A Dark Secret – Chapter 249
मैंने कुछ देर सोचा — और यह सोचते हुए मेरी आँखों के आगे अम्मा का आँगन आया, चूल्हा, और वो पुरानी अलमारी जिसमें पापा की एक टोपी और एक जोड़ी चप्पल रखी है।
"मेरी अम्मा," मैंने कहा। "और मेरी बहन।"
रुक्मा दीदी उठीं।
"तो अब एक काम कर," उन्होंने कहा। "अम्मा को फ़ोन कर। और उससे ये मत पूछ कि गोदाम में क्या था।"
"तो क्या पूछूँ?"
"ये पूछ," उन्होंने कहा, "कि उस दिन पापा घर से किस वक़्त निकले थे। और ये कि उस रात के बाद किसने उनकी अलमारी से कुछ निकाला था।"
मैंने फ़ोन निकाला। समय देखा — ग्यारह बजकर बीस मिनट। अम्मा इतनी रात तक जागती नहीं। पर उस दिन वो जाग रही थी — मुझे पता था, क्योंकि जब भी मुझे कोई बड़ी मुसीबत घेरती है, अम्मा का फ़ोन पहले बजता है। आज नहीं बजा था।
मैंने फ़ोन जेब में रख लिया।
"सुबह करूँगा," मैंने कहा। "अभी वो सो रही होगी।"
"अच्छा," रुक्मा दीदी ने कहा। और फिर, थोड़ा रुककर — "अर्जुन।"
"हाँ?"
"अगर तेरे पापा सिमरिया के गोदाम में उस दिन थे," उन्होंने कहा, "तो उनकी मौत दिल्ली के ट्रक से नहीं जुड़ी। वो किसी और चीज़ से जुड़ी है। और वो चीज़ तेरे घर के पास है।"
मैंने सिर हिलाया।
"मुझे पता है," मैंने कहा।
"तो तू वहाँ जाएगा?"
"नहीं," मैंने कहा। "अभी नहीं।"
"क्यों?"
"क्योंकि अगर मैं अभी सिमरिया गया," मैंने कहा, "तो वो मुझे वहीं इंतज़ार करते मिलेंगे। और मैं तैयार नहीं हूँ।"
मैंने जले ट्रक की तरफ़ देखा। छत बैठ गई थी। डिब्बा काला था। इंजन तो पहले से ही नहीं था — मैंने इसे दो हज़ार आठ सौ में सिर्फ़ इसलिए खरीदा था क्योंकि यार्ड में कोई और इसे उठाने को तैयार नहीं था, और मुझे उसकी छत की बनावट देखकर लगा था कि इसके अंदर कोई चीज़ छिपाने के लिए बनी है।
आज उसने अपना काम किया।
पर उसकी क़ीमत हथेली और एक बच्चे का पैर थी।
"जुगनू," मैंने कहा।
"हाँ, सर।"
"तूने आज मुझे बचाया।"
"कैसे?"
"ये कहकर कि तू मुझे उठा नहीं सकता," मैंने कहा। "अगर तू ये न कहता, तो मैं दीवार मारता, हाथ तोड़ता, और उसके बाद तेरे पैर का इलाज कौन करता?"
जुगनू ने कुछ सोचा। फिर उसने कहा —
"सर, आप भी मुझे बचाते हैं। बराबर है।"
मैं हँसा। इस बार हँसी थोड़ी बड़ी थी।
फिर मैंने नली उठाई और उसे अपने औज़ार थैले में रखा — कपड़े में लपेटकर, ऊपर से फिर काग़ज़, और काग़ज़ के ऊपर राख की परत, जैसे कोई चीज़ मुर्दा हो।
"अब सुन," मैंने रुक्मा दीदी से कहा। "कल सुबह से पहले ये चीज़ें यहाँ से निकलेंगी। फोटो और रिपोर्ट की तीन कॉपी चाहिए, और तीन जगह।"
"कहाँ?"
"एक आपके पास," मैंने कहा। "एक नैना के पास। और एक… एक उस आदमी के पास जिसे मैंने आज तक भरोसे में नहीं रखा।"
"कौन?"
मैंने ढक्कन उठाया और उन्हें दिखाया — ज़ंग के नीचे खुरचे दो अधूरे अक्षर।
"यही सोच रहा हूँ," मैंने कहा।
फिर मैंने टॉर्च बंद कर दी।
अंधेरे में मैंने एक बार आँखें बंद कीं और कान लगाकर सुना।
गैराज का लोहा ठंडा होकर चटक रहा था — टक। टक। बार-बार।
जैसे कोई दूर से किसी को नाम से बुला रहा हो।
और उस चटक के बीच मुझे लगा कि उन तीन आदमियों में से एक की धीमी आवाज़ अभी भी मेरे कान के अंदर बैठी है, और वो कह रही है — "भाई साहब ने बच्चों के लिए नहीं कहा।"
मैंने आँखें खोलीं।
"दीदी," मैंने कहा। "एक बात पूछूँ?"
"पूछ।"
"अगर कोई आदमी अपने आदमी भेजकर किसी के ट्रक में आग लगवाए," मैंने कहा, "तो वो उस ट्रक में क्या ढूँढ रहा था?"
रुक्मा दीदी ने मेरी तरफ़ देखा। टॉर्च बंद थी, पर गली की बत्ती का पीला प्रकाश उनके चेहरे पर पड़ रहा था।
"वो ढूँढ नहीं रहा था," उन्होंने कहा। "वो जानता था। वो बस ये देखना चाहता था कि तूने उसे निकाला या नहीं।"
"तो फिर उसने आग क्यों लगाई?"
"क्योंकि," रुक्मा दीदी ने कहा, "अब वो जानता है कि तूने उसे निकाल लिया है।"
मैं शांत बैठ गया।
कुछ देर तक सिर्फ़ गैराज की टक-टक सुनाई देती रही।
फिर जुगनू ने कहा, बहुत धीरे, जैसे अपने आप से —
"सर, आठ तारीख़, तीन बजे, गोदाम।"
"हाँ।"
"और खेप सत्ताईस।"
"हाँ।"
"सिमरिया गोदाम।"
"हाँ।"
जुगनू ने एक गहरी साँस ली और फिर वो बात कही जो मैं खुद कहने से डर रहा था —
"सर," उसने कहा, "फिर पापा का ट्रक दिल्ली में क्यों पलटा था? अगर सब कुछ सिमरिया जा रहा था, तो पापा का ट्रक दिल्ली के नाके पर क्या कर रहा था?"
मैंने राख में हाथ डाला। गरम थी।
"यही," मैंने कहा, "अगला सवाल है।"
मैंने काग़ज़ की तरफ़ देखा और उस आख़िरी लाइन को उँगली से छुआ — बिना मिटाए, बस छुआ।
"खेप नंबर सत्ताईस — गंतव्य: सिमरिया गोदाम।"
पापा, मैंने मन में कहा, तुमने इसे छत में क्यों छिपाया?
जवाब नहीं आया। पर गैराज का लोहा एक और बार चटका — टक — और मुझे लगा कि जवाब कहीं न कहीं मेरे ही सामने, किसी पुरानी कॉपी में, किसी पुरानी रसीद पर, किसी पुरानी आवाज़ में पड़ा है।
और मुझे वो जगह ढूँढनी है।
चाहे वो जगह सिमरिया हो।
॥
राख में हाथ डालने के बाद मैंने उसी हाथ से अपनी आँखें मलीं। बड़ी गलती थी।
आँख में राख गई, पानी बहा, और जुगनू हँसा — दोनों पैर जले हुए, फिर भी हँसा।
"सर, अब आप अंधे हो गए तो मुझे गाड़ी चलानी पड़ेगी," उसने कहा।
"तू चलेगा," मैंने कहा, "तो पहले मोड़ पर हम सीधे उस काँच की इमारत के फाटक पर जाकर रुकेंगे।"
रुक्मा दीदी ने एक पुराना कपड़ा उठाकर मेरे हाथ पर बाँध दिया — वही कपड़ा जिससे उन्होंने कल कड़ाही पोंछी थी। पर आज उस पर कड़ाही की महक नहीं थी, साबुन की बू थी। मुझे लगा दीदी ने रात में इसे चुपचाप धोया है।
किसी के लिए, किसी दिन, बिना कहे।
मैंने जुगनू के दोनों पैरों पर मरहम लगाया। उसने दाँत भींचे, एक आवाज़ नहीं निकली, बस उसकी नाक से लंबी साँस निकली जैसे कोई पुरानी पाइप सीटी बजा रही हो।
"दर्द हो रहा है?" मैंने पूछा।
"नहीं," उसने कहा।
"झूठ बोल रहा है।"
"हाँ," उसने कहा। "पर आपके हाथ से ज़्यादा नहीं।"
मैं मुस्कुराया। बच्चा बड़ा हो रहा था। यही सबसे डर की बात थी।
हम गैराज के अंदर वाली पुरानी चारपाई पर बैठ गए। छत की टीन बैठ चुकी थी, आग के बाद लोहा ठंडा होकर चटक रहा था — टक। टक। जैसे कोई घर छोड़कर जा रहा हो और दरवाज़ा बंद कर रहा हो।
मैंने नली से निकली सर्वे रिपोर्ट अपनी कॉपी में रखी। पापा की हरी स्याही वाली फोटो कॉपी के आख़िरी पन्ने में। और वो दो अधूरे अक्षर — आ और ती — मैंने उँगली से एक बार छुए, फिर कपड़े में लपेट दिया।
बाहर आकाश सफ़ेद हो रहा था। रात के आख़िरी तारे गिर रहे थे, जैसे कोई ऊपर से काग़ज़ फाड़ रहा हो।
मैंने आँख बंद की और गैराज के चारों तरफ़ कान लगाया। अंदर से आग की बासी महक। बाहर से गली में पानी भरने वाले हैंडपंप की चरमर। ढाबे की तरफ़ से किसी के जूते की आहट। और बहुत दूर — टोल की तरफ़ से — एक गाड़ी की धीमी घरघराहट, जैसे कोई मुँह पर कपड़ा रखकर बोल रहा हो।
मैं उठा।
"कहाँ?" जुगनू ने पूछा।
"कुछ नहीं," मैंने कहा। "बैठ।"
वो बैठ गया। मैं गैराज के फाटक तक गया और बाहर झाँका। गली खाली थी, पर मोड़ पर पानी की एक लकीर चमक रही थी, जैसे किसी गाड़ी के पहिये अभी-अभी गए हों। और उस लकीर के किनारे कुछ काला पड़ा था — छोटा, चपटा।
मैंने उठाया। रबर की चप्पल का जला-फटा टुक्कड़। नीचे काली चिकनी मिट्टी चिपकी थी।
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