। गले में काली माला। होंठ पतले, और बोलते वक़्त वो पहले मुस्कुराता था, फिर बोलता था। ऐसे लोग बहुत कम होते हैं जो बोलने से पहले मुस्कुराएँ। आम तौर पर लोग बोलने के बाद मुस्कुराते हैं, जब उन्हें लगता है कि बात बन गई।
"अच्छा।" मैंने कहा। "तो चलिए।"
"जल्दी क्या है?" उसने हाथ नीचे किया। "चाय पी ले। दो बजे तक चलना।"
और उसी वक़्त मेरे कान ने एक आवाज़ पकड़ी।
उसकी जेब से। जब वो हाथ नीचे कर रहा था, तब जेब के अंदर धातु की हल्की खट-खट हुई। दो चीज़ें आपस में टकराईं। छोटी चीज़ें। और उसकी चाल में जो हल्की झूल आई, वो इस बात की गवाही दे रही थी कि उसकी जेब भारी है — भारी नहीं, बस तैयार।
मैंने कुछ नहीं पूछा।
पर उसकी आवाज़ में मुझे एक बात खटकी और वो मैं आज तक नहीं भूला। उसकी आवाज़ में कोई कंपन नहीं थी। बिल्कुल नहीं।
ज़िंदगी में मैंने ये देखा है — जो आदमी सच बोल रहा होता है, उसकी आवाज़ में भी एक हल्की घबराहट होती है। क्योंकि उसे भी पता नहीं होता कि सामने वाला क्या सोचेगा। सच में हमेशा एक छोटी सी हिचक होती है। झूठ में भी होती है, अगर झूठ नया हो।
पर जो झूठ बहुत पुराना हो जाए, जो रोज़ बोला जाए, वो हिचक खो देता है। उसकी आवाज़ सपाट हो जाती है, जैसे पक्की सड़क। और आप सड़क को देखकर नहीं बता सकते कि उसके नीचे क्या दबा है।
उस आदमी की आवाज़ पक्की सड़क जैसी थी।
"कालू भाई," मैंने कहा।
वो रुका। "मैंने नाम नहीं बताया।"
"आपने अभी बताया। आपने कहा — अंदर आ जा। बस। फिर जब मैंने पूछा चाचा कहाँ हैं, तब आपने गर्दन घुमाई और आपकी माला हिली। मैंने देखा।"
"तो?"
"तो आपका नाम कालू है।"
उसने मुझे देखा। लंबी नज़र। फिर वो हँसा। छोटी हँसी, जैसे किसी ने काँच का गिलास रगड़ा हो।
"तेरे चाचा भी ऐसे ही बोलते हैं," उसने कहा। "हर बात के पीछे एक चीज़। चाय, हिसाब, नाम। उन्हीं का भतीजा है तू।"
"चाचा ने कुछ और भी सिखाया है," मैंने कहा। "मेहमान को बिना चाय दिए नहीं भेजते।"
वो दरवाज़े पर ही खड़ा रहा। अंदर नहीं आया। मैंने देखा, वो आधा शरीर अंदर रखे खड़ा था, आधा बाहर। जैसे खुद को धूप में रखकर सबूत बचा रहा हो।
"दो बजे। थाना छब्बीस नंबर। काली माला वाले चौराहे से आगे, जहाँ पुराना बोर्ड है। भूल मत।"
"भूलता नहीं," मैंने कहा। "मुझे नंबर और आवाज़ें याद रहती हैं।"
वो मुड़ा। फिर वापस मुड़ा, और बिना मुस्कुराए बोला, "और हाँ, अर्जुन। उस बैग को मत छूना। उनके दिमाग़ में कुछ गड़बड़ है। पुराने आदमी हैं, कुछ भी रख लेते हैं।"
और वो चला गया। उसकी चप्पल की आवाज़ गली में धीरे-धीरे दूर गई, पर मैंने सुना — वो सीधे नहीं गया। दो कदम गया, फिर रुका, फिर गया। जैसे किसी ने उसे इंतज़ार करने को कहा हो दूर से।
मैं अंदर मुड़ा।
चाची ने मेरा हाथ पकड़ लिया। उसकी उँगलियाँ ठंडी थीं, ऐसी ठंडी जैसी गर्मी में भी धूप न लगी हो।
"अर्जुन।"
"हाँ चाची।"
"तू थाने नहीं जाएगा।"
"क्यों?"
"क्योंकि वो जानता है तू क्या देख चुका है।"
मैंने धीरे से अपना हाथ छुड़ाया, फिर उसका हाथ अपनी हथेली में ले लिया। उसकी हथेली में छाले थे। चूल्हे के। और एक जगह जला हुआ निशान भी, बहुत पुराना।
"चाची, मैं थाने जाऊँगा," मैंने कहा। "पर पहले उस ट्रक के पास।"
"क्यों?"
"क्योंकि क्रेन आने वाली है। जैसे ही ट्रक उठेगा, सब नीचे आ जाएगा। धूल, तेल, सब। फिर कुछ नहीं मिलेगा।"
वो मेरी आँखों में देखती रही। फिर बोली, "तेरे पापा भी ऐसे ही बोलते थे। पहले काम, फिर बात।"
"अच्छी आदत है。" मैंने कहा।
"अच्छी नहीं है।" उसकी आवाज़ टूटी। "उनकी वजह से ही वो अब यहाँ नहीं हैं।"
कमरा एक पल के लिए चुप हो गया। चूल्हे की लौ चटकी। दीवार पर टँगी घड़ी का काँटा एक बजे पर अटका था और वहीं अटका रहना चाहता था।
मैंने बैग उठाया। चाची ने पकड़ने की कोशिश की, पर मैंने पहले ही बैग बंद कर दिया था।
"चाची, सुनो। ये बैग तुम चूल्हे के पीछे रख दो। कोई पूछे तो कहना, चाचा का बैग गैराज में ही है। अगर चाचा आ जाएँ, तो उनसे कहना — अर्जुन टोल नाके के पास गया है, ट्रक देखने।"
"तू किसी को बता देगा तो…"
"मैं किसी को कुछ नहीं बताऊँगा," मैंने कहा। "मैं तो सिर्फ़ सुनता हूँ।"
उसने मेरा चेहरा देखा, जैसे किसी पुराने काग़ज़ पर लिखी तारीख़ पढ़ रही हो। फिर उसने मेरा माथा चूमा। बस एक बार। उसके होंठ काँप रहे थे।
"जा," वो बोली। "पर अंदर मत उलझना।"
मैं गली में निकला। धूप सिर पर पड़ी तो लगा जैसे किसी ने गरम तवा रख दिया हो। मेरी घड़ी पाँच मिनट आगे चलती है, इसलिए मेरे हिसाब से दो बजने वाले थे। असल में एक बज रहा था। मुझे पाँच मिनट पहले पहुँचना था। पाँच मिनट में बहुत कुछ होता है। ये बात मुझे उस दिन समझ आई, पर आगे।
टोल नाके के पास वाली सड़क पर भीड़ अब भी खड़ी थी, पर बदल चुकी थी। सुबह जो लोग डरकर देख रहे थे, दोपहर में वो मज़ा लेने लगे थे। कोई चाय लेकर खड़ा था, कोई ट्रक के नंबर पढ़ रहा था, कोई अपने बच्चे को कंधे पर बिठाकर दिखा रहा था।
ट्रक वैसे ही पड़ा था। मोती। पीली रंगत, पर धूल में ऐसी लिपटी थी कि उसका रंग पता नहीं चलता। उसका एक पहिया हवा में था, जैसे कोई जानवर करवट लेते-लेटे रुक गया हो। सामने का शीशा टूटा था और अंदर बैठी धूल धूप में चमक रही थी।
बलदेव सिंह उर्फ़ बल्लू पेड़ की छाँव में बैठा था। पैर पर पट्टी बँधी थी और हाथ में पानी का गिलास, जो वो पी नहीं रहा था, बस हिला रहा था।
मैं उसके पास बैठ गया।
"तू फिर आ गया," उसने कहा।
"मैं तो यहीं रहता हूँ अब," मैंने कहा। "कंधा बस्ती में।"
"भाग जा यहाँ से।"
"चाय पिएगा? मैं पिलाता हूँ।"
वो हँसा। छोटी हँसी, जैसे किसी ने दबे हुए मुँह से निकाला हो। "तेरे जैसा आदमी आज तक नहीं देखा। आग पकड़ी है सामान ने, और तू चाय की बात कर रहा है।"
"चाय से ही तो बात खुलती है," मैंने कहा।
उसने पानी का गिलास रख दिया। "सुना, तेरे चाचा लापता हैं?"
"कौन कह रहा है?"
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