A Dark Secret – Chapter 292
"दीदी आएँगी तो मैं खा लूँगा," मैंने कहा।
"वो आएँगी," नैना ने कहा। "उन्होंने कहा है।"
मैं जब ढाबे की तरफ़ जा रहा था, तो रास्ते में एक किनारे पर कबीर खड़ा था।
अकेला। दूर। अपनी अम्मा के हाथ में हाथ डाले, हरी लोहे की अलमारी वाले कमरे की दीवार से सटा हुआ, जैसे वो भीड़ से थोड़ा बचना चाहता हो।
मैं रुका।
हमारे बीच काफ़ी दूरी थी। बहुत लोग थे। शोर था।
मैंने उसकी तरफ़ देखा।
उसने मेरी तरफ़ देखा।
और मैंने सिर्फ़ हल्का सा सिर हिलाया। बस इतना। कोई हाथ नहीं। कोई हँसी नहीं। कोई "कबीर भाई" नहीं।
उसने भी सिर हिलाया।
शांति देवी ने मेरी तरफ़ देखा। उनके चेहरे पर वो बहुत शांति थी, जो सिर्फ़ उन लोगों के चेहरे पर होती है जिन्होंने बहुत साल एक ही डर के साथ साँस ली हो। उन्होंने मुझे देखा और उनके होंठ हिले। मुझे कुछ सुनाई नहीं दिया। पर मुझे लगा कि उन्होंने कहा — धन्यवाद।
मैंने भी सिर हिलाया।
ये हमारी पहली बात थी। और ये बिना आवाज़ के हुई थी।
मुझे लगा कि पापा को यही पसंद आता। वो भी बहुत कम बोलते थे।
रात आठ बजे की गाड़ी आई।
मैं ढाबे के बाहर बेंच पर बैठा था, हाथ में मिट्टी का कटोरा था और कटोरे में आधी चाय बची थी। सामने भीड़ अब भी थी, पर वो टूट चुकी थी। लोग जा रहे थे। कोई ढोल को छू रहा था, कोई बच्चे को उठा रहा था।
और तभी मैंने उसे सुना।
मैंने पहले उसकी गाड़ी सुनी।
एक जीप। पुरानी नहीं, नई भी नहीं। उसका इंजन किसी ने अभी सुबह सर्विस कराया था, क्योंकि उसकी घरघराहट में एक नई सी सफ़ाई थी। उसके पीछे का एक टायर अंदर से अलग बोल रहा था, हवा कम थी। और उसके ब्रेक की जो आवाज़ थी, वो किसी ने ढीली छोड़ी हुई थी।
मैंने अपना कटोरा नीचे रख दिया।
जीप आई और ढाबे के सामने रुकी।
उसमें से दो सिपाही उतरे और पीछे का दरवाज़ा खोला।
देवा भाई बाहर आए।
उनके हाथ में अब हथकड़ी थी। उनका सफ़ेद कुर्ता अब साफ़ नहीं था और उनका चश्मा भी जेब में नहीं था। उन्होंने एक बार ढाबे की तरफ़ देखा। रुक्मा दीदी बाहर खड़ी थीं, हाथ में लोहे का लंबा चमच, और उन्होंने देवा की तरफ़ देखा और उनका चेहरा नहीं बदला।
फिर देवा ने मेरी तरफ़ देखा।
मैं बेंच पर बैठा था। मैं उठा। मैं उनके पास गया। सिपाही ने रोका नहीं। शायद वो समझ गया।
हम दोनों आमने-सामने खड़े थे।
उनकी आवाज़ बहुत धीमी थी, और पहली बार उसमें वो मिठास नहीं थी जो मुझे हमेशा सबसे ज़्यादा डराती थी।
"तूने मेरा बेटा ले लिया," उन्होंने कहा।
"मैंने तेरा बेटा नहीं लिया," मैंने कहा। "तेरे बेटे ने खुद तुझसे दूर आना चुना। ये फ़र्क़ है।"
वो हँसे। एक छोटी हँसी, जैसे किसी पुराने मज़ाक की आख़िरी लाइन।
"तू अभी भी वही है," उन्होंने कहा। "ग्यारह साल पहले भी तेरे पापा ऐसे ही खड़े थे। सीधे। और बोलते भी सीधा थे।"
मेरा हाथ बंद हो गया।
"तू मेरे पापा का नाम अपनी ज़ुबान पर मत ले," मैंने कहा। और मेरी आवाज़ उल्टी धीमी हो गई थी। "तुझे हक़ नहीं है।"
देवा ने मेरी आवाज़ सुनी। उन्होंने मेरी आँखें देखीं। और फिर कुछ ऐसा हुआ जो मैंने सोचा नहीं था।
वो झुके। थोड़े से। जितना हथकड़ी ने दिया।
"मुझे पता है," उन्होंने कहा। "अब पता है।"
वो रुके।
फिर उन्होंने अपना सिर उठाया और मेरी तरफ़ देखकर कहा।
"मिलने आना। जेल में। एक बात बाक़ी है।"
मैंने कुछ नहीं कहा।
"एक बात," उन्होंने दोहराया, "जो मैंने आज भी अदालत में नहीं कही। और जो तेरे पापा ने अपनी डायरी में लिखी है, पर उसका आख़िरी पन्ना किसी ने जला दिया।"
मेरा दिल एक पल के लिए रुक गया।
"कौन सी बात?" मैंने पूछा।
देवा मुस्कुराए।
"सिमरिया कोल्ड स्टोरेज," उन्होंने कहा। "वो गोदाम तेरे पापा का नहीं था। और आठ तारीख़ को वहाँ जो फ़ाइल आएगी, वो मंसूर की नहीं है। वो उस आदमी की है जिसे आज कोई अदालत में नहीं बुला सका। वो अपना नाम कभी काग़ज़ पर नहीं लिखता। वो सिर्फ़ अपना सफ़ेद रुमाल छोड़ता है।"
मैंने एक कदम आगे रखा।
"कौन है वो?"
सिपाही ने उनका हाथ पकड़ा।
"मिलने आना," देवा ने फिर कहा, और अब उनकी आवाज़ में कुछ और था। "अकेले मत आना। और काग़ज़ लेकर आना। क्योंकि अब जो आने वाला है, वो काग़ज़ों से नहीं मानेगा।"
वो जीप में बैठ गए।
दरवाज़ा बंद हुआ।
जीप चली और उसकी रोशनी ढाबे की दीवार पर एक पल के लिए पड़ी और फिर खिसक गई।
मैं वहीं खड़ा रहा।
और तभी मुझे पीछे से किसी का हाथ मेरे कंधे पर महसूस हुआ।
नैना थी। उसके हाथ में उसका कैमरा था और इस बार उसने कुछ रिकॉर्ड नहीं किया था।
"क्या कहा उसने?" उसने पूछा।
मैंने एक लंबी साँस ली।
"कहा कि एक बात बाक़ी है," मैंने कहा। "और कहा कि अकेले मत आना।"
नैना ने अपना चश्मा ऊपर धकेला।
"तो अकेले नहीं जाएँगे," उसने कहा।
मैंने पीछे मुड़कर देखा।
ढाबे पर रुक्मा दीदी खड़ी थीं, चमच हाथ में। उनके पीछे अमरीक सिंह खाली कटोरे जमा कर रहा था। और दूर, बेंच के पास, जुगनू अपने कार्टन वाले काग़ज़ को सीने से लगाए सो रहा था, उसका सिर एक पुराने टायर पर रखा था।
ग्यारह साल पहले पापा अकेले गए थे।
आज नहीं जाएँगे।
मैंने अपनी कलाई पर पापा की घड़ी देखी। वो पाँच मिनट आगे थी।
हमेशा की तरह।
मैंने ढाबे की तरफ़ कदम बढ़ाया।
और पीछे मुड़कर एक बार बूढ़े शेर को देखा, जो अंधेरे में खड़ा था, अपनी एक हेडलाइट जलाए, जैसे कोई चुपचाप रास्ता दिखा रहा हो।
॥
रुक्मा दीदी ने मेरे हाथ में गरम मिट्टी का कटोरा पकड़ाया और कहा, "पी ले। और सो जा। तीन दिन से तेरी आँखें लाल हैं।"
"देवा ने कुछ कहा था," मैंने कहा।
"कल सुन लेंगे।" उन्होंने चमच कटोरे में डाला। "जेल आज नहीं खुलता। मुलाक़ात का दिन कल है। और मैं तुझे अकेले नहीं जाने दूँगी।"
"मैं अकेला नहीं जाऊँगा," मैंने कहा।
रुक्मा दीदी रुकीं। उन्होंने मेरी तरफ़ देखा, फिर नैना की तरफ़, जो बेंच पर बैठी अपने कैमरे का ढक्कन खोल-बंद कर रही थी।
"अच्छा," वो बोलीं। "तो ठीक है।"
उस रात मैं ढाबे की बेंच पर सोया। पीछे आँगन में बूढ़ा शेर खड़ा था, एक हेडलाइट जलाए, जैसे वो भी सोने से मना कर रहा हो।
सुबह जब मैं उठा, नैना ने मेरे हाथ में पानी की बोतल दी और कहा, "जेल का रास्ता मुझे पता है। सुबह दस बजे से पहले पहुँचना होगा, वरना लाइन लग जाती है।"
"तू अंदर चलेगी?" मैंने पूछा।
"अंदर एक-एक आदमी जाता है। मैं बाहर बैठूँगी।" उसने चश्मा ऊपर धकेला। "पर मैं उसके पीछे-पीछे दो दिन से लगी हूँ। एक सवाल मुझे पूछना है और वो मैं पूछूँगी।"
"कौन सा सवाल?"
"विक्रम राठौर कहाँ है।"
जेल की दीवार पीली थी और ऊपर सुरक्षा की तार बिछी थी। गेट पर लोहे का एक बड़ा ताला था जो ऐसे लटक रहा था जैसे दिन में एक बार ही खुलता हो।
अंदर ले जाने से पहले एक बूढ़ा हवलदार मेरी जेबें टटोलने लगा।
"फ़ोन?"
"नहीं है।"
"काग़ज़?"
मैंने एक पल सोचा।
"काग़ज़ नहीं है," मैंने कहा।
वो मेरी आँखों में देखने लगा। मैंने अपनी आँखें नहीं हटाईं। फिर उसने सिर हिलाया और आगे बढ़ गया।
मुलाक़ात का कमरा लंबा था। बीच में ज़ंग लगी सलाखें थीं, और सलाखों के दोनों तरफ़ एक-एक लंबी लकड़ी की मेज़। ऊपर एक पंखा घूम रहा था, धीरे-धीरे, जैसे उसने भी हार मान ली हो।
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