A Dark Secret222 / 536

A Dark Secret – Chapter 222

7 min read November 6, 2026

और अब ये तारीख़ मेरे हाथ में है। पापा की लिखाई में। एक ऐसी फोटो पर जिसमें तीन लोग हैं — दो जिन्हें मैं जानता हूँ, और एक जिसका चेहरा रुमाल से छिपा है।

मेरा हाथ काँपा।

मैंने फोटो को मेज़ पर रख दिया।

फिर मैंने अपनी आँखें बंद कर लीं। मुझे लगा कि अगर मैंने आँखें खुली रखीं, तो कहीं ऐसा न हो जाए कि सब कुछ आँखों के सामने बहने लगे।

तीन पल चुप्पी।

मैंने अपनी आवाज़ वापस बुलाई। जब अर्जुन यादव की आवाज़ धीमी होती है, तो यह मतलब नहीं कि वो डर गया है। यह मतलब होता है कि वो हिसाब लगा रहा है।

नैना ने धीरे से कहा, “अर्जुन…”

“हाँ,” मैंने आँखें खोलते हुए कहा।

“तुम ठीक हो?”

“मैं ठीक हूँ,” मैंने कहा। “बस एक बात साफ़ हो गई।”

“क्या?”

“यह सत्ताईस सितंबर की फोटो है,” मैंने कहा। “पर इस फोटो में पापा ज़िंदा हैं। इस फोटो में देवा भी ज़िंदा हैं। और यह तीसरा आदमी भी। तो सवाल यह नहीं है कि इस फोटो में क्या है। सवाल यह है — ये फोटो उस रात से पहले की है या बाद की।”

नैना ने कहा, “पीछे तारीख़ लिखी है, और कुछ नहीं।”

“हाँ,” मैंने कहा। “सिर्फ़ तारीख़। साल नहीं। और यही सबसे बड़ी बात है। पापा ने सिर्फ़ तारीख़ लिखी। साल क्यों नहीं लिखा? क्योंकि उन्हें लगा कि वो इसे कभी भूलेंगे नहीं। साल लिखने की ज़रूरत ही नहीं समझी।”

जुगनू ने कहा, “भैया, अगर तारीख़ याद रखने लायक थी तो साल भी याद रहता। फिर भी उन्होंने नहीं लिखा।”

“हाँ,” मैंने कहा। “और इसका मतलब यह भी है कि यह तारीख़ उनके लिए सिर्फ़ एक दिन नहीं थी। यह उनके लिए एक चीज़ थी। जैसे कोई लाइन।”

मैंने फोटो को उठाया और उसे गौर से देखा।

तब मुझे एक और चीज़ दिखी।

पापा के पैरों के पास, ज़मीन पर, एक छोटी सी लकीर थी। कुछ ऐसा जो किसी ने ज़मीन पर लिखा हो। या कोई निशान हो। और ठीक उसी जगह पर, पापा के जूते के किनारे, एक और चीज़ थी — बहुत छोटी। एक गोल सी चीज़, जो लोहे जैसी लग रही थी।

मुझे याद आया — पापा के औज़ार थैले में मुझे एक फ़ौलाद का नट मिला था। और उस पर रघुवीर खुदा था।

क्या हो अगर यह वही जगह हो? क्या हो अगर यह वही फोटो हो जहाँ पापा ने उसे गिराया था?

मेरे मुँह से बस एक बात निकली —

“नैना, कल सुबह हमें इस फोटो की कॉपी करनी है।”

“क्यों?”

“क्योंकि अब चार लोगों के पास होनी चाहिए — मेरेमैंने उसका हाथ नहीं थामा। मेरा हाथ हवा में ही रुक गया, जैसे किसी ने बीच रास्ते में ताला लगा दिया हो।

मैंने अपनी जेब में पड़ी उस पुरानी पीली पर्ची को याद किया — इस आदमी के पास सबका काग़ज़ है, इससे अकेले मत मिलना। पापा की हरी स्याही मेरी आँखों के सामने तैर गई।

तो मैंने हाथ नहीं बढ़ाया। बस उसकी आवाज़ सुनने लगा।

और वो आवाज़ अजीब थी। बहुत धीमी। इतनी धीमी कि मुझे लगा कि हर शब्द उसने पहले से किसी काग़ज़ पर लिख रखा है और अब बस पढ़ रहा है। जैसे कोई बच्चा किताब से पढ़ता है, पर इस आदमी के चेहरे पर बच्चे जैसी कोई बात नहीं थी।

“तुमने आज बहुत बड़ा जोखिम लिया है, बेटा,” उसने कहा।

“जोखिम?” मैंने कहा। “साहब, मैंने तो नीलामी में बोली लगाई थी। उसमें जोखिम कहाँ?”

उसने अपना चश्मा उतारा। उसके हाथ बहुत साफ़ थे। इतने साफ़ कि मुझे अपनी उँगलियों की काली लकीरें याद आ गईं, जो साबुन से भी नहीं जातीं।

“जो अलमारी तुमने खरीदी है,” उसने कहा, “उसमें कुछ ऐसे काग़ज़ हैं जो बहुत ताक़तवर लोगों के ख़िलाफ़ गवाही दे सकते हैं।”

मैंने अपनी जेब में पड़ी उस चाबी को महसूस किया। वो अब भी ठंडी थी। मैंने सोचा, अगर ये आदमी इतनी आसानी से काग़ज़ों की बात कर रहा है, तो इसके पास उनका पता है। और अगर इसे पता है, तो ये काग़ज़ किसी काम के हैं।

“साहब,” मैंने मुस्कुराकर कहा, “मैं तो मज़दूर हूँ। मुझे काग़ज़ों से ही मतलब है। जान से नहीं।”

वो हँसा। पर उसकी हँसी में वो बात नहीं थी जो आम आदमी की हँसी में होती है। जैसे किसी ने हँसने की आवाज़ रिकॉर्ड करके बजा दी हो।

“अच्छा है,” उसने कहा। “पर याद रखना, जो काग़ज़ तुमने उठाए हैं, वो बहुत भारी हैं। इन्हें संभालना आसान नहीं।”

“कितने भारी?” मैंने पूछा।

वो रुका। उसने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखें मुझ पर टिकी थीं, पर लग रहा था कि वो मेरे पीछे कुछ और देख रहा है। जैसे मेरे पीछे खड़े लोगों की गिनती कर रहा हो।

“इतने भारी,” उसने कहा, “कि जो उन्हें उठाता है, वो कभी दोबारा सीधा नहीं चल पाता।”

मेरे पीछे जुगनू खड़ा था। मुझे उसके पैरों की हरकत सुनाई दे रही थी। वो डर गया था। और नैना ने अपना कैमरा सीने से लगा रखा था। मुझे उसकी साँस तेज़ सुनाई दे रही थी।

“साहब,” मैंने कहा, “इतनी भारी चीज़ें आप आसानी से बोल रहे हैं। मतलब आपने उन्हें उठाया है।”

उसके चेहरे पर कुछ हुआ। बहुत छोटा सा। एक पल के लिए उसकी भौंह हिली। फिर वो फिर से वैसा ही हो गया, जैसे पानी में पत्थर गिरा और लहर खत्म हो गई।

“मैं तो बस सलाह दे रहा हूँ,” उसने कहा। “बड़े लोगों से उलझना ठीक नहीं होता।”

“बड़े लोग कौन, साहब?” मैंने पूछा।

वो मुस्कुराया और अपनी जेब से चश्मा निकालकर पोंछने लगा। उसकी आवाज़ उतनी ही धीमी रही, पर अब उसमें एक अलग बात थी। जैसे कोई शिक्षक आख़िरी बार समझा रहा हो।

“तुम्हारे पापा ने भी एक बार यही सवाल पूछा था,” उसने कहा।

मेरे अंदर कुछ ठंडा हो गया। जैसे किसी ने मेरी रीढ़ पर बर्फ़ की लकीर खींच दी हो।

“आप मेरे पापा को जानते थे?” मैंने पूछा।

“जानता था,” उसने कहा। “अच्छा आदमी था। पर कभी-कभी अच्छे आदमी भी ग़लत सवाल पूछ लेते हैं।”

वो अपनी गाड़ी की तरफ़ मुड़ा। वो गाड़ी यार्ड के बाहर खड़ी थी। सफ़ेद रंग की, बड़ी, चमकदार। उसके बोनट पर धूल का एक कण भी नहीं था। मुझे पता था कि उस गाड़ी का इंजन कैसा बोलता है — बहुत नरम, बहुत चुप। ऐसी गाड़ी जिसे आवाज़ करने की ज़रूरत नहीं पड़ती।

उसने दरवाज़ा खोला और बैठने से पहले मुड़कर मुझे देखा।

“एक बात और,” उसने कहा। “तुम्हारे हाथ में जो चाबी है, वो अलमारी के बाहर के ताले की है। अंदर का ताला किसी और के पास है। और वो आदमी उसे कभी नहीं देगा।”

वो गाड़ी में बैठ गया। गाड़ी चली, बिना किसी शोर के। जैसे कोई साया गुज़र गया।

मैंने अपनी साँस रोकी हुई थी। मैंने उसे छोड़ा। मेरे कान गरम हो रहे थे। मैंने पीछे मुड़कर देखा। नैना के चश्मे के पीछे उसकी आँखें बड़ी थीं। जुगनू मेरे पैरों के पास खड़ा मुँह खोले हुए था। रुक्मा दीदी दरवाज़े पर खड़ी थीं, और उनके हाथों में पीतल का एक छोटा सा टुकड़ा था, जिसे वो बेवजह उलट-पलट रही थीं।

“ये आदमी कौन है?” नैना ने पूछा। उसकी आवाज़ में वो तेज़ी लौट आई थी जो रिपोर्टर की आवाज़ में होती है।

मैंने एक गहरी साँस ली। मेरे हाथ में चाबी थी, जो मेरी हथेली की गरमी से अब ठंडी नहीं लग रही थी।

“यही तो वो आदमी है,” मैंने कहा, “जिसका नाम किसी काग़ज़ पर नहीं है।”

“काग़ज़ पर नहीं है?” नैना ने कहा। “तो कहाँ है?”

“लोगों के डर में,” मैंने कहा। “किताबों में नहीं, लोगों के डर में लिखा है।”

नैना ने अपना कैमरा नीचे किया। उसने उस गाड़ी की तरफ़ देखा जो अब दूर जा रही थी।

“तुम्हें उसकी आवाज़ में कुछ अजीब लगा?” मैंने पूछा।

“सब कुछ अजीब लगा,” उसने कहा। “वो रुकता नहीं था। जैसे हर शब्द उसने पहले से तय कर रखा हो।”

“हाँ,” मैंने कहा। “और सबसे अजीब बात यह थी कि जब उसने मेरे पापा का ज़िक्र किया, तो उसकी आवाज़ में कोई कंपन नहीं थी। बिल्कुल नहीं। जब कोई इंसान किसी मरे हुए आदमी का नाम लेता है, तो आवाज़ में कुछ तो होता है। उसकी आवाज़ में कुछ नहीं था।”

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