A Dark Secret – Chapter 204
विक्रम राठौर।
मैंने नाम को ज़ुबान पर दोहराया, धीरे, जैसे कोई नई रिंच हाथ में लेकर पहले उसका वज़न आँकता है।
जुगनू मेरे सामने खड़ा था, दोनों हाथ घुटनों पर, साँस अभी भी टूटी हुई। उसके नंगे पाँवों पर काली चिकनी मिट्टी चढ़ी थी और पंजों के बीच धूल की सफ़ेद लकीरें बन गई थीं।
"जुगनू," मैंने कहा, "एक बात साफ़ बता। उस अलमारी पर नाम किसने लिखा है? कोई बोर्ड लगा है या सीधे लोहे पर पेंट से?"
"लोहे पर, भैया। सीधे। सफ़ेद पेंट से। और वो पेंट भी पुराना है, कहीं-कहीं उखड़ गया है। नीचे एक छोटा बोर्ड भी टँगा है, पीतल का, जिस पर लिखा है, प्रबंध निदेशक।"
मेरे अंदर कुछ ठंडा उतरा।
प्रबंध निदेशक। यानी वो अलमारी देवा भाई की नहीं है। वो अलमारी किसी और की है, जो देवा भाई के दफ़्तर में रखी थी, और आज रात देवा भाई उसे बाहर भेज रहे हैं। अपने ही दफ़्तर से। अपनी ही अलमारी। किसी और की चीज़ को।
"और कालू?" मैंने पूछा।
"कालू रस्सी दे रहा था। उसके हाथ में वही लाल प्लायर था, भैया, वही ठक-ठक। मैंने आवाज़ से पहचाना।"
"तूने उससे बात की?"
"नहीं। मैं दूर था। मैं टोल की दीवार के पास खड़ा था, वहाँ जहाँ कल हम छिपे थे। और भैया, कालू ने दो बार पीछे देखा। जैसे उसे डर था कि कोई देख न रहा हो।"
"तू क्या कर रहा था वहाँ इतनी रात को?"
जुगनू ने गर्दन झुकाई।
"आपने कहा था ना, कि आज रात कुछ होगा। तो मैं सोया नहीं। मैं ढाबे के पीछे बैठा था, और जब वो गाड़ी आई, तो मैं दौड़कर टोल की दीवार तक गया।"
मेरा गुस्सा आया। सच में आया। एक ग्यारह बरस का लड़का, रात के साढ़े ग्यारह बजे, अंधेरे में, उस जगह जहाँ कालू जैसा आदमी खड़ा था।
"जुगनू," मेरी आवाज़ धीमी हो गई, "अगर उसने तुझे देख लिया होता, तो?"
"तो मैं भाग जाता।"
"कहाँ भागता? वो गाड़ी है, तू पैरों पर है।"
"मैं गलियों में भागता," जुगनू ने बिना झिझक कहा। "गाड़ी गली में नहीं घुसेगी।"
मैं उससे बहस नहीं कर सका, क्योंकि वो सही बोल रहा था। इस बस्ती में गलियाँ बच्चों की दोस्त हैं, गाड़ियों की नहीं।
मैंने उसके सिर पर हाथ रखा। बाल धूल से भरे थे।
"ठीक है," मैंने कहा। "अब सुन। तू अब यहाँ से ढाबे तक जाएगा और रुक्मा दीदी के पास बैठेगा। कुछ नहीं करेगा। कुछ भी नहीं।"
"पर भैया —"
"कुछ भी नहीं, जुगनू। अगर तू मेरी बात नहीं मानेगा, तो मैं आज रात के बाद तुझे कुछ नहीं बताऊँगा। कोई काग़ज़ नहीं, कोई गाड़ी नहीं, कोई नाम नहीं।"
वो चुप हो गया। उसकी आँखें गीली थीं, गुस्से से या डर से, मैं नहीं बता सका। फिर उसने सिर हिलाया।
"और सुन," मैंने कहा, "रास्ते में अगर कोई गाड़ी तुझे रोशनी दिखाए, तो तू सीधा दीवार से चिपक जाना। बीच सड़क पर मत खड़ा रहना। समझा?"
"समझा।"
"जा।"
वो भागा। इस बार वो नहीं रुका, पीछे मुड़कर नहीं देखा। उसकी नंगी एड़ियों की आवाज़ गली में दूर तक गई, फिर ढाबे की तरफ़ से आती बत्ती के नीचे गायब हो गई।
मैं छत से उतरा।
चाचा नीचे फाटक पर खड़े थे, हाथ में हथौड़ा, और उनका चेहरा उस पीले बल्ब के नीचे इतना उतरा हुआ लग रहा था जैसे किसी ने उनकी उम्र के दस साल और जोड़ दिए हों।
"क्या बोला लड़का?" उन्होंने पूछा।
"वो अलमारी देवा भाई की नहीं है, चाचा।"
"तो?"
"उस पर विक्रम राठौर लिखा है। सफ़ेद पेंट से। सीधे लोहे पर।"
चाचा का हथौड़ा नीचे गिरा। नहीं गिरा, गिरने को हुआ, फिर उन्होंने दूसरे हाथ से उसे थाम लिया। उनके होठ हिले, पर आवाज़ नहीं निकली।
"चाचा?"
"ये नाम," उन्होंने बहुत धीरे कहा, "मैंने सुना है। बहुत पुराना नाम है। मैंने इस नाम को किसी की ज़ुबान पर सुना है, बहुत साल पहले, और उस वक़्त मैंने सोचा था कि मैंने गलत सुना।"
"कहाँ सुना?"
उन्होंने मेरी तरफ़ देखा, और उनकी आँखों में वो चीज़ थी जो मैंने पहले कभी नहीं देखी थी। शर्म। पूरी, खुली, बिना बहाने की शर्म।
"बाद में," उन्होंने कहा। "कल सुबह। मैंने कहा ना, कल सुबह बयान दूँगा। उससे पहले मुझे… मुझे कुछ ठीक करना है, अर्जुन।"
मैंने उनसे ज़ोर नहीं दिया। कभी-कभी ज़ोर देने से आदमी और अंदर चला जाता है। मैंने सिर्फ़ कहा, "ठीक है।"
फिर मैंने गली के मुँह पर खड़े ट्रक की तरफ़ देखा।
वो वहीं खड़ा था। मेरा ही बूढ़ा शेर। मैंने उसे आड़ा खड़ा किया था, ताकि अलमारी वाली गाड़ी को धीमा होना पड़े। पर अब अगर मैं उसे हटाने लगता, तो शोर होता। इंजन, गियर, हॉर्न — और फिर वो गाड़ी मेरी गली के मुँह से पहले ही पार निकल जाती।
"चाचा, ट्रक नहीं छेड़ना," मैंने कहा। "जैसा है वैसा ही रहने देना।"
"तो तू जाएगा कैसे?"
"पिछली गली से।"
मैं गैराज के अंदर गया। अंधेरे में हाथ बढ़ाकर टटोला। दीवार के सहारे खड़ी थी वो — कबीर की पुरानी काली साइकिल, जिस पर वो अपना लोहे का सामान बाँधकर ले जाता था। मैंने उसका पिछला पहिया घुमाया। वो चरमराई। ज़ंजीर सूखी थी, और पैडल का एक बोल्ट आधा खुला था।
एक सेकंड के लिए मैं रुका।
क्योंकि साइकिल की आवाज़ भी एक कहानी कहती है। ये ज़ंजीर सूखी है, यानी कबीर इसे रोज़ नहीं चलाता। ये पहिया चरमराता है, यानी इसमें ग्रीस नहीं डाला गया। और ये बोल्ट — जो आधा खुला है — यानी जिसने आख़िरी बार इसे चलाया, उसने जल्दबाज़ी में छोड़ दिया।
कबीर आज सुबह जल्दी में था। जल्दी में कहाँ गया था, ये मैं जानता हूँ।
मैंने साइकिल बाहर निकाली और चाचा की तरफ़ देखा।
"तू अकेला जा रहा है," उन्होंने कहा। ये सवाल नहीं था।
"हाँ।"
"अर्जुन —"
"चाचा, सुनिए।" मैंने साइकिल का हैडल पकड़ा। "मैं उस गाड़ी को रोकने नहीं जा रहा। मैं उसके पीछे नहीं जा रहा। मैं सिर्फ़ उस जगह पहले पहुँचना चाहता हूँ जहाँ वो गाड़ी धीमी होगी।"
"कैसे पता तुझे कि वो धीमी कहाँ होगी?"
"आवाज़ से, चाचा।"
उन्होंने माथा सिकोड़ा।
"उस गाड़ी में अलमारी लदी है," मैंने कहा। "हरी लोहे की अलमारी, चार-पाँच मन की होगी। उसका वज़न पीछे की तरफ़ है। और जब वज़न पीछे होता है, तो आगे का हिस्सा हल्का रहता है। उभार पर गाड़ी उछलती है, और उछलने पर पीछे का फट्टा ऊपर जाता है। जिस रास्ते से वो जा रही है, उस रास्ते पर दो उभार हैं। पहला बड़ा, दूसरा छोटा। पहले उभार पर उसकी गति गिरेगी, और वहीं वो सबसे ज़्यादा हिलेगी। मुझे बस उस उभार तक पहले पहुँचना है।"
चाचा ने मेरी तरफ़ देखा, जैसे किसी नए आदमी को देख रहे हों।
"तू ये सब कब सीखा?" उन्होंने पूछा।
"आपके गैराज में, चाचा। आपने ही सिखाया। बस आपको याद नहीं।"
मैंने साइकिल पर पैर रखा।
पिछली गली में अंधेरा था। टीन की छतें दोनों तरफ़ झुकी हुई थीं, और ऊपर आसमान की जगह सिर्फ़ एक फटी लकीर बची थी। मैंने साइकिल धकेली, चढ़ा नहीं, क्योंकि ज़ंजीर की चरमराहट पूरी गली में गूँजती। मैंने धकेलते-धकेलते गली के आख़िरी मोड़ तक पहुँचकर साइकिल को दीवार के साथ टिका दिया और आगे पैदल बढ़ा।
सामने मुख्य सड़क थी।
और मुख्य सड़क पर वो उभार था, जिसका पत्थर कई बार टूट चुका था और कई बार जुड़ चुका था, इसलिए उसकी सतह लहरदार थी।
मैं उभार से लगभग चालीस कदम पहले, चाय की उस टपरी के पीछे बैठ गया, जो दिन में झंडू भाई चलाते हैं और रात में बंद रहती है। टपरी के पीछे टीन का एक टुकड़ा टेढ़ा लगा था, जो हवा में हल्का खड़खड़ाता था। मैंने उसी के नीचे अपने घुटने अड़ा लिए।
और फिर मैंने आँख बंद करके सुना।
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