A Dark Secret – Chapter 232
“क्या?”
“देख नहीं पा रही,” उसने कहा। “पर मुझे ये कढ़ाई जानी-पहचानी लग रही है। जैसे किसी मंडी के बोरे पर लगी मोहर हो।”
मैंने उसकी तरफ़ देखा। मेरी जेब में एक पीतल का नट था जिस पर फ़ौलाद के अंदर पापा का नाम खुदा था। और मेरी कॉपी में एक खाली जगह थी जिस पर मैंने लिखा था — चौथा आदमी, नाम बाक़ी।
“जब निकले, मुझे बता,” मैंने कहा। “और तब तक वो काग़ज़ अपने पास रख।”
“तू मुझ पर भरोसा करता है?”
“मैं तुझ पर भरोसा नहीं करता,” मैंने कहा। “मैं तेरे काम पर करता हूँ। और ये दो चीज़ें अलग हैं, इसलिए ये ज़्यादा मज़बूत हैं।”
वो हँसी। पहली बार सुबह से।
नौ बजे मैंने अपनी साइकिल उठाई और जुगनू को पीछे बिठाया। काँच की इमारत के फाटक पर जाना था, पर जाना नहीं था। फ़र्क़ समझ रहा था? हाँ, समझ रहा था। कबीर की पर्ची पर लिखा था — सुबह नौ बजे काँच के दफ़्तर के फाटक पर पहुँचना। पर मैं उस फाटक पर खड़ा नहीं होना चाहता था जहाँ मेरा नाम किसी काग़ज़ पर नहीं, और उनका कैमरा हर आदमी पर था।
हम उस पुराने पेड़ के पीछे रुके जो काँच की इमारत से पहले सड़क के किनारे खड़ा है। जुगनू ने अपनी उँगली से गिनना शुरू किया।
“एक सफ़ेद, दो सफ़ेद, तीन सफ़ेद…” वो फुसफुसाया। “सात सफ़ेद। सब खड़ी हैं। सबके पीछे वही नीला गोल निशान, भैया। नंबर कहीं नहीं।”
“अंदर कौन गया?”
“दो आदमी। एक सफ़ेद कुर्ता, एक पतला।” उसने गर्दन आगे की। “और एक तीसरा। जो सबसे आख़िर में उतरा। उसने सड़क की तरफ़ देखा, जैसे किसी का इंतज़ार कर रहा हो।”
“कैसा दिखता था?”
जुगनू ने कंधे उचकाए। “दूर था। पर वो खड़ा रहा, भैया। बाक़ी सब अंदर चले गए, वो दो मिनट बाहर खड़ा रहा। फिर अंदर गया।”
मैंने उस पल को अपनी कॉपी में लिखा। सुबह नौ बजे, काँच की इमारत, तीसरा आदमी, दो मिनट बाहर।
फिर हम टोल की तरफ़ गए। दस बजे का बुलावा था। मोटे आदमी ने कहा था कि दस बजे आ जाना। मैं गया। ग्यारह बजे तक खड़ा रहा। कोई नहीं आया।
टोल का बूढ़ा गार्ड आया और मेरे पास रुका। उसने अपनी लकड़ी की टॉर्च ज़मीन पर टिका दी। उसकी आँखें चारों तरफ़ घूमीं, फिर वो बोला —
“आज कोई नहीं आएगा।”
“क्यों?”
“क्योंकि जो बुलाता है वो कभी नहीं आता,” उसने कहा। “आने वाले तो हम होते हैं।”
वो जाने लगा, फिर रुका। उसने अपनी जेब से एक मुड़ा हुआ काग़ज़ निकाला और मेरे हाथ में दिया। उसका हाथ काँप रहा था।
“दीवार में चौथी ईंट के पीछे था,” उसने फुसफुसाया। “मैंने पढ़ा नहीं। मैं सिर्फ़ डिलीवरी करता हूँ, बाबू। डिलीवरी करने वाले को पढ़ना नहीं चाहिए।”
“अंकल,” मैंने कहा, “आपको कोई डरा रहा है?”
“मेरी बेटी स्कूल जाती है,” उसने बस इतना कहा। “दूसरी गली के स्कूल में। सुबह सात बजे।”
और वो चला गया। मैं उसकी पीठ देखता रहा। मैंने काग़ज़ खोला।
उस पर टाइप किए तीन छोटे वाक्य थे। अट्ठाईस सितंबर। सुबह नौ बजे। गोदाम के पीछे। नीचे कोने पर वही फीका नीला गोल निशान।
मैंने काग़ज़ मोड़कर जेब में रखा। मेरी जेब में अब एक धमकी, एक न्योता और एक तारीख़ थी। तीनों एक ही आदमी की लिखाई लग रही थी।
शाम को मैं गैराज में था। बूढ़ा शेर का पिछला हिस्सा खोलकर मैंने उसकी गियर बॉक्स की तरफ़ हाथ डाला। तेल में डूबे हाथ से मैंने एक बोल्ट घुमाया और सुना। घरघराहट कम हो गई थी, पर पूरी नहीं गई थी। तीन जगह घिसाई थी। एक जगह हवा का रिसाव। और तीसरी आवाज़ — वो गहरी ठन-ठन जो इंजन के कोने से आती थी।
मैं उसी ठन-ठन पर झुका हुआ था कि गैराज के फाटक पर एक परछाई पड़ी।
कबीर था। उसके हाथ में चार भूरे पैकेट बँधे थे, ऊपर से सूती धागा लिपटा हुआ।
“चार कॉपी,” उसने कहा और पैकेट मेज़ पर रखे। “एक तेरे, एक नैना के, एक रुक्मा दीदी के, और एक…” वो रुका।
“और एक?”
“एक उस आदमी के,” उसने कहा। “जिसे तू बाद में चुनेगा। जिसे तू सबसे आख़िर में भरोसा देगा।”
मैंने उसकी तरफ़ देखा। उसने अपनी नीली शर्ट की बाँह से माथा पोंछा। उसके हाथ में कैलकुलेटर नहीं था। आज उसके हाथ खाली थे और यही सबसे डरावनी बात थी।
“कबीर,” मैंने कहा, “तू ठीक है?”
“अम्मा ने पूछा,” उसने धीरे से कहा। “कि तू रोज़ रात कहाँ जाता है। मैंने कहा, दुकान के काम से।”
“और उसने क्या कहा?”
“उसने कुछ नहीं कहा।” कबीर ने नीचे देखा। “वो बस मेरा हाथ पकड़कर बैठ गई। दो मिनट। और मुझे लगा कि वो सब जानती है। हर बात। मेरा नाम, मेरा पुराना नाम, और ये भी कि मैं कहाँ से आया हूँ।”
मैंने अपने तेल वाले हाथ रुमाल से पोंछे और उसके पास आकर खड़ा हो गया।
“कबीर, अगर तू हटना चाहता है,” मैंने कहा, “तो हट जा। मैं तुझे नहीं रोकूँगा। चार कॉपी मुझे दे दे, बस।”
वो उठा। उसने मेरी तरफ़ देखा और उसकी आँखों में वो चीज़ थी जिसका नाम मुझे नहीं पता था। डर नहीं, शर्म नहीं। कुछ और।
फिर बाहर गली में गाड़ी की आवाज़ आई। कोई पुरानी गाड़ी नहीं थी। इंजन गरम था, पर चालक ने उसे बंद नहीं किया। ठंडा होने का इंतज़ार कर रहा था, जैसे उसे पता हो कि ज़्यादा देर नहीं रुकना है।
कबीर का चेहरा सफ़ेद पड़ गया।
“मैं पीछे से जाता हूँ,” उसने कहा।
“क्यों?”
“क्योंकि अगर उसने मुझे तेरे साथ देख लिया,” उसने फुसफुसाकर कहा, “तो सब ख़त्म।”
मैं कुछ कहने से पहले ही वो पिछले दरवाज़े से निकल गया। दरवाज़ा बंद हुआ और गैराज में सिर्फ़ तेल की महक बची।
फाटक पर कालू खड़ा था।
उसके पीछे दो आदमी थे। दोनों लंबे, दोनों के हाथ जेब में, दोनों के जूतों में सड़क की धूल।
कालू ने अंदर क़दम रखा। उसकी कमर में बँधा काला धागा हिला। उसकी भौंह पर का कटा निशान शाम की रोशनी में और गहरा लग रहा था। और उसकी जेब में प्लायर थी। मैं सुन सकता था। ठक-ठक। ठक-ठक। जैसे कोई दरवाज़ा खटखटा रहा हो, जो खुलेगा नहीं।
“अर्जुन,” उसने कहा।
“कालू भाई,” मैंने कहा। “आइए। चाय पी लीजिए। गैराज की चाय ढाबे की चाय से बुरी होती है, पर इसमें तेल की महक आ जाती है, और वो अलग बात है।”
उसने चाय की तरफ़ देखा भी नहीं।
“अलमारी कहाँ है?”
“कौन सी अलमारी?” मैंने पूछा।
वो मेरे पास आया। दो क़दम। तीन क़दम। मेरे और उसके बीच सिर्फ़ एक खुला इंजन था।
“वो जो तूने पैंसठ हजार में खरीदी,” उसने कहा। “या बासठ हज़ार में। रकम से मतलब नहीं। अलमारी से मतलब है।”
“अच्छा,” मैंने कहा। “वो। वो सुरक्षित है।”
“सुरक्षित कहाँ है?”
“जहाँ है, वहाँ सुरक्षित है,” मैंने कहा। “ये काफ़ी है, कालू भाई। ऐसे ही हम लोग गाड़ी की चाबी किसी को नहीं देते।”
उसने अपनी जेब से प्लायर निकाला और उसे हवा में घुमाया। ठक। ठक। फिर उसने उसे इंजन के किनारे रख दिया।
“देख, लड़के,” उसने कहा। “मैं गुस्से में आकर बात नहीं करता। मैं आकर बताता हूँ। भाई साहब ने कहा है कि अलमारी वापस आए।”
“किसे?”
“हमें।” उसने कंधा उचकाया। “या जिसे वो कहें।”
“अलमारी किसने बनाई थी, कालू भाई?”
वो रुका।
“क्या?”
“मैं पूछ रहा हूँ,” मैंने कहा। “अलमारी हमारे यहाँ बनी थी क्या? मेरी दादी की थी? मेरे पापा ने बनाई? आपके भाई साहब ने बनाई? किसने बनाई? क्योंकि जो चीज़ आपने कभी नहीं बनाई, वो आपकी कैसे हो गई?”
कालू की आँखें सिकुड़ीं। उसके पीछे खड़े दोनों आदमियों ने एक-दूसरे की तरफ़ देखा।
“तू ज़्यादा मत बोल,” उसने कहा। “तेरी ज़ुबान सड़क पर चलती है, दफ़्तर में नहीं।”
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