A Dark Secret – Chapter 213
"दीदी," मैंने कहा। मेरी आवाज़ भारी हो रही थी। "ये मोहर… ये मोहर मेरे पापा की डायरी वाले रजिस्टर पर भी है। ये अमरीक भाई की अस्पताल पर्चियों पर भी है। और ये…" मैं रुक गया। "ये वही मोहर है जो उस अलमारी के असली ताले पर है।"
रुक्मा दीदी ने एक लंबी साँस ली, बहुत लंबी, जैसे ग्यारह साल से वो साँस कहीं अंदर फँसी हुई थी और अब बाहर आ रही हो।
"मतलब," उन्होंने धीरे से कहा, "मेरा भोला किसी हादसे में नहीं गया।"
मैंने कुछ नहीं कहा। अभी कुछ कहने का वक़्त नहीं था, क्योंकि मैं जानता था कि कुछ बातें सवाल से नहीं, ख़ुद से ही पकती हैं।
उन्होंने अपना कटोरा उठाया, जो अब तक ठंडा हो चुका था, और उसमें से एक घूँट लिया — पहला घूँट, पूरी बातचीत में। फिर उन्होंने उसे वापस रखा और अपना हाथ मेरे हाथ पर रख दिया।
उनके हाथ की हथेली गरम थी, और उसमें चूल्हे की आँच और मसालों की महक थी।
"अब रो नहीं," उन्होंने कहा, और उनकी आवाज़ अचानक सख़्त हो गई, पर वो सख़्ती उस तरह की थी जिसमें लाड़ छिपा होता है — जैसे कोई कहे, ठीक से खड़ा हो जा, अब तेरे पीछे कोई नहीं है। "अब हिसाब। अगर तूने यहाँ बैठकर आँसू बहाए, तो कल उस नीलामी में वो लोग फिर जीत जाएँगे और मेरे भोला का नाम फिर उसी तरह मिट जाएगा। मैंने ग्यारह साल इंतज़ार किया है। मैं एक दिन और इंतज़ार नहीं करूँगी।"
मैंने अपनी आँखें पोंछीं। हथेली के पीछे से, बच्चों की तरह, क्योंकि कोई और तरीक़ा याद नहीं आ रहा था।
"नीलामी के काग़ज़," रुक्मा दीदी ने कहा, और अब वो वही रुक्मा दीदी थीं जिन्हें पूरा शहर जानता था — सीधी, तेज़, बिना भूमिका के। "भोला के नाम का कबाड़ लाइसेंस मेरे पास है। हर साल नवीनीकरण करवाती हूँ, मोहर लगवाती हूँ, फ़ीस भरती हूँ। मेरे पास बयालीस साल पुराना हिसाब है, पुराना पैन, पुरानी मोहर, और एक ऐसा नाम है जिसे वो लोग मरा हुआ समझते हैं।" उन्होंने कटोरा उठाया। "उन्हें ये नहीं पता कि मरे हुए आदमी का लाइसेंस भी अगर ज़िंदा औरत के हाथ में हो, तो वो लड़ सकता है।"
"दीदी, नीलामी में लड़ना आसान नहीं है। उनके पास वकील होंगे, काग़ज़ होंगे, पैसा होगा—"
"और मेरे पास क्या है, ये तुझे पता है?" उन्होंने मेरी बात काटी। "मेरे पास ग्यारह साल का इंतज़ार है, और एक ढाबा है जहाँ हर ड्राइवर ये जानता है कि अगर दीदी ने कहा तो वो अपना ट्रक सड़क पर आड़ा खड़ा कर देगा। पैसा वकील खरीद सकता है, बेटा। ड्राइवर का पेट नहीं।"
वो उठीं। मैं भी उठा। रात अब गहरी हो रही थी और हवा में ठंडक आ गई थी। रुक्मा दीदी ने ढाबे के शटर की तरफ़ इशारा किया, जो आधा नीचे आ चुका था, और फिर अपने पीछे, ढाबे के अंदर, चूल्हे की तरफ़।
वो कुछ पल चुप रहीं। उनकी आँखें चूल्हे पर टिकी थीं, और उनकी साँस धीमी हो गई थी — ऐसे जैसे कोई बहुत पुराना सवाल ज़ुबान पर आकर अटक गया हो।
"अर्जुन," उन्होंने कहा, और मेरा नाम लेने का उनका तरीक़ा बदल गया था — पहली बार वो मुझे बेटा नहीं, नाम से बुला रही थीं, जैसे अब मैं उस लायक़ हो गया था कि मुझे कुछ भारी सौंपा जाए। "एक बात है जो मैंने आज तक किसी को नहीं बताई।"
मैं रुक गया।
"उस रात," उन्होंने कहा, धीरे-धीरे, हर शब्द को सँभालकर, "भोला ने मुझे फोन किया था। गाड़ी भरी हुई थी, वो निकलने वाला था। उसने कहा — रुक्मा, सुन। और उसकी आवाज़ अजीब थी। ऐसी आवाज़ जो रोज़ की नहीं थी। मैंने पूछा, क्या हुआ? तो उसने कहा — कुछ नहीं, बस एक बात याद रखना।"
रुक्मा दीदी ने अपना हाथ उठाकर चूल्हे की तरफ़ इशारा किया। उनकी उँगली काँप रही थी, हल्की सी, और ये पहली बार था जब मैंने उन्हें काँपते देखा।
"उसने कहा — रुक्मा, अगर मैं न लौटूँ, तो चूल्हे के पीछे देख लेना।"
कमरा चुप हो गया। बाहर नीम की पत्तियाँ भी जैसे रुक गईं।
"और मैंने," रुक्मा दीदी ने कहा, और उनकी आवाज़ अब बहुत धीमी थी, "ग्यारह साल उस जगह को हाथ नहीं लगाया। ग्यारह साल। हर दिन उस चूल्हे पर रोटी बनाई, हर दिन उसके पीछे से राख निकाली, और हर दिन सोचा कि अगर वहाँ कुछ है, तो मैं उसे देखकर सह नहीं पाऊँगी।"
मैंने चूल्हे की तरफ़ देखा। पुराना, काला, चारों तरफ़ से राख और कालिख में डूबा हुआ चूल्हा, जिसके पीछे बस एक हाथ जितनी जगह थी, और जहाँ अब सिर्फ़ ठंडी राख और बासी रोटी की महक बची थी।
"अब जा," रुक्मा दीदी ने कहा, और उन्होंने मेरे कंधे पर हाथ रखा — भारी हाथ, भरोसे वाला हाथ। "कल सुबह आना। चूल्हे के पीछे हम दोनों मिलकर देखेंगे। क्योंकि वो बात मेरे भोला ने मेरे लिए छोड़ी थी — पर हिसाब तेरे पापा का है। और हिसाब अकेले नहीं निकाला जाता।"
मैंने सिर हिलाया। मेरे गले में कुछ अटका हुआ था, और उसे बाहर निकालने के लिए मैंने सिर्फ़ इतना कहा —
"दीदी, कल सुबह मैं आपके साथ चूल्हे के पीछे देखूँगा। और फिर नीलामी में हम दोनों एक साथ खड़े होंगे।"
"हाँ," उन्होंने कहा, और उनका हाथ मेरे कंधे से हटा। "अब जा। और सुन — रास्ते में कोई तुझसे कुछ पूछे, तो मुँह मत खोलना। सिर्फ़ ये कहना कि मैं ढाबे से आ रहा हूँ। ढाबे वाली औरत की बात कौन सुनता है, ये उन्हें पता है — और यही हमारा सबसे बड़ा हथियार है।"
मैं बाहर निकला। ढाबे का शटर पूरा नीचे आ गया, और अंदर से चाबी घूमने की आवाज़ आई।
मैं सड़क पर खड़ा रहा। हवा ठंडी थी, और दूर टोल की लाइटें धुँधली हो रही थीं, और कहीं एक ट्रक अपना गियर बदल रहा था — बहुत धीरे, थके हुए आदमी की तरह।
मैंने अपनी जेब से पापा की घड़ी निकाली। आठ मिनट आगे। मैंने उसे ठीक नहीं किया, क्योंकि मुझे लगा कि अब ये घड़ी मेरी नहीं, पापा की है, और अगर वो आगे चलना चाहती है, तो चले।
और मैं चल पड़ा — ढाबे से गैराज की तरफ़, नीम के पेड़ को पीछे छोड़ते हुए, उस एक वाक्य को अपने अंदर दोहराते हुए जो रुक्मा दीदी ने कहा था — ग्यारह साल, उस जगह को हाथ नहीं लगाया।
चूल्हे के पीछे क्या है, मैं नहीं जानता था। पर मुझे ये ज़रूर पता था कि रुक्मा दीदी ने आज मुझे एक चीज़ दी है जो उनके पास सबसे कीमती थी — उनका भरोसा, और उनका भोला का नाम।
और अब मेरे पास दो मरे हुए आदमियों का हिसाब था — रघुवीर यादव का और भोला का। दोनों एक ही चूल्हे की राख में छिपे थे, बस एक मुझे खींचकर सामने लाना था।
रात में कहीं एक ट्रक का हॉर्न बजा, दो टुकड़ों में, और मैंने अपनी चाल तेज़ कर दी।
॥
रात के ग्यारह बज रहे थे और सड़क पर सिर्फ़ दो आवाज़ें थीं। एक दूर किसी ट्रक का थका हुआ गियर, और दूसरी मेरे जूतों के नीचे चरमराती रेत।
मैं ढाबे से निकलकर नीम के पेड़ के पास से गुज़रा। पेड़ के नीचे उलटा ढोल पड़ा था और उस पर कोई नहीं था। जुगनू आज जल्दी सो गया था। या शायद उसकी माँ ने सुला दिया था।
टोल की लाइटें दूर पीली पड़ रही थीं, जैसे किसी ने उन्हें भी थका कर वहीं बैठा दिया हो।
गैराज के फाटक पर पहुँचकर मैंने ताले को छुआ। ठंडा था। मैंने चाबी घुमाई और अंदर गया।
कोने की पुरानी चारपाई पर जुगनू सो रहा था, जूट की बोरी ओढ़े हुए। उसके नंगे पाँव बाहर निकले हुए थे और घुटने पर वो पुराना निशान चाँद की तरह चमक रहा था।
मैंने उसकी बोरी ठीक से ओढ़ा दी और खुद दीवार के सहारे बैठ गया।
नींद नहीं आई।
मैंने जेब से पापा की घड़ी निकाली। आठ मिनट आगे। मैंने उसे ठीक नहीं किया।
मैंने सोचा — आज सुबह रुक्मा दीदी के चूल्हे के पीछे क्या मिलेगा।
और फिर मैंने सोचा — शाम चार बजे यार्ड में क्या होगा।
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