A Dark Secret – Chapter 258
"क्या?"
उसने बैग में हाथ डाला। एक छोटा-सा प्लास्टिक का डिब्बा निकाला। उसके अंदर से एक काग़ज़ निकाला — फोटोकॉपी।
"ये," उसने कहा, "तेरे पापा की फाइल का पहला पन्ना है — जो मैंने मोहन जोशी की फाइल से निकाला था।" उसने मेज पर रखा। "इसके नीचे, कोने में, एक फोन नंबर है।"
मैंने देखा।
नंबर वही था। आठ अंक। पहला नौ, दूसरा आठ।
"यही नंबर," मैंने कहा।
"तब तेरे पापा इस नंबर तक पहुँच चुके थे," नैना ने कहा। "और शायद यही वजह है कि तेरे पापा अब तक हैं नहीं।"
हवा सन्न थी। गैराज में एक पुराना पंखा छत से लटका था, जो घूमता नहीं था। बाहर गली में कोई कुत्ता भौंका। जुगनू ने अपनी गर्दन मेरी तरफ़ करके देखा — वो समझ रहा था।
"भाई," उसने कहा। "तू सिमरिया कब जा रहा है?"
"आज रात," मैंने कहा।
"आज रात?" नैना ने कहा। "अभी तक —"
"अभी तक हम पीछे चल रहे थे," मैंने कहा। "हर बार जब हम एक काग़ज़ खोलते थे, वो हमारे सामने एक काग़ज़ और रख देते थे। आज हम एक नाम जानते हैं जो उन्होंने नहीं जाना — सिमरिया कोल्ड स्टोरेज। अगर हम आज रात नहीं पहुँचे, तो कल वो नाम जल जाएगा।"
"मैं साथ चलूँगी —"
"नहीं," मैंने कहा। "तू यहाँ रुकेगी। रुक्मा दीदी के पास। टीटू के पास। फ़ाइल तेरे पास। अगर मैं तीन दिन तक न लौटूँ —"
"अर्जुन।"
"अगर मैं तीन दिन तक न लौटूँ —" मैंने दोहराया, "तो तू काग़ज़ों की चार पैकेट लेकर सीधे दिल्ली जाएगी। दिल्ली मीडिया। किसी भी स्टूडियो के बाहर खड़ी हो जाएगी। किसी भी रिपोर्टर को रोकेगी। तेरी एक बात पहुँचनी चाहिए — सिमरिया कोल्ड स्टोरेज।"
नैना ने देखा। उसके चश्मे के पीछे कुछ था — गुस्सा नहीं, कुछ और।
"अगर मैं तीन दिन तक न लौटूँ," उसने धीमे से कहा, "तो मैं चार पैकेट लेकर सीधे उस गोदाम पर जाऊँगी, तेरे पीछे — दिल्ली नहीं।"
"नैना —"
"अब बहस मत कर," उसने कहा। "तू अपना काम कर, मैं अपना।"
मैंने देखा। उसके हाथ में काग़ज़ था — उसके हाथ काँप रहे थे। वो डर रही थी। पर वो डर उसकी आवाज़ में नहीं था।
मैंने सिर हिलाया।
"फ़ाइल यहीं रहेगी," मैंने कहा।
"हाँ।"
"और ये।" मैंने कबीर की पर्ची उठाई। "ये मेरी जेब में रहेगी।"
नैना ने देखा। "क्यों?"
"क्योंकि," मैंने कहा, "अगर मुझे किसी चीज़ की ज़रूरत पड़ी — किसी आदमी को कायल करने की — तो मैं उसे ये दिखाऊँगा और कहूँगा कि ये उसके बेटे ने लिखा है। और अगर वो नहीं मानेगा, तो मैं उससे पूछूँगा कि तू उस आदमी से भी ज़्यादा डरा हुआ है जो तेरा खून है।"
जुगनू ने अपनी पट्टी को सहलाया। "भाई, तू बहुत बोलने लगा है।"
"क्यों?"
"पहले तू कम बोलता था। ज़्यादा सुनता था। अब बोलने लगा। मुझे डर लगता है।"
मैं हँसा।
"तेरे पैर ठीक हो जाएँ," मैंने कहा। "फिर मैं कम बोलने लगूँगा।"
वो हँसा। उसकी हँसी में कोई झिझक नहीं थी — बच्चे की हँसी होती है, जिसे कोई गाड़ी स्टार्ट होने पर हँसी आती है, वजह नहीं पूछते।
मैंने फ़ाइल बंद की। रबर के बैंड लगाए। उसे अपने थैले के पास रखा।
फिर मैंने बाहर देखा।
आसमान में हल्की लाली थी। सड़क पर एक तरफ़ से आवाज़ आ रही थी — कोई ट्रक टोल की तरफ़ जा रहा था, भारी, धीमा।
मैंने कान उठाए।
उसकी आवाज़ में वो बात थी। वो छोटी-सी अजीब बात जो कल रात भी थी — जब उस गाड़ी ने टोल के पास से गुज़रते हुए हवा में नौसादर और तेल की बू छोड़ी थी।
मैंने जुगनू की तरफ़ देखा।
"जुगनू," मैंने कहा। "तेरे पैर अभी सही नहीं हैं। पर तेरे कान ठीक हैं?"
"हाँ भाई।"
"तो उस गाड़ी की आवाज़ सुन।" मैंने दरवाज़े की तरफ़ इशारा किया। "बोल — क्या सुनाई दे रहा है?"
जुगनू ने आँख बंद की। चेहरा सख़्त हुआ। फिर धीरे से बोला — "भारी है। धीमी है। पीछे से आ रही है। पर —" उसने आँख खोली। "भाई, इसमें एक आवाज़ ऐसी है जो बाकी ट्रकों में नहीं होती। बासी है, जैसे टिन का डिब्बा हिल रहा हो।"
मैंने देखा।
फिर मैंने कॉपी खोली।
सत्रहवें पन्ने पर, उस लाइन के नीचे जो मैंने अभी लिखी थी — "सिमरिया कोल्ड स्टोरेज" — मैंने एक और पंक्ति जोड़ी।
"और आज सुबह की गाड़ी — भारी, धीमी, बासी टिन की आवाज़। वही थी जो कल रात थी। वही जो पिछले पंद्रह दिन से हर सुबह टोल की तरफ़ से गुज़रती है। कोई एक गाड़ी है जो हर सुबह शहर से सिमरिया जाती है।"
मैंने पेन रखा।
नैना ने देखा। "अर्जुन, तू क्या कह रहा है?"
"मैं ये कह रहा हूँ," मैंने कहा, "कि उस गाड़ी में जो डिब्बे हैं, वो गोदाम से आए हैं और गोदाम में जा रहे हैं। हमें उस गाड़ी के साथ जाना है। आज रात नहीं। आज सुबह।"
"आज सुबह —"
"आज सुबह," मैंने दोहराया। "उसकी आवाज़ अभी यहीं है। वो टोल नाके पर खड़ी होगी। अगर मैं अभी निकलूँ, तो उसके पीछे लग सकता हूँ।"
"तू पागल है —"
"नैना, मेरे पास वक़्त नहीं है। जब वो गाड़ी सिमरिया पहुँचेगी, वो गाड़ी खाली हो जाएगी। फिर उसमें कुछ नहीं मिलेगा। अगर मैं उस डिब्बे को उस गाड़ी में देख लूँ — उसी वक़्त, उसी जगह — तो वो सबूत होगा जो कोई नहीं मिटा सकता।"
नैना ने मेरी आँखों में देखा। वो जानती थी कि मैं जानता हूँ कि मैं क्या कर रहा हूँ।
"मैं साथ चलूँगी," उसने कहा।
"नहीं।"
"अर्जुन —"
"नैना।" मैंने उसका हाथ पकड़ा। "अगर तू मेरे साथ उस गाड़ी पर चढ़ेगी, और मुझे कुछ हो गया — तो काग़ज़ों का कोई सिरा नहीं रहेगा। तू यहाँ रुक। तेरे पास काग़ज़ हैं। तेरे पास कैमरा है। तेरे पास फ़ाइल है। अगर मैं शाम तक न लौटूँ, तू वही करेगी जो तूने कहा।"
"मैं तेरे पीछे आऊँगी —"
"तू मेरे पीछे नहीं आएगी। तू मेरे पहले आएगी।" मैंने उसकी तरफ़ देखा। "तू उस कोल्ड स्टोरेज के बाहर खड़ी होगी, कैमरा चालू। मैं अंदर। अगर कोई मुझे पकड़े, तो तेरे पास तस्वीर होगी। अगर कोई तुझे पकड़े, तो मेरे पास मौका होगा।"
नैना ने कुछ सोचा।
"ठीक," उसने कहा। "पर एक शर्त।"
"क्या?"
"तू अपनी घड़ी नहीं मानेगा। तू अपने कान मानेगा। और अगर तुझे लगे कि गाड़ी का आवाज़ बदल रहा है — तो तू रुक जाएगा। तू वीर बनने की कोशिश नहीं करेगा।"
मैंने देखा। उसे पता था कि मैं क्या कर सकता हूँ।
"ठीक," मैंने कहा।
जुगनू ने कराहकर कहा। "भाई, मैं भी चलूँगा।"
"तू नहीं।"
"पर —"
"तेरे पैर जले हैं। तू अभी चल नहीं सकता। और तेरे बिना मेरे पास अगली सुबह की कोई खबर नहीं होगी। तू यहीं रुक। तू रुक्मा दीदी के पास रहेगा और हर गाड़ी की आवाज़ सुनेगा। जो भी गाड़ी इस गली से गुज़रे, तू उसे गिनेगा। तेरा काम है — सुनना और गिनना।"
जुगनू ने देखा। "और तू क्या करेगा?"
"मैं सिमरिया जाऊँगा," मैंने कहा। "और वहाँ से जो लाऊँगा, वो मेरे पास होगा।"
मैं उठा। थैला उठाया। कॉपी जेब में रखी। पापा की घड़ी देखी — पाँच मिनट आगे।
फिर मैंने नैना की तरफ़ देखा।
"एक बात," मैंने कहा।
"क्या?"
"अगर आज शाम मैं न लौटूँ —" मैंने रुककर कहा, "तो उस फ़ाइल में जो कबीर ने लिखा है, वो किसी को दिखा देगी। किसी रिपोर्टर को। किसी को भी — पर दिखा देगी।"
"क्यों?"
"क्योंकि," मैंने कहा, "अगर मैं खुद उस लड़के को माफ़ नहीं कर पाता — तो कम से कम दुनिया को पता रहे कि उसने कोशिश की थी।"
नैना ने देखा। उसकी आँख में कुछ आया, फिर चला गया।
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